रीतिकालीन ब्रजभाषा, आधुनिक काल की ब्रजभाषा | Ritikalin and Aadhunik Kal Ki Brajbhasha

Admin
0

रीतिकालीन ब्रजभाषा

 

रीतिकालीन ब्रजभाषा, आधुनिक काल की ब्रजभाषा | Ritikalin and Aadhunik Kal Ki Brajbhasha

रीतिकाल में ब्रजभाषा एक विकल्प के रूप में नहींएकमात्र काव्य-भाषा के रूप में स्थापित हो गई। इस समय ब्रजभाषा अपने क्षेत्र से बाहर निकल कर व्यापकता धारण करने लगी और देखते ही देखते सम्पूर्ण हिन्दी क्षेत्र की काव्यभाषा के पद पर आसीन हो गई। इसी बात का संकेत करते हुए कविवर भिखारीदास कहते हैं -

 ब्रजभाषा हेत ब्रजवास ही न अनुमानौ। 

ऐसे ऐसे कविन की बानी है सो जानिए।।

 

  • भक्तिकाल में ही ब्रजभाषा का क्षेत्र लगभग निश्चित हो चुका था। शृंगार तथा वात्सल्य जैसे कोमलतम भावों की विशेष सम्प्रेषण क्षमता इस भाषा में विकसित हो चुकी थीजिस तरह से अवधी का सम्बन्ध नैतिकता और लोकमंगल से हो गया थाउसी प्रकार से ब्रजभाषा मूलतः सौन्दर्य और शृंगार जैसे विषयों की प्रतीक बन चुकी थी। चूँकि रीतिकाल में आरम्भ से अन्त तक शृंगार पक्ष की प्रधानता रहीइसीलिए यह स्वाभाविक था कि यह काल ब्रजभाषा की केन्द्रीयता का काल बना। इस युग में भक्तिकाल की तुलना में एक और विशेष स्थिति पैदा हुई। भक्तिकाल में कवि मूलतः भक्त थेगौणतः कविइस वजह से भी प्राथमिक रूप से भक्ति के प्रति दायित्व महसूस करते थेन कि कविता के प्रति। सूरदास के दृष्टिहीन होने के कारण भी यह समस्या रही कि वे चाहकर भी अपने काव्यशिल्प का सजग मूल्यांकन नहीं कर पाते थे। रीतिकाल में शृंगार और सौन्दर्य पर पड़ा हुआ भक्ति का आवरण हट गया और काव्य रचना के क्षेत्र में वे लोग आए जो मूल रूप से कवि थे तथा जिनका उद्देश्य कवि के रूप में अपने महत्त्व की स्थापना करना था। इसीलिए इस काल में ब्रजभाषा गहरे कलात्मक विवेक से युक्त हुई और नित नए प्रयोगों के माध्यम से अपनी चरम सम्भावनाओं को उपलब्ध कर सकी। इस बदलते हुए दृष्टिकोण की घोषणा भिखारीदास ने स्पष्ट शब्दों में की -

 

आगे के सुकवि रीझिहैं तौं कविताई। 

न तौ राधिका कन्हाई को सुमिरन कौ बहानौ है।।

 

  • रीतिकाल में ब्रजभाषा के प्रायः दो रूप दिखाई देते हैं। पहला रूप प्रायः रीतिबद्ध कवियों की भाषा में दीखता है जिसमें अलंकारिकतासजगता और चमत्कारप्रियता की प्रवृत्तियाँ व्यापक रूप से परिलक्षित होती हैं। यह भाषा अति सजग किस्म की भाषा है। इस भाषा शैली के सबसे सफल प्रयोक्ता हैं.  कविवर केशवदास एवं बिहारीलाल। बिहारी ने भाषा की समास क्षमता और भावों की समाहार क्षमता का इतना सफल प्रयोग किया कि इनके दोहे उर्दू के शेरों को मात देने लगे। उनके शिल्प पर मुग्ध होकर जार्ज ग्रियर्सन को कहना पड़ा कि 'यूरोप में कोई भी कविता बिहारी सतसई का मुकाबला नहीं कर सकती। बिहारी की इसी चमत्कारी शैली का एक उदाहरण देखिए - 

कहत नटत रीझत खिझत मिलत खिलत लजियात। 

भरे भौन में करत हैं नैनहुँ से सौं बात।

 

  • रीतिकाल में ब्रजभाषा की दूसरी शैली घनानन्द जैसे रीतिमुक्त कवियों के काव्य में दिखती है। ये कवि भी प्रेममार्ग के कवि हैंकिन्तु ये अपने प्रेम और कविता की सार्थकता के प्रति गहरी जवाबदेही महसूस करते हैं। इनके यहाँ प्रायः सहज शिल्प है। इनकी भाषा सुनकर व्यक्ति चमत्कृत नहीं होता बल्कि संवेदना के गहरे स्तर पर पहुँच जाता है। संवेदनशीलता की दृष्टि से इनकी भाषा ब्रजभाषा के चरम स्वरूप को व्यक्त करती है। यही कारण है कि इनकी भाषा में अलंकार भी आते हैं तो चमत्कृत करने के स्थान पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इनकी भाषा की प्रशंसा करते हुए कहा है "इनकी-सी विशुद्धसरसशक्तिशाली ब्रजभाषा लिखने में और कोई कवि समर्थ नहीं हुआ। विशुद्धता के साथ प्रौढ़ता और माधुर्य भी अपूर्व है।... प्रेममार्ग का ऐसा प्रवीण और धीर पथिक तथा जबाँदानी का ऐसा दावा रखने वाला ब्रजभाषा का दूसरा कवि नहीं हुआ।... भाषा के लक्षक और व्यंजक बल की सीमा कहाँ तक है इसकी पूरी परख इन्हीं को थी। भाषा पर जैसा अचूक अधिकार इनका था वैसा और किसी कवि का नहीं।" (हिन्दी साहित्य का इतिहासआचार्य रामचन्द्र शुक्लपृ. 233) 
  • रीतिकाल के अन्य कवियों में केशवदासदेवबोधापद्माकर आदि ने कविता में ब्रजभाषा की ताकत को पहचाना। इन कवियों ने ब्रजभाषा को तरास कर लालित्य से भर दिया। रीतिकाल के अन्य प्रतिष्ठित कवियों में चिन्तामणिकवि मण्डनभूषणकालिदासनेवाजसुरति मिश्रश्रीपतिकृष्णकविरसलीनदूलह आदि कवियों ने काव्य रचनाएँ कीरीतिकाल की समग्र काव्य प्रवृत्ति को सर्वग्राह्य सरस ब्रजभाषा से आच्छादित रखा।

 

आधुनिक काल की ब्रजभाषा 

आधुनिक काल की ब्रजभाषा को काव्यभाषा के रूप में जीवित बनाए रखने के लिए भारतेन्दु और प्रेमघन ने काफी प्रयत्न किया। भारतेन्दु की ब्रजभाषा तो अत्यन्त लावण्य एवं माधुर्य से युक्त है -


राखत नैनन में हिय मैं दूरि भये छिन होत अचेत है। 

सौतिन की कहे कौन कथा तसवीर हू सतराति है।

 

आधुनिक युग में रचे गए ब्रजभाषा काव्य को तीन भागों में विभाजित कर के देखा जा सकता है। पूर्व भारतेन्दु युगभारतेन्दु युगउत्तर भारतेन्दु युग। पूर्व भारतेन्दु युग में अधिकांशतः रीतिकाल के कवियों को ही स्वीकार किया गया। जिनमें कवि ग्वालदीनदयाल गिरीकविरत्न 'नवनीतआदि के नाम का उल्लेख किया जा सकता है। डॉ. सत्येन्द्र ने सन् 1860 से ब्रजभाषा के आधुनिक युग का आरम्भ माना है और ग्वाल को इस युग का प्रथम कवि स्वीकार किया है। वे मथुरा निवासी थे। उन्होंने अरबी फ़ारसी शब्दों का काफी प्रयोग किया। उनकी कविता का एक उदाहरण द्रष्टव्य है -

 

रिझनि तिहारी न्यारी अजब निहारी नाथहारी मति व्यास हूँ की पावत न ठौर।

 

  • आधुनिक काल में भारतेन्दु के पूर्ववर्ती ब्रजभाषा कवियों की चर्चा करते हुए उन्होंने कवि उरदासनवीन कविपण्डितअयोध्यानाथ अवधेशहरदेवलाल साधुरामकिशोर खडग सिंहराजकुमार रत्नसिंहरत्नागरसेवकरीवाँ नरेश रघुराज सिंहराजा लक्ष्मणसिंहपरमानन्ददासगोप भट्टभोलाराम भण्डारी तथा नारायणदास सेंगरिया आदि का उल्लेख किया है।

 

  • द्वितीय उत्थान काल में ब्रजभाषा के प्रख्यात कवियों में राय देवीप्रसाद पूर्णपण्डित नाथूराम शर्मागयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही', लाला भागवानदीनपण्डित रूपनारायण पाण्डेयपंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔधआदि का नाम लिया जा सकता है।

 

  • तृतीय उत्थान काल के प्रमुख कवियों में रामचन्द्र शुक्लजगन्नाथदास रत्नाकरवियोगी हरिगयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही', राय कृष्ण दासकविरत्न आदि का नाम उल्लेखनीय है। जगन्नाथदास 'रत्नाकरने अपने उद्धवशतक में कृष्णलीला का गान अत्यन्त सहज और सरस ब्रजभाषा में किया है। जैसे - 

नन्द ओ जसोमति के प्रेम-पगे पालने की लाड़-भरे लालन की लालच लगावती। 

इसी प्रकार सनेही जी भी अपनी प्रेम पचीसी में ब्रजभाषा की अत्यन्त सुन्दर छटा बिखेरते है।  

तुम चाहो न चाहो लला हमको कछु दीबो न याको उराहनो है। 

दुःख दीजे कि कीजे दया दिल मेंहर रंग तिहारो सराहनो है।

 

  • बीसवीं सदी के आरम्भ में व्रजभाषा कविता अधिकांशतः मुक्तक काव्य के रूप में लिखी जाती थी। उत्तर भारतेन्दु युग में प्रबन्ध रचना अधिक व्यवस्थित हो गई। फलतः अनेक प्रकार के काव्य रूपों का विकास ब्रजभाषा में हुआ। इस दृष्टि से महाकाव्यों के अन्तर्गत शिवरत्न शुक्ल 'सिरिसकृत भरतभक्ति (सन् 1932), रामनाम ज्योतिषी कृत श्री रामचन्द्रोदय (सन् 1936), हरदयालू सिंह कृत दैत्यवंश (सन् 1952) तथा रावण महाकाव्य (सन् 1952), प्रियदर्शी कृत कृष्ण चरितमानस (सन् 1957) विशेष उल्लेखनीय है। खण्ड काव्यों के क्षेत्र में बचनेश मिश्र कृत ध्रुवचरित्रजगन्नाथदास कृत गंगावतरणरामचन्द्र शुक्ल कृत सरस कृत अभिमन्यु वधहनुमन्त दयाल अवस्थी कृत हनुमन्तसीतासुधिलक्ष्मी शंकर मिश्र 'निशंककृत प्रेमपीयूष विशेष उल्लेखनीय है।

 

  • इन सभी रचनाओं में अनुभूतियों का आवेग है और भाव व्यंजना में संगीत का माधुर्य है। ब्रजभाषा में गीतिकाव्य अधिक नहीं हैंकिन्तु यत्र-तत्र शोकगीत (राधाकृष्ण दास कृत विजयिनी-विलाप)जागरण गीत (मिश्र बन्धु कृत भारत विनय) आदि मिल जाते हैं। ब्रजभाषा के काव्य रूपों में वैविध्य तो महत्त्वपूर्ण है हीउसकी मधुरता विलक्षण है। जिस भाषा में केवल एक पंक्ति 'साँकरी गली में काँकरी गरति हैपर लोग रीझ गए थेवह शताब्दियों तक अपने रूप माधुर्य के कारण लोगों का कण्ठहार बनी रही। 

  • द्विवेदी युग के ब्रजभाषा कवियों ने अपने समय के विकृत समाज की रूढ़िग्रस्तता पर प्रहार किया। इस युग की काव्यधारा में सामान्य रूप से खण्ड काव्यकथात्मक काव्यमुक्तक कविता तथा गीतिकाव्य की रचना हुई। इस युग में वियोगी हरिपद्मसिंह शर्मापण्डित कृष्णबिहारी मिश्रपण्डित किशोरीदासपण्डित जगन्नाथदास 'चतुर्वेदी', दुलारेलाल भार्गव आदि का नाम उल्लेखनीय है।
  • छायावाद युग में ब्रजभाषा के कवियों ने परम्परावादी काव्यधारा को शिल्प की दृष्टि से आगे बढ़ाया। इस युग मे रचनाओं का शिल्प खड़ी बोली जैसा है। इस युग में ब्रजभाषा में काव्य रचना करने वाले कुछ मुख्य नाम हैं गयाप्रसाद शुक्ल सनेही. डॉ. रमाशंकर शक्ल. अनप शर्मा आदि। 
  • श्रीनारायण चतुर्वेदीकाका हाथरसीबरसानेलाल चतुर्वेदी आदि ने आधुनिक युग में ब्रजभाषा में अपनी रचनाएँ कर ब्रजभाषा साहित्य को समृद्ध किया है। 
  • ब्रजभाषा बीसवीं शताब्दी के पहले दो दशकों में कुछ विशेष कवियों के यहाँ काव्य-भाषा बनी रही तथा उसके बाद सिमट कर पुनः अपने भौगोलिक क्षेत्र ब्रजमण्डल के कुछ कवियों की बोली के रूप में सीमित हो गई। इतने बड़े परिवर्तनों से भरा हुआ इतिहास कम ही भाषाओं का होता है। "काव्यभाषा के रूप में ब्रजभाषा का उत्कष् और पतन इतिहास देवता का एक खिलवाड़ है।" 

Post a Comment

0 Comments
Post a Comment (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top