दुखत्रय का स्वरूप सत्कार्यवाद | Type of Sadness Sankhya Darshan

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दुखत्रय का स्वरूप  सत्कार्यवाद

दुखत्रय का स्वरूप  सत्कार्यवाद | Type of Sadness Sankhya Darshan




दुखत्रय का स्वरूप 

  • साख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण सांसारिक जीवन दुःखमय है। हम विभिन्न प्रकार के दुःख भोगते रहते हैं। लेकिन दुःख क्या है? दुःख का व्युत्पत्तिपरक अर्थ है- दुःखयति इति दुःखम्। पतंजलि ने कहा है प्रतिकूल वेदनीयता ही दुःख है। जो अपने लिए अप्रीतिकर हो वही दुःख है। न्याय के अनुसार तो 'बाधना लक्षणम् दुःखं' अर्थात परिताप ही दुःख है। दुःख सुख का अभाव नहीं है बल्कि यह वास्तविक रूप से अनुभूयमान है इसके प्रति विर्कषण की भावना प्रत्येक व्यक्ति के मन मे रहती है। दुःख रजोगुण का परिणाम विशेष है। दुःख तो अप्रीतिकर है ही वस्तुतः अनुभूयमान सुख भी परिणाम संस्कार और ताप दुःखता के कारण दुःख ही है। सर्वं दुःखं विवेकिनः। दुःख के भेद का उल्लेख ईश्वर कृष्ण ने सांख्य कारिका के प्रथम कारिकांश में ही सांख्य शास्त्र की अर्थवत्ता का प्रतिपादन करते हुए संकेत किया है।

 

दुःख त्रिविध

  • दुखः त्रयाभिधाताज्जिज्ञासा तदपधातके हेती अर्थात् दुःख त्रिविध हैं और उनका अभिघात जीव मात्र को होता है। अतएव उन तीनों दुःखों के आत्यन्तिक व एकान्तिक समाधान के साधन की जिज्ञासा होती है। ये तीन दुःख हैं- 1. आध्यात्मिक, 2. आधिभौतिक, 3. आधिदैविक।

 

1. आध्यात्मिक दुख- 

  • वह दुःख है जो शरीर और मन में होता है और आन्तरिक उपाय साध्य होता है। इस दुःख के दो भेद हैं- 1. शारीरिक व 2. मानसिक। वात, पित्त और कफ के वैषम्य से उत्पन्न ज्वर अतिसार आदि शारीरिक दुःख है। प्रिय वस्तु के वियोग एवं अप्रिय के संयोग से उत्पन्न होने वाले दुःख को मानसिक कहते हैं। व्याधि शारीरिक दुःख है और आधि मानसिक दुःख है।

 

2. आधिभौतिक क दुःख- - 

  • वह दुःख जो मनुष्य पशु, पक्षी, सरीसृप, दंश, मच्छर, जूँ, खटमल, मछली, मकर, ग्राह और स्थावर से उत्पन्न होता है। यह दःख जरायुज, अण्डज, स्वदेज और उद्भिज्ज इन चतुर्विध सृष्टि से उत्पन्न होता है। 

 

3. आधिदैविक दुःख- 

  • वह दुःख है जो दैव (देवताओं अथवा द्युलोक) के कारण होता है। ये है शीत, वर्षा, बज्रपातादि । तत्वकौमुदी के अनुसार यक्ष राक्षस विनायक ग्रह आदि के द्वारा उत्पन्न दुःख आधिदैविक दुःख है। 
  • सांख्य दर्शन केवल दुःखों को ही नहीं बताता है चूँकि दुःख हेय हैं अतः उनके प्रहाण के लिए लौकिक व वैदिक दोनों ही उपायों की दुःखों के ऐकान्तिक व आत्यन्तिक शमन में असमर्थता सिद्ध करके कैवल्य का प्रतिपादन करता है।

 

सत्कार्यवाद 

  • कारणता सिद्धान्त सर्वत्र लागू होता है। इसमें कारण कार्य का स्वरूप व सम्बन्ध पर विचार किया जाता है। कारणता सिद्धान्त मानता है कार्य उत्तरवर्ती होता है और कार्य का स्वरूप अलग होता है। दोनों से अलग-अलग तरह के प्रयोजन सिद्ध होते हैं। उत्पत्ति के पहले कारण और कार्य में क्या सम्बन्ध है इससे सम्बन्धित तीन प्रश्न उठते हैं। क्या कार्य उत्पत्ति के पहले कारण में सत् है ? क्या असत् है ? क्या सत् और असत् दोनों है ? इन प्रश्नों के समाधानार्थ भारतीय दर्शन मे कई सिद्धान्त मिलते हैं। जो मानते है कि कार्य उत्पत्ति के पहले कारण मे सत् है वे सत्कार्यवादी कहे जाते हैं। जो यह मानते हैं कि कार्य उत्पत्ति के पहले कार्य में असत् है उन्हें असत्कार्यवादी कहते हैं और जो यह मानते हैं कि कार्य कारण में सत् और असत् दोनों होता है उन्हें सदसत्कार्यवादी कहा जाता है। सत्कार्यवाद को सांख्ययोग और वेदान्त स्वीकार करते हैं। जो र्दशन कार्य को उत्पत्ति के पहले कारण में असत् मानते हैं। वे असत्कार्यवादी हैं। न्याय व वैशेषिक दर्शन असत् कार्यवाद मानते हैं। न्यायवैशेषिक दर्शन असत्कार्यवाद के आरम्भवादी स्वरूप को मानता है। इनके अनुसार कारण से अलग कार्य सम्पन्न होता है और कार्य से अलग प्रयोजन पूरे होते हैं तथा उत्पत्ति और व्यय कार्य में दिखाई पड़ता है। कार्य एक नवीन सृष्टि है। बौद्ध दर्शन क्षणभंगवाद को मानता है। जैन दर्शन सदसत्कार्यवादी है। जैन दर्शन स्याद्वाद से सदसत् कार्यवाद को सिद्ध करता है।

 

सांख्य सम्मत सत्कार्यवाद का स्वरूप- 

  • सांख्य दर्शन के अनुसार जैसे कार्य उत्पत्ति के बाद सत् होता है ठीक वैसे ही यह उत्पत्ति के पहले भी कार्य कारण में सत् होता है। यह मानता है कि सत् से ही सत् उत्पन्न होता है। कारण कि कार्य के रूप में परिणति है। न कि नवीन सृष्टि। जैसे- दूध कारण है और दही कार्य है। दही दूध का परिणाम है। व्यक्त आदि कार्य हैं और प्रकृति कारण है। कार्य कारण से तात्विक रूप से भिन्न नहीं है बल्कि वह कारण की ही परिणति है। इसी से कारण के ही गुण वाले कार्य होते हैं। यदि कार्य कारण में पहले से ही मौजूद है? तो कारणावस्था और कार्य में क्या अन्तर है? कारण में विद्यमान कार्य अनभिव्यक्त होता है और परिणति के बाद व्यक्त हो जाता है। इस प्रकार वह सिद्धान्त जो उत्पत्ति के पहले कारण में कार्य को सत् मानता है वह सत् कार्यवाद कहलाता है। सत्कार्यवाद का प्रयोजन प्रकृति के अस्तित्व की सिद्धि है। इसके दो रूप हैं- 1. परिणामवाद, 2. विवर्तवाद । सांख्य प्रकृति परिणामवाद को मानता है। और विशिष्टाद्वैत दर्शन व्रह्म परिणामवाद को मानता है।

 

सांख्यकारिका सत्कार्यवाद की सिद्धि के लिए 5 हेतुओं को उपन्यस्त करती है-

 असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । 

शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ।। का09

 

कार्यं सत् - 

  • उत्पत्ति के पहले कार्य कारण मे विद्यमान रहता है। असदकरणात्-अर्थात् जो वस्तु अनस्तित्व वाला होता है उसे किसी भी कारण से उत्पन्न नही किया जा सकता है। जैसे आकाश पुष्प असत् है उसे किसी कारण से नही उत्पन्न किया जा सकता है और करोड़ो शिल्पी मिलकर नीले रंग को पीला नही वना सकते है। अतः जैसे उत्पत्ति के बाद कार्य सत् होता है ठीक वैसे ही उत्पत्ति के पूर्व भी कार्य कारण में सत् होता है।

 

उपादानग्रहणात् - 

  • यतः कार्य की उत्पत्ति के लिए सम्बन्धित उपादान का ग्रहण किया जाता है। यह लोक सिद्ध है कि जो व्यक्ति जिस कार्य को चाहता है वह उससे संम्बन्धित उपादान कारण का ग्रहण करता है, जैसे दही को प्राप्त करने के लिए दूध को ही ग्रहण करता है। इससे सिद्ध है कि कार्य उत्पत्ति के पहले कारण मे सत् है।

 

सर्वसम्भवाभावात्-

  • यतः सभी कार्यों की सभी कारणो से उत्पत्ति नही होती है अतः यह भी सिद्ध करता है कि कार्य कारण में उत्पत्ति के पहले से ही मौजूद रहता है। जैसे-सुवर्ण की रजत् तृण, धूल, और बालू से उत्पत्ति नही होती है।

 

शक्तस्य शक्यकरणात् - 

  • यतः जो कारण जिस कार्य की उत्पत्ति मे शक्त अर्थात समर्थ होता है उससे उसी शक्य कार्य की उत्पत्ति होती है। अतः सिद्ध होता है कि कार्य कारण मे सत् है, जैसे शक्य तेल, घट, पट, को उत्पन्न करने में क्रमशः तिल, मृत्तिका और तन्तु ही समर्थ हैं।

 

कारणभावाच्च-

  • यतः कार्य कारणात्मक होता है जो लक्षण कारण का होता है वही लक्षण कार्य का भी होता है। यह सिद्ध करता है कि कार्य कारण मे पहले से विद्यमान है जैसे जौ से जौ ही उत्पन्न होता है, धान से धान ही उत्पन्न होता है, गेहूँ से गेहूँ उत्पन्न होता है। 

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