पुरूष बहुत्व प्रकृति पुरूष सम्बन्ध सांख्य दर्शन | Purush Sankhya Darshan

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पुरूष बहुत्व  प्रकृति पुरूष सम्बन्ध

पुरूष बहुत्व  प्रकृति पुरूष सम्बन्ध सांख्य दर्शन | Purush Sankhya Darshan

पुरूष बहुत्व 

  • पुरूष अकारण नित्य व्यापकनिष्क्रियआश्रयअलिंगनिरवयवस्वतन्त्रनिर्गुणविवेकीअविषयअसामान्यचेतनअपरिणामी तत्व है। वह न तो प्रकृति है न विकृति है। विभिन्न दर्शनों में पुरूष के संख्या विषयक विचार अलग-अलग मिलते हैं। अद्वैत वेदान्त दर्शन आत्मा को अद्वय मानता है। किन्तु सांख्य दर्शन पुरूषकी सत्ता एक नहीं अनेक मानता है। सभी पुरूष तात्विक रूप ससमानहैं। किन्तुउनमें संख्यागत भेद है। पुरूष बहुत हैं यह सिद्धान्त पुरूष बहुत्व सिद्धान्त है। 

पुरूष बहुत्व को सिद्ध करने के लिए ईश्वर कृष्ण ने सांख्य कारिका में हेतुओं को दिया है- 

जननमरणकरणानां प्रतिनियमादयुगपत्प्रवृत्तेश्च 

पुरूष बहुत्वं सिद्धं त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ।। का0 18

 

पुरूष बहुत हैं इसके निम्न पाँच हेतु हैं- 

जननमरणकरणानां प्रतिनियमाद् 

  • जन्म मृत्यु तथा इन्द्रियों की प्रत्येक जीव के साथ अलग-अलग व्यवस्था होने के कारण पुरूष बहुत हैं। यदि आत्मा एक होती तो एक ही जीव के जन्म से सभी जीवों का जन्म हो जाता। लेकिन हम देखते हैं कि एक ही जीव के जन्म के साथ सभी जीवों का जन्म नहीं होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि आत्मा एक नहीं अनेक है। इसी तरह से प्रत्येक जीव की मृत्यु भी अलग-अलग होती है। ऐसा नहीं है कि यदि एक की मृत्यु हो जाय तो सभी मर जाय। इससे भी सिद्ध होता है कि आत्मा एक नहीं अनेक है। इसी तरह से प्रत्येक जीव के साथ ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ के बीच अलग-अलग व्यवस्था देखने को मिलती है। यदि आत्मा एक ही होती तो एक जीव के अन्धे होने पर सभी जीव अन्धे हो जाते। एक ही जीव के पंगु होने पर सभी जीव पंगु हो जाते। किन्तु ऐसा लोक में दिखाई नहीं पड़ता है। अतएव यह मानना युक्ति संगत है कि जीव एक नहीं अनेक हैं। इस अंश में पुरूष बहुत्व के साधक तीन हेतु जन्म की व्यवस्थामृत्यु की अलग-अलग व्यवस्था और इन्द्रियों की अलग-अलग व्यवस्था को बताया गया है।

 

अयुग्पद्मवृत्तेश्च 

  • और सभी जीवों के एक ही साथ सदृश कार्यों में प्रवृत्त न होने से भी पुरूष का बहुत्व सिद्ध होता है। यदि आत्म तत्व एक होता तो सभी जीवों की क्रियाओं में सादृश्य दिखाई पड़ताकिन्तु हम देखते हैं कि सभी जीव एक ही साथ एक ही कार्य में प्रवृत्त नहीं होते हैं कुछ जीव धर्म मेंप्रवृत्त होते हैं तो कुछ अधर्म में। कुछ जीव वैराग्य में प्रवृत्त होते हैं तो कुछ जीव आसक्ति में लगे होते हैं। कुछ जीव ऐश्वर्य में प्रवृत्त होते हैं तो कुछ जीव अनैश्वर्य की ओर प्रवृत्त होते हैं। इससे यह सिद्ध होता है पुरूष एक नहीं है बल्कि अनेक है। 

 

त्रैगुण्यविपर्ययात्  

  • तीनों गुणों के परिणाम सुख दुःख मोह में विपर्यय दिखाई पड़ने से पुरूष बहुत हैं। यदि आत्मा एक हो तो सभी जीवों को एक ही साथ सुखी एक ही साथ दुखी अथवा एक ही साथ मोहयुक्त होना चाहिएकिन्तु हम देखते हैं समान जन्म होने पर भी सात्विक पुरूष सुखीराजसी दुखी तथा तामसी व्यक्ति मोहयुक्त होता। इस कारण यही मानना युक्तिसंगत है कि आत्मा एक नहीं अनेक है। इस प्रकार यह सिद्ध है पुरूष बहुत हैं।

 

प्रकृति पुरूष सम्बन्ध 

  • सांख्य दर्शन द्वैतवादी दर्शन है प्रकृति एवं पुरूष के सम्बन्ध से प्रकृति में गुणक्षोभ होता है। और सरूप परिणाम वाली प्रकृति विरूप परिणाम वाली होकर व्यक्त का प्रसव करती है। प्रकृति त्रिगुणात्मिका अविवेकी विषय सामान्य अचेतन और परिणामी है। पुरूष तत्व निर्गुण विवेकी भोक्ता असाधारण चेतन और अपरिणामी है। प्रकृति अचेतन और क्रियाशील है। पुरूष चेतन और निष्क्रिय है। दोनों में संयोग के कारण अचेतन प्रकृति के विकार महत् आदि में चैतन्य भास होता है और पुरूष में कर्तृत्व आदि की प्रतीति। प्रकृति जो अचेतन है तथा पुरूष जो चेतन है। दोनों का संयोग क्यों होता है। इसपर सांख्य कारिका में कहा गया है-

 

पुरूषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य 

पड्ङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत् कृतः सर्ग। । का0-21

 

  • पुरूष द्वारा प्रधान को देखने के लिए और प्रधान द्वारा पुरूष का कैवल्य सम्पन्न कराने के लिए लंगड़े व अन्धे की तरह दोनो का संयोग होता है। उन दोनो के संयोग का फल सृष्टि है। पुरूष का प्रकृति के साथ जो संयोग है वह प्रकृति को देखने के लिए होता है। प्रकृति महत् से महाभूत पर्यन्त जो सृष्टि है उसे पुरूष देखता है। और प्रकृति का पुरूष के साथ जो संयोग है। वह पुरूष का कैवल्य सम्पन्न कराने के लिए है। इन दोनों का सम्बन्ध पंगु और अँधे की तरह से होता है। पुरूष पंगु है और प्रकृति अँधी है। जैसे गमन करने में असमर्थ पंगु एवं देखने में असमर्थ अँधा व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्तकर वियुक्त हो जाते हैं। वैसे ही क्रिया रहित दर्शन शक्ति वाले पुरूष और क्रियावती किन्तु दर्शन शक्ति रहित प्रकृति भी अपने अपने दर्शन और कैवल्य रूप प्रयोजन को सम्पन्न करके वियुक्त हो जाते है। प्रकृति और पुरूष का सम्बन्ध सप्रयोजन है। सोद्देश्य है। संयोग का अर्थ वाचस्पति के अनुसार प्रकृति और पुरूष की सन्निधि है। डॉ संगम लाल पाण्डेय के अनुसार जब तक पुरूष और प्रकृति का विवेक नहीं हो जाता तब तक कैवल्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। विवेक प्राप्ति के लिए पुरूष को प्रकृति की आवश्यकता है। पुरूष और प्रकृति की आवश्यकताओं में भोगों में एकता है। पुरूष जिस विवेक को चाहता है। उसी को प्रकृति भी चाहती है। इसी कारण दोनों का संयोग होता है।। प्रकृति और पुरूष दोनों एक दूसरे का उद्देश्य पूरा करते है। 


चेतनाशून्य . 

  • दूध बछड़े के पोषण के लिए गाय के शरीर से प्रस्रवित होता हैवैसे ही ज्ञानशून्य (अचेतन) प्रकृति का परिणाम पुरूष के कैवल्य के लिए है।। प्रकृति और पुरूष का संयोग अनादि है। यह देश और काल में घटित होने वाला नहीं है। प्रकृति और पुरूष के सम्बन्ध की व्याख्या करने के लिए यह उदाहरण भी दिया जाता है- जैसे चुम्बक के सन्निधि मात्र से ही लोहे के टुकड़ों में गतिशीलता होती है। ठीक ऐसे ही पुरूष की सन्निधि मात्र से ही प्रकृति विरूप परिणाम वाली होती है।

 

  • पुरूष का सम्बन्ध विशेष रूप से प्रकृति के परिणाम बुद्धि से होता है। लेकिन इस सम्बन्ध का स्वरूप स्पष्ट करना कठिन है। बुद्धि करणों में सूक्ष्म है। इसी में पुरूष की छाया पड़ती है। जिसके कारण बुद्धि चेतनावति हो जाती है। और वह पुरूष स्वरूपा हो जाती है। ऐसी बुद्धि पुरूष के लिए भोग को उत्पनन करती है। बुद्धि के द्वारा ही पुरूष सुख-दुःख मोहात्मक संसार से भोक्ता या साक्षी के रूप में जुड़ता है। जो बुद्धि प्रकृति का भोग सम्पन्न करती है वही बुद्धि अन्त में प्रकृति और पुरूष का विभेद ज्ञान भी उत्पन्न करती है2। बुद्ध और पुरूष के सम्बन्ध का निरूपण भी जटिल है पुरूष और लिंग शरीर का संयोग देश और काल में घटित होने वाला नहीं है किन्तु दोनों संयोग के अनन्तर अचेतन लिंग शरीर चेतन सा हो जाता है और निष्क्रिय पुरूष कर्ता और भोक्ता सा हो जाता है। 
  • सांख्य दर्शन ने प्रकृति और पुरूष के संयोग की संतोष जनक व्याख्या नहीं कर सका है। प्रकृति और पुरूष का संयोग सोद्देश्य है। और इन दोनों के संयोग का फल है सृष्टि। जब तक प्रकृति और पुरूष का संयोग रहता है। तब तक सृष्टि की स्थिति रहती है। दोनों का वियोग होने पर प्रलय की स्थिति होती है।

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