सुबन्धु का जीवन परिचय | सुबन्धु का कर्तृत्व| Subandhu ka Jeevan parichay

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सुबन्धु का जीवन परिचय (Subandhu ka Jeevan parichay)

 

सुबन्धु का जीवन परिचय | सुबन्धु का कर्तृत्व| Subandhu ka Jeevan parichay

सुबन्धु का जीवन परिचय  (Subandhu ka Jeevan Parichay)

  • सर्वानुक्रमणी में एक सुबन्धु का उल्लेख किया गया है जिनको ऋग्वेद के चार ऋषियों में से एक तथा गोपायन तथा लोपायन का पुत्र बताया गया है। एक और सुबन्धु है जिनका उल्लेख दण्डी ने किया है। नाट्यशास्त्र की टीका 'अभिनवभारतीमें अभिनवगुप्त ने 'नाट्यायितके दृष्टान्त के रूप में 'वासवदत्तानाट्यधारानामक रूपक का उल्लेख किया है जिसके कृत्तिकार का नाम उन्होंने महाकवि सुबन्धु बताया है। रामचन्द्र और गुणचन्द्र के 'नाट्यदर्पण में भी इसी रूपक का वर्णन मिलता हैं । शारदातनय ने अपने 'भावप्रकाशनमें सुबन्धु नामक एक नाट्यशास्त्री का उल्लेख किया है जिसने नाटक के पाँच विभाग किये है। लेकिन पी०वी० काणे के अनुसार यह सुबन्धु वासवदत्तनाट्यधारावाले सुबन्धु से भिन्न है।

 

  • वासवदत्ता’ के रचनाकार सुबन्धु उपर्युक्त सभी सुबन्धु नामक व्यक्ति से भिन्न हैं। इनकी एकमात्र कृति वासवदत्ता’ ही है जिसमें प्रदर्शित अपनी विद्वता और विलक्षण श्लेषयुक्त शैली के कारण सुबन्धु ने संस्कृत गद्यसाहित्य में प्रतिष्ठापूर्ण स्थान प्राप्त किया है । 'वासवदत्ताकी एक पाण्डुलिपि के अनुसार सुबन्धु को वररूचि की बहन का पुत्र बताया गया है। 'वासवदत्ताके प्रारम्भ के तृतीय श्लोक के आधार पर आर० जी० हर्षे का अनुमान है कि दामोदर सुबन्धु के गुरु थे। वासवदत्ताके प्रारम्भ में सुबन्धु ने विष्णु की स्तुति दो श्लोकों में किया है। जबकि शिव की स्तुति में एक ही श्लोक लिखा है। इसके अतिरिक्त वासवदत्तामें शिव की अपेक्षा विष्णु के संकेत बहुलता से मिलते है। इस आधार पर यह अनुमान किया जा सकता है कि सुबन्धु वैष्णव थेयद्यपि उन्होंने शिव और अन्य देवो देवताओं के प्रति भी अपनी श्रद्धा दिखायी हैं।

 

सुबन्धु का कर्तृत्व Subandhu Krititva 

  • सुबन्धु का नाम संस्कृत साहित्य के लिए अपरिचित नहीं है। संस्कृत साहित्य में इनकी ख्याति वासवदत्ता नामक कथाग्रन्थ के रचनाकार के रूप में ही हैं परन्तु संस्कृत साहित्य मं इनसे इतर अन्य सुबन्धुओं का भी विवरण मिलता हैजिनका यहाँ पर उल्लेख कर देना समीचीन होगा। नाट्यशास्त्र की टीका अभिनवभारतीमें अभिनवगुप्त ने 'नाटयायिकाके दृष्टान्त के रूप में वासवदत्तनाट्यधारानामक रूपक का उल्लेख किया है जिसके कृतिकार का नाम उन्होंने महाकवि सुबन्धु बताया हैं रामचन्द्र और गुणचन्द्र के 'नाट्यदर्पणमें भी सुबन्धु नामक एक नाट्यशास्त्री का उल्लेख किया है जिसने नाटक के पाँच विभाग किया है लेकिन पी०वी० काणे के अनुसार यह सुबन्धु 'वासवदत्तनाट्यधारावाले सुबन्धु से भिन्न है। 'वासवदत्तारचनाकार सुबन्धु उपर्युक्त सभी सुबन्धुओं से भिन्न हैं। इनकी एक मात्र कृति 'वासवदत्ताही है जिसमें प्रदर्शित अपनी विद्वता और विलक्षण श्लेषयुक्त शैली के कारण सुबन्धु ने संस्कृत गद्यसाहित्य में प्रतिष्ठा पूर्ण स्थान प्राप्त किया है।

 

वासवदत्ता एक कथा

 

  • जहाँ तक वासवदत्ता का सम्बन्ध हैआलंकारिकों के अनुसार कथा के प्रायः सभी लक्षण इसमें दृष्टिगोचर होते हैं । इसमें कन्दर्पकेतु और वासवदत्ता की प्रेमकथा का सरस गद्य में वर्णन है। अतः इसमें श्रृंगार रस मुख्य रस है। रचना के आरम्भ में आर्याछन्द में सरस्वतीकृष्ण और शिव की स्तुति की गयी हैं। इसके अनन्तर खल-निन्दाकवि प्रशंसा कवि द्वारा अपना संक्षेप में परिचय इत्यादि का काव्य में सफल सन्निवेश हुआ है। इसके बाद कथा शुरू होती है और निर्बाधगति से अन्त तक चलती रहती है। कथा के लक्षणों के अनुसार इसमें कोई उच्छवास नहीं है और वक्त्र या अपरवक्त्र छन्दों का भी समावेश नहीं है। इसकी कथा नामक से भिन्न अन्य पात्र (शुक) से कहलवायी गयी है। इसमें अवान्तर कथा (शुक प्रसंग) का प्रयास सफलता से किया गया है। जो बाद में मुख्यकथा से सम्बद्ध हो जाती है । इसके अतिरिक्त इसको कथा सिद्ध करने के लिए सर्वप्रमुख कारण हैइसका कवि कल्पनाप्रसूत होना। इसकी कथा का ऐतिहासिक इतिवृत्त से कहीं कोई सम्बन्ध नहीं है। अमर सिंह की परिभाषा के अनुसार भी यह कथा ही है क्योंकि यह कवि कल्पना पर आधारित प्रबन्ध है।

 

  • इस प्रकार वासवदत्ता’ में उपलब्ध उपर्युक्त तथ्यों जो कि साहित्यशास्त्रियों के अनुसार कथा के ही लक्षण है के आलोक में यह कहा जा सकता है कि 'वासवदत्तानिःसन्देह रूप से कथा ही है किसी भी रूप में आख्यायिका नहीं है।

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