मध्यकाल में ब्रज का साहित्यिक भाषा के रूप में विकास | Brajbhasha ka Sahityik Vikash

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 मध्यकाल में ब्रज का साहित्यिक भाषा के रूप में विकास

 

मध्यकाल में ब्रज का साहित्यिक भाषा के रूप में विकास | Brajbhasha ka Sahityik Vikash

ब्रजभाषा के प्रारम्भिक प्रयोग: सूरपूर्व ब्रजभाषा 

आरम्भिक चरण की ब्रजभाषा शौरसेनी अपभ्रंश से धीरे-धीरे अपना रूप ग्रहण कर रही थी। यद्यपि ब्रजभाषा नाम का प्रयोग अठारहवीं शताब्दी में पहली बार, हुआ तथापि किसी न किसी रूप में इसकी भाषिक प्रवृत्तियाँ पहले भी दिखाई देती हैं। इसके पूर्व यह 'पिंगल' तथा 'भाखा' नाम से प्रसिद्द थी। डॉ. शिवप्रसाद सिंह के अनुसार महाराष्ट्र में रचित ब्रजभाषा काव्य का कुछ संकेत चालुक्य नरेश सोमेश्वर (सन् 1127) के मानसोल्लास नामक ग्रन्थ में मिलता है। (सूरपूर्व ब्रजभाषा, शिवप्रसाद सिंह, पृ. 220) हेमचन्द्र के व्याकरण के उद्धृत दोहों एवं उनके कोश देशीनाममाला में संगृहीत शब्दों में ब्रजभाषा का पूर्व रूप झलकता है। जैसे- 'सासानल जल झलक्कियउ' में अपभ्रंश शब्द 'झलक्कियउ' से ही ब्रज का 'झलक्को' शब्द व्युत्पन्न हुआ। इसी प्रकार 'बाउल्लो' से 'बावरा', 'चोट्टी' से 'चोटी', 'लग्गि' से 'लागि' आदि उल्लेखनीय है। इसके साथ ही पिंगल की प्रामाणिक रचनाओं में श्रीधर व्यास का रणमल्ल छन्द, प्राकृतपैंगलम में चारण शैली के पद, पृथ्वीराज रासो के प्रमाणित छप्पय, उक्ति व्यक्ति प्रकरण तथा कहीं-कहीं कीर्तिलता में भी ब्रजभाषा का पूर्व रूप दिखाई देता है। यथा 'नअण झम्पियो' (प्राकृतपैंगलम) तथा 'ओ परमेसर हर सिर सोहई' (कीर्तिलता) उपयुक्त उदाहरण में ओकारान्त की प्रवृत्ति ब्रजभाषा का ही प्राणतत्त्व है। सिद्धों-नाथों की सधुक्कड़ी भाषा में भी ब्रजभाषापन दिखाई देता है। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के कई पदों में ब्रजभाषा का पुट दिखाई देता है -

 

पखेरु ऊडिसीआय लीयो बीसराय। ज्यों ज्यों नर स्वारथ करे कोई न सजायौ काम।। जोगी सोई जाणिये जग तैं रहे उदास। तत निरंजण पाईये कहै कहै मछंदरनाथ।।

 

इस पद में ओकारान्त व्रजभाषा की ही पृष्ठभूमि है।

 

  • ब्रजभाषा का पहला स्वतन्त्र प्रयोग करने का श्रेय आदिकालीन कवि अमीर खुसरो को दिया जा सकता है। यद्यपि उनकी भाषा में फ़ारसी, खड़ी बोली और अवधी तीनों भाषिक परम्पराएँ मिलती हैं, पर निश्चित रूप से उनकी रचनाओं में ऐसे कई उदाहरण हैं, जो ब्रजभाषा के मधुर रूप का आभास कराते हैं। 

जैसे - 

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग। 

तन मेरो मन पिउ को, दोऊ भए एक रंग।।

 

  • तेरहवीं सदी तक ब्रजभाषा का कोई रूप स्थिर नहीं हुआ था। सूरदास से पूर्व कुछ और कवि ब्रजभाषा का प्रयोग करते दिखाई देते हैं। चौदहवीं सदी में कवि सुधीर अग्रवाल की प्रद्युम्न चरित (सन् 1354) में ब्रजभाषा के कुछ लक्षण प्राप्त होते हैं। इसे ब्रजभाषा की पहली रचना कहते हैं। जाखू मणयार का हरिचन्दपुराण जो राजा हरिश्चन्द की कथा पर आधारित है, उसमें भी ब्रजभाषा विकसित होती हुई दिखाई देती है। इसके बाद ब्रज काव्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कवि के रूप में विष्णुदास का नाम आता है। उनकी चार रचनाएँ प्रकाश में आई -महाभारत कथा, स्वर्गारोहण, रुकमणिमंगल और स्नेहलीला। विष्णुदास जी ने प्रारंभिक ब्रजभाषा की ठोस साहित्यिक नींव तैयार की। 

यथा- 

मोहन महलन करत विलास । 

कन मन्दिर में केलि करत हैं और कोउ नाहिं पास।

 

  • इसके बाद मानिक की बैताल पचीसी (सन् 1469), नारायण दास की छिताइ वार्ता, मेघनाथ की गीताभाषा (सन् 1500), थाकुरसी की पंचेन्द्रियबेली, चतरुमल की नेमे वरगीत तथा धर्मदास की कुछ रचनाओं को ब्रजभाषा के प्रथम चरण के रूप में देखा जा सकता है। महाराष्ट्र के सन्त नामदेव ने भी कुछ पदों की रचना की, जिनमें ब्रजभाषा के शब्द मिलते हैं। सिक्खों के पाँचवें गुरु अर्जुनदेव ने अपनी वाणी और अपने पूर्व के चार गुरुओं - देव, अंगद, रामदास और अमरदास के अतिरिक्त कबीर, त्रिलोचन, बेनी, रामानन्द, धन्ना, पीपा, सेन, रैदास आदि भक्तों की वाणी का संग्रह किया, जिनमें ब्रजभाषा का तत्कालीन रूप मिलता है। 

गुरु अर्जुनदेव की भाषा पंजाबी मिश्रित ब्रजभाषा जा सकती है। जैसे - 

जनम जनम का बिछुड़िया मिलिया

साध क्रिया ते सूखा हरिया। 

  • वस्तुतः, पुरातन मध्यदेश की शौरसेनी अपभ्रंश का स्थान कालान्तर में ब्रजभाषा ने ग्रहण किया। अपने इस प्रारम्भिक चरण में उक्त कवियों की भाषा धीरे-धीरे ब्रजभाषा की ओर मुड़ रही थी। इसमें अभी अपभ्रंश के पुट विद्यमान थे, परन्तु इसी अपभ्रंश से जीवन रस लेकर मध्यकाल में व्रजभाषा हिन्दी क्षेत्र की प्रमुख काव्यभाषा बन गई। 
  • प्रथम चरण की ब्रजभाषा के कुछ महत्त्वपूर्ण अभिलक्षण हैं, जिनमें अकारान्त आनुनासिकता की प्रवृत्ति मिलती है। जैसे - 'कँह', 'मह', 'अँधार''' और '' के प्रयोग को लेकर स्थिरता है। बहुत से शब्दों में '' पाया जाता है। जैसे- 'वयण', 'नयण', 'जाणिये', 'निरंजण' आदि। बाद की ब्रजभाषा में ण नहीं है। जैसे गनपति, सरन आदि।
  • '' लिखा जाता था, पर इसका उच्चारण '' होता था। '', '' का बाहुल्य ब्रजभाषा की विशेषता है, परन्तु इस युग में ऐसे प्रयोग तीन रूपों में मिलते थे।

 सूरदासयुगीन ब्रजभाषा 

  • द्वितीय चरण में इस समय तक ब्रजभाषा का रूप स्थिर हो गया था। ब्रज क्षेत्र में जैसे ही कृष्ण भक्ति के केन्द्र स्थापित हुए, सांस्कृतिक भाषा के रूप में ब्रजभाषा कविता में सहज ही ग्राह्य हो गई। डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ने लिखा है - "जिस समय श्री प्रभु वल्लभाचार्य को व्रज जाकर गोकुल तथा गोवर्धन को अपना केन्द्र बनाने की प्रेरणा हुई, उसी दिन से ब्रज की प्रादेशिक बोली के भाग्य पलटे। वल्लभाचार्य के पुत्र विठ्ठलनाथ ने अष्टछाप की स्थापना की। सूरदास इसमें प्रमुख थे।" (हिन्दी भाषा, डॉ. हरदेव बाहरी, पृ. 207) अष्टछाप के अन्य कवि थे नन्ददास, कृष्णदास, परमानन्ददास, चतुर्भुजदास, कुम्भनदास, छीतस्वामी, गोविन्दस्वामी। इसके अलावा अन्य सम्प्रदायों के कवियों ने भी ब्रजभाषा में साहित्य लिखा।
  • ब्रजभाषा को बहुमुखी अभिव्यंजना से परिपूरित करने में सूरदास अग्रणी हैं। ब्रजभाषा इतिवृत्तात्मक शैली पदों के लिए उयुक्त पाई गई है। तत्कालीन कृष्णभक्ति काव्य एक मात्र व्रजभाषा में लिखा गया है। कृष्णकाव्य में दो प्रधान रस हैं वात्सल्य और शृंगार। दोनों कोमल रस हैं। इसीलिए ब्रजभाषा में सरसता, लालित्य और माधुर्य दिखाई देता है। इस काल के कवियों का एक अन्य लक्षण उनकी संगीतात्मकता भी है, जिससे ब्रजभाषा में और अधिक भावप्रवणता के दर्शन होते हैं। सूरदास और नन्ददास की भाषा उच्च कोटि की है। 
  • सूरदास ब्रजभाषा के सफलतम कवि हैं। भाषा वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस प्रकार जायसी और तुलसी को पाकर अवधी धन्य हो गई थी, उसी प्रकार सूर को पाकर ब्रजभाषा धन्य हो गई। सूरदास ने ब्रजभाषा में लगभग सवा लाख पदों की रचना की है। उनकी भाषा का महत्त्व इस बात में है कि वह कई क्षेत्रों से जुड़ी होकर भी एकदम स्वाभाविक है और उनकी काव्यभाषा ब्रजभाषा का आरम्भिक उदाहरण होकर भी चरम रूप से सफल भाषा है। इसी स्थिति को देखते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को कहना पड़ा, "सूरसागर किसी पहली से चली आ रही परम्परा का... चाहे वह मौखिक रही हो... पूर्ण विकास-सा जान पड़ता है, चलने वाली परम्परा का मूल रूप नहीं।" (हिन्दी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृ. 113) 
  • सूरदास की भाषा सिर्फ प्रारम्भिक ब्रजभाषा की दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, गुणवत्ता की दृष्टि से भी उनकी भाषा इतनी सफल रही कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को कहना पड़ा "यह रचना इतनी प्रगल्भ और इतनी कलापूर्ण है कि आगे आने वाले कवियों की शृंगार और वात्सल्य की उक्तियाँ सूर की जूठी-सी जान पड़ती हैं।" (वही, पृ. 113) काव्यभाषा विषयवस्तु और भाव के अनुकूल नए-नए रूपों में दिखाई देती है। सूरदास जब सौन्दर्य का वर्णन करते हैं तो तत्सम शब्दों पर उनकी निर्भरता बढ़ जाती है। अभिव्यक्ति की क्षमता पर उनका पूरा अधिकार है। वांछित शब्द और अर्थगर्भित वाक्य उनकी इच्छा के अनुरूप जैसे अपने आप निकल आते हैं। उन्होंने अवसरानुकूल भाषा में अरबी, फ़ारसी, अवध, राजस्थानी शब्द भी प्रयुक्त किए हैं-

 

मन हरि लीन्हों कुँवर कन्हाई। तबहीं हैं मैं भई दीवानी, कहा करौ री माई। 

कुटिल अलक भीतर अरुझानी, अब निरवारि न जाई। 

नैन कटाच्छ चारु अवलोकनि, मो तन गए बसाई।


  • इस पद में तत्सम और तद्भव शब्दों का प्रयोग हुआ है। 
  • सूरदास ने ब्रजभाषा के उसी रूप को नहीं लिया जो सामान्य रूप से बोलचाल की थी। भाषा को व्यापकता प्रदान करने के उद्देश्य से उन्होंने 'जेहिं', 'तेंहि', जैसे अवधी प्रयोग 'गौण', 'आपन', 'हमार' जैसे पूर्वी प्रयोग तथा 'मँहगी' (प्यारी), जैसे पंजाबी प्रयोग भी इसमें शामिल किए। सूरदास की भाषा की सबसे बड़ी विशेषता उनकी चित्र निर्माण की कला में हैं। हिन्दी के किसी भी अन्य कवि की तुलना में उन्होंने सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों को पूरी चित्रात्मकता के साथ व्यक्त करने में सफलता प्राप्त की है। संगीतात्मकता उनकी भाषा का दूसरा सबसे प्रमुख गुण है। लय, ताल, तुक आदि पर सूरदास का इतना गहरा अधिकार था कि उनकी सारी कविताएँ बहुत स्वाभाविक रूप के साथ गेयता को धारण करती हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार सूरदास ने ब्रजभाषा का प्रयोग तीन शैलियों में किया। पहला तत्सम शैली, दूसरा मुहावरों और लोकोक्तियों की शैली। तीसरा वाग्विदग्धता की शैली। सभी समीक्षक इस बात पर सहमत हैं कि वाग्विदग्धता की जो शैली सूरदास ने विकसित की, उसने ब्रजभाषा में एक नए तेवर को जन्म दिया। एक उदाहरण द्रष्टव्य है -

 

निर्गुण कौन देश को वासी मधुकर हँसि समुझाए ! 

सौंह दे, बूझति सांच न हाँसि। को है जनक, जननि को कहियत, कौन नारि को दासि ।।


  • सूरदास की विशेषता नए-नए विषयों पर लिखना नहीं, सीमित विषयों पर नए-नए तरीके से लिखना है। इस कारण स्वाभविक रूप से उनका अप्रस्तुत विधान बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया। उपमा और उत्प्रेक्षा का प्रयोग करना उन्हें सबसे अधिक प्रिय है, हालाँकि कभी-कभी ऐसा होता है कि शुक्ल जी के शब्दों में "सूरदास को उपमा देने की झक-सी चढ़ जाती है, और वह उपमा पर उपमा और उत्प्रेक्षा पर उत्प्रेक्षा करते चले जाते हैं।" (भ्रमरगीत, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृ. 31) इसके बावजूद उपमानों की दृष्टि से सूरदास की कविता निस्सन्देह श्रेष्ठ है।
  • अष्टछाप के अन्य कवि नन्ददास, कृष्णदास, परमानन्ददास, चतुर्भुजदास, कुम्भनदास, छीतस्वामी, गोविन्दस्वामी ने भी ब्रजभाषा को वाग्वैदग्ध और काव्य लालित्य से युक्त किया है। नन्ददास शास्त्रीय ब्रजभाषा के माहिर थे। जिस प्रकार तुलसी ने संस्कृत के शब्दों को अवधी भाषा के प्रभाव में ढाल दिया, वैसे ही उन्होंने संस्कृत शब्दों को ब्रजभाषा के प्रभाव में ढाल दिया। इसीलिए उनके बारे में एक उक्ति प्रसिद्द हो चली 'और कवि गढ़िया नन्ददास जड़िया'। कृपाराम की हितरिंगिणी की भाषा भी शास्त्रीय रूप की है। रहीम और रसखान ने ब्रजभाषा को लावण्यमय और उच्चारण सहज बनाया है। इनकी भाषा अलंकार बहुल और चमत्कार बहुल है। इन्होंने तद्भव शब्दों का सुन्दर प्रयोग किया है। इनकी संस्कृत प्रधान शैली का एक उदाहरण द्रष्टव्य है - 

"ऊधव को उपदेश, सुनो ब्रजनागरी। रूप शील लावन्य, सब गुण आगरी।

प्रेम सुधा रस रूपिनी, उपजावत सुख पुंज। सुन्दर स्याम विलासीनी नव वृन्दावन कुंज ।।

 

  • कृष्णदास की काव्य-भाषा में भावप्रवणता और गम्भीरता है। परमानन्ददास की काव्य-भाषा सरल-सरस और भावपूर्ण है। चतुर्भुजदास के कीर्तन पद बहुत मधुर और संगीतमय हैं। हितहरिवंश की भाषा संस्कृत प्रधान है। 

रसखान की भाषा सरल-सरस और सुन्दर ब्रजभाषा है। मीराबाई की भाषा का स्वरूप तो ब्रजभाषा का है, किन्तु उसमें राजस्थानी के पद विद्यमान हैं - 


पग घुंघरू बाँध मीरा नाची रे मै तो अपने नारायण की आपहि हो गई दासि रे। 

लोग कहें मीरा भई बावरी, सासु कहें कुलनासी रे।।"

 

तुलसीदास रामभक्त थे, उन्होंने राम का गुणगान अवधी भाषा में किया किन्तु उनका जितना अधिकार अवधी पर था उतना ही ब्रजभाषा पर भी। सूरदास की तुलना में उनकी ब्रज भाषा में तत्समता अधिक है। उनकी कवितावली, विनयपत्रिका, गीतावली, कृष्णगीतावली आदि रचनाओं में व्रजभाषा का सौन्दर्य सूरदास से तुलना करता हुआ दिखाई देता है। उनकी विनयपत्रिका की भाषा विशुद्ध रूप से ब्रजभाषा है - 

सुमिरो सनेहसों तु नाम रामराय को सैंबर निसँबरको सखा असहाय को।।

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