काव्य हेतु तथा काव्य की प्रेरणा से अभिप्राय |भारतीय काव्यशास्त्र परम्परा | Kavya Hetu evam Parampara

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 काव्य की प्रेरणा एवं काव्य और हेतु परम्परा

काव्य हेतु तथा काव्य की प्रेरणा से अभिप्राय |भारतीय काव्यशास्त्र परम्परा | Kavya Hetu evam Parampara


 

काव्य की प्रेरणा एवं काव्य और हेतु प्रस्तावना 

साहित्य की निर्मिति किस माध्यम से होती है। साहित्य लिखने की प्रेरणा कहाँ से प्राप्त होती है। किसी घड़े का निर्माण जैसे मिट्टी से होता है, वस्त्र बनाने के लिए कपास कारण होता है, इसी तरह काव्य जिसे हम कवि का कर्म कहते हैं, उसके निर्माण के लिए भी कोई न कोई कारण होता है, इस कारण को ही साहित्यशास्त्र की शब्दावली में काव्यहेतु कहा जाता मिट्टी है, पानी है, चाक है लेकिन कुम्हार का मन घडे का निर्माण करने के लिए तत्पर नहीं है, तो क्या घड़ा बन जाएगा ? नहीं। इसी तरह कवि मे प्रतिभा है, उसे विविध विषयों का ज्ञान है, उसने काव्यलेखन का निरन्तर अभ्यास भी किया है, किन्तु उसका मन नहीं है तो क्या वह काव्य लिखेगा? नहीं। काव्यलेखन की प्रेरणा मिलने पर ही वह रचना लिखेगा। अतः काव्य प्रेरणा भी काव्यलेखन का कारण है। प्रस्तुत इकाई द्वारा काव्य की प्रेरणा तथा काव्य के हेतु के विषय में हम विचार करेंगे।


काव्य हेतु तथा काव्य की प्रेरणा से अभिप्राय

 

आश्चर्य होता है यह सोचकर कि कवि के पास वो कौन सा जादू है, जिसके बल पर वह किसी भी विषय को बड़े आकर्षक रूप में अभिव्यक्त कर देता है, जबकि वही रोज की परिचित भाषा होती है, वे ही प्राकृतिक दृश्य होते हैं, वही उषा की लालिमा, शाम का झुटपुटा कलियों का खिलना, पक्षियों का चहचहाना, पर कवि के चयनित शब्दों में वो सामर्थ्य न जाने कहाँ से आती है कि हर बार कवि नये रूप में अपनी बात कह देता है । आपने प्रायः सुना होगा कि रामकथा बहुत छोटी है

 

- एक राम एक रावन्ना, एक क्षत्रिय एक वामन्ना । 

वाने वाकी नार हरी, वाने वाके प्राण हरे, तुलसी लिख गए पोथन्ना ।

 

लेकिन इस छोटी सी कथा को वाल्मीकि से लेकर आज तक अनेक रचनाकारों ने अपनी अभिव्यक्ति का विषय बनाया है। अभिव्यक्ति का विषय ही नहीं बनाया है अपितु हर बार बिल्कुल नये रूप में प्रस्तुत किया है। रचनाकार की मौलिक सूझबूझ से एक ही विषय पुनर्नवता को प्राप्त होकर सहदय को प्रभावित करता है। और हर बार वही पुराना विषय नया लगने लगता है। आचार्यों का मानना है कि कवि की प्रतिभा काव्यरचना के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण है, जिसके बल पर कवि काव्यरचना में समर्थ होता है। प्रतिभा के साथ-साथ व्युत्पत्ति तथा अभ्यास को भी काव्यहेतु के रूप में स्वीकार किया जाता है। कवि में प्रतिभा है, विविध विषयों का उसे ज्ञान है और उसने बार-बार अभ्यास से अपनी रचनाओं को परिमार्जित भी कर लिया है, लेकिन उसके अन्तर्मन में काव्य रचने के लिए रुचि नहीं है, तो भी काव्यरचना सम्भव नहीं है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि काव्य रचने की प्रेरणा के बिना काव्य नहीं रचा जा सकता। कवि की चेतना जब किसी घटना, किसी परिस्थिति, किसी व्यक्ति, किसी गुण या किसी विचार से व्याप्त हो जाती है, तब साहित्य का जन्म होता है। इस सन्दर्भ में आदिकवि वाल्मीकि की काव्यरचना में प्रवृत्त होने की कथा का यहाँ उल्लेख किया जा सकता है। कहते हैं कि आदि कवि वाल्मीकि ने एक दिन नारद से पूछा कि आजकल इस लोक में सौन्दर्य सम्पन्न और वीर, परोपकारी, पराक्रमी, सदाचारी, सत्यनिष्ठ, सत्यवादी कौन है, जिसके संग्राम में कुपित होने पर देवता भी भयभीत हो जाते हैं। नारद ने उन्हें इस विषय में इक्ष्वाकुवंशी राम के सन्दर्भ में बताया। इसके उपरान्त वाल्मीकी अपने शिष्यों के साथ तमसा नदी के तट पर स्नान करने गए। रास्ते में उन्होंने क्रोंच पक्षियों के युगल को विहार करते देखा। उसी समय एक बहेलिए ने क्रोंच को मार दिया और वाल्मीकि ने देखा कि उसके वियोग में क्रोंची ने करुण स्वर से आर्तनाद किया। मुनि की चेतना क्रोंची के शोक से शोकाकुल हो गई और उनके मुँह से यह श्लोक निकल गया- हे निषाद ! तुमने काममोहित क्रोंचमिथुन में से एक का वध कर दिया है, तुम वर्षों तक प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं होओगे- 

'मा निषाद प्रतिष्ठां त्वंगम: शाश्वतीक्ष्ामः, यत्क्रोंचमिथुनादेकमवधीकाम मोहितः

 

तमसा मे स्नान करते हुए, वहाँ से लौटते हुए, आश्रम में उठते बैठते मुनि की चेतना में क्रोंची का आतर्नाद निरन्तर गूँजता रहा, साथ ही उनके मन में यह विचार भी आया कि क्रोंची के शोक से उनका अपना मन इतना व्यथित हो गया है कि उस व्यथा को व्यक्त करना उनके लिए अपरिहार्य हो गया है। और इसके लिए उनके ह्रदय से अनायास रोज की परिचित बोली से अलग वाणी प्रस्फुटित हो गई । यह अलग वाणी 'श्लोक' के रूप में प्रस्फुटित हुई और मुनि ने अपने शिष्य से कहा कि ' शोक में प्रवृत्त मेरे हृदय से जो वाणी प्रस्फुटित हुई, वह श्लोक ही है- 'शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोको भवतु नान्यथा । इसी तरह महाकवि कालिदास, तुलसीदास अपनी पत्नियों से प्रताडित होने पर साहित्यरचना के लिए प्रेरित हुए ।

 

स्पष्ट है कि काव्यरचना की प्रेरणा में संवेग और बोद्धिक चिन्तन का महत्वपूर्ण योगदान है। कोई घटना, कोई परिस्थिति, कोई विचार, कोई व्यक्ति या कोई गुण जब कवि की चेतना में इतनी व्याप्त हो जाती है कि वह उस घटना आदि से तदाकार अनुभूति करता है, तब साहित्य की सर्जना हो जाती है। यह तदाकार अनुभूति केवल रचनाकार को ही नहीं होती अपितु किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को होती है, हाँ रचनाकार की प्रतिभा, निपुणता और अभ्यास उसकी इस अनुभूति को अनायास व्यक्त करने की सामर्थ्य से सम्पन्न बना देते हैं।

 

काव्यसृजन की प्रेरणा में जीवन की घटनाओं का महत्व बहुत अधिक है। डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त का कहना है-'घटना के अभाव में अनुभूति का उद्रेक नहीं होता और बिना अनुभूति के उद्रेक के घटना प्रभावशून्य सिद्ध होती है अत: दोनों का ही महत्त्व है। जीवन में घटनाएं तो बहुत होती हैं, किन्तु वे सभी ऐसी अनुभूति प्रदान नहीं करतीं कि जिससे काव्य रचना की प्रेरणा मिले। अत: इन दोनों में समन्वय स्थापित करते हुएकहा जा सकता है कि मार्मिक घटनाओं की अनुभूति काव्यरचना की प्रेरणा प्रदान करती है।

 

वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा, एम ए एच डी - 04, काव्यशास्त्र व समालोचना, पृ. 38 से उद्धृत

 

आपने अक्सर महसूस किया होगा कि किसी घटना को देखकर, सुनकर हमारे मन में विभिन्न विचार आते हैं और हम उन विचारों को बॉटना भी चाहते हैं, बस वह घटना हमें कुछ रचने के लिए प्रेरित करती है और हमारी अभिव्यक्ति की क्षमता और योग्यता उसके सन्दर्भ में हमें कुछ रचने के लिए समर्थ बनाती है। काव्यशास्त्र की शब्दावली में घटना का प्रभाव काव्य-प्रेरणा और रचने की ताकत काव्य है।

 

काव्य के हेतु विषयक भारतीय काव्यशास्त्र परम्परा 

यह बात हम पहले कह चुके हैं कि इस संसार में कोई भी कार्य कारण के बिना नहीं होता है। काव्य भी कवि का कार्य है और उसकी रचना में भी कुछ कारण जिनके बिना काव्यरचना सम्भव नहीं है। इन कारणों को काव्यहेतु कहा जाता हिन्दी साहित्य कोश में काव्य हेतु को इस रूप में पारिभाषित किया गया है- 'कवि शिक्षा के अन्तर्गत कवि में काव्य निर्माण की सामर्थ्य उत्पन्न करने वाले साधनों को 'काव्य हेतु' अथवा 'काव्य के कारण' कहा जाता है। भारतीय काव्यशास्त्र की सुदीर्घ परम्परा में आचार्यों ने विस्तार से काव्यहेतुओं की चर्चा की है। पश्चिम में भी इस बात पर चिन्तकों ने विचार किया है कि कवि में आखिर ऐसी कौन सी बात होती है, जो अन्य लोगों में नहीं होती और जिसके बल पर वह काव्यरचना में समर्थ होता है। प्रायः सभी चिन्तक यह मानते हैं कि काव्यरचना के लिए कवि की प्रतिभा सर्वप्रमुख कारण होती है। इस प्रतिभा के साथ साथ विविध विषयों का ज्ञान पाकर रचनाकार रचना करने में समर्थ होता है और निरन्तर अभ्यास उसकी लेखनी को निरन्तर परिमार्जित करता है।

 

काव्यहेतु विषयक हमारे काव्यशास्त्रियों के चिन्तन पर अब हम विचार करेंगे। सर्वप्रथम अग्निपुराण में काव्यहेतुओं के विषय में कहा गया है कि 'संसार में नरत्व दुर्लभ है, उसमें भी विद्या दुर्लभ है, विद्या में भी कवित्व दुर्लभ है और कवित्व में शक्ति अर्थात् प्रतिभा दुर्लभ है, व्युत्पत्ति दुर्लभ है और फिर विवेक भी दुर्लभ है-

 

नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र च दुर्लभा । 

कवित्वं दुर्लभं तत्र शक्तिस्तत्र च दुर्लभा ।। 

व्युत्पत्तिर्दुलभा तत्र विवेकस्तत्र दुर्लभः॥ अग्निपुराण, 337/4-


काव्यनिर्माण के साधनों-शक्ति, व्युत्पत्ति और विवेक का उल्लेख अग्निपुराण में हुआ है, इसके उपरान्त आचार्य भामह ने सर्वप्रथम स्पष्ट रूप से काव्यहेतुओं की चर्चा करते हुए प्रतिभा को काव्य का प्रमुख कारण माना है। उनका कहना है कि गुरु के उपदेश से जड़बुद्धि या अल्पबुद्धि वाला व्यक्ति शास्त्रज्ञ हो सकता है, लेकिन काव्यरचना तो कुछ प्रतिभासम्पन्न लोग ही कर सकते हैं। प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति को शब्दशास्त्र, छन्दशास्त्र, कोषग्रन्थ, इतिहासाश्रित कथाओं, लोकव्यवहार और विभिन्न कलाओं का ज्ञान प्राप्त करके काव्यरचना करनी चाहिए। उसे शब्द और उसके अभिप्रेत को जानकर काव्यमर्मज्ञों की सेवा करके और अन्यान्य कृतियों के अध्ययन के उपरान्त ही काव्य के लिए प्रवृत्त होना चाहिए. भामह प्रतिभा को काव्य का मुख्य कारण और काव्यज्ञशिक्षा और शास्त्रज्ञान को उसके सहायक कारण मानते हैं।

 

आचार्य दण्डी नैसर्गिक प्रतिभा, विविध शास्त्रों का परिशीलन और निरन्तर काव्यनिर्माण का अभ्यास - इन तीनों का काव्य निर्माण के लिए कारण रूपी सम्पदा मानते हैं-

 

नैसर्गिकी च प्रतिभा श्रुतं च बहुनिर्मलम् 

अमन्दश्चाभियोगोस्याः कारणं काव्यसम्पदः ॥

 दण्डी, काव्यादर्श, प्रथम परिच्छेदकारिका 103

 

वामन हेतु के लिए काव्यांग शब्द का प्रयोग करते हैं और लोक, विद्या और प्रकीर्ण को काव्य के अंग मानते हैं। लोक के अन्तर्गत लोकवृत्त और विद्या के अन्तर्गत शब्दशास्त्र, कोश, छन्दशास्त्र, कला, नीतिशास्त्र आदि विविध शास्त्र आते हैं। वामन द्वारा उल्लिखित काव्यहेतु अन्य आचार्यों से भिन्न अवश्य हैं, लेकिन विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि इन काव्यांगों का समाहार ऊपर वर्णित तीनों हेतुओं में ही हो जाता है। लोकवृत्त और शास्त्रज्ञान व्युत्पत्ति में सन्निविष्ट हो जाते हैं और लक्ष्यतत्व भी। अभियोग, वृद्धसेवा, अवेक्षण और अवधान रचनाभ्यास के ही विविध रूप हैं।

 

वामन के बाद रुद्रट ने काव्यनिर्माण के लिए शक्ति(प्रतिभा), व्युत्पत्ति और अभ्यास- तीनों को काव्यहेतु के रूप में स्वीकार किया है। (त्रितयमिदं व्याप्रियते- शक्तिर्व्युत्पत्तिरभ्यासः ।-काव्यालंकार, 1/4)। आनन्दवर्धन के अनुसार प्रतिभा ही काव्य का मुख्य कारण है। वे मानते हैं कि व्युत्पत्ति की कमी को भी शक्ति ढक लेती है और यदि कवि सशक्त है तो वह काव्यरचना में समर्थ होता ही है, भले ही वह काव्य बहुत उत्कृष्ट न हो। काव्यहेतुओं पर सबसे ज्यादा विस्तार से राजशेखर ने चर्चा की है। उन्होंने शक्ति और प्रतिभा दोनों को अलग मानते हुए शक्ति के क्षेत्र को व्यापक और प्रतिभा के क्षेत्र को शब्दसमूहों, विभिन्न अर्थों, अलंकार, तन्त्र, उक्तिमार्ग तक सीमित माना और शक्ति को काव्य का हेतु कहा।

 

काव्यहेतुओं के विषय में आचार्य मम्मट ने शक्ति, निपुणता और अभ्यास तीनों के सम्मिलित रूप को काव्यहेतु माना-

 

'शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात्। 

काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे ॥ काव्यप्रकाश, 1/3

 

मम्मट की दृष्टि में काव्य के निर्माण में शक्ति प्रमुख कारण है। वह काव्यत्व की सिद्धि के लिए बीजरूप संस्कार विशेष है, जिसके अभाव में काव्य का निर्माण नहीं हो सकता है। शक्ति के साथ व्याकरण,अभिधान, कोश,कला, महाकवियों के काव्य और इतिहास-पुराणादि के परिशीलन से उत्पन्न ज्ञान अर्थात् व्युत्पत्ति और काव्यरचना को जानने वालों के उपदेश से काव्ययोजना में बार बार प्रवृत्त होना- अर्थात् अभ्यास-भी काव्यरचना के हेतु हैं लेकिन ये तीनों अलग अलग कावयहेतु नहीं हैं, बल्कि तीनों मिलकर काव्यहेतु होते हैं।

 

मम्मट द्वारा काव्यहेतुओं की व्याख्या के उपरान्त संस्कृत काव्यशास्त्रियों ने काव्यहेतुओं पर जो भी विचार किया है, वह पूर्ववर्ती आचार्यों की दृष्टि का ही पिष्टपेषण है। वाग्भट, हेमचन्द्र, पण्डितराज जगन्नाथ आदि ने प्रतिभा को काव्य का प्रमुख हेतु माना है। हमारे रीतिकालीन आचार्यों ने भी संस्कृत के आचायों की ही तरह प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास को काव्यहेतुओं के रूप में उल्लिखित किया है। यहाँ एक उदाहरण से हम अपनी बात की पुष्टि करेंगे। रीतिकालीन आचार्य भिखारीदास ने अपनी कृति 'काव्यनिर्णय' में काव्यहेतुओं के विषय में लिखा है- 


सक्ति कबित्त बनाइबे की जिहि जन्मनछत्र में दीनी विधातें । 

काव्य की रीति सिख्यो सुकबीन सों देखी सुनी बहुलोक की बातें। 

दासजू जामे एकत्र ये तीनों बनै कबिता मनरोचक तातैं। 

एक बिना न चलै रथ जैसे धुरंदर सूत की चक्र निपातैं।

 

भिखारीदास का काव्यहेतु विषयक मत मम्मट के मत के अनुसार ही है। भिखारीदास शक्ति को ईश्वरप्रदत्त मानकर उसे काव्य का हेतु कहते हैं। शक्ति के अतिरिक्त सुकवियों से काव्य की शिक्षा और लोकानुभव को भी काव्य का हेतु कहा है।

 

काव्यहेतु विषयक इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को देखने से यह स्पष्ट होता है कि आनन्दवर्धन, पण्डितराज जगन्नाथ आदि केवल प्रतिभा को काव्यहेतु मानते हैं और भामह, दण्डी, रुद्रट, मम्मट आदि ने प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास तीनो का समन्वय करते हुए तीनों को एक साथ काव्य का हेतु स्वीकार किया है। और यह सम्यक् भी है। प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास- ये तीनों ही काव्य के हेतु हैं और तीनों अलग-अलग नहीं, अपितु कवि व्यक्तित्व के विभिन्न पक्ष और परस्पर आश्रित हैं। प्रतिभा के अभाव में व्युत्पत्ति और अभ्यास का कोई महत्व नहीं है और व्युत्पत्ि और अभ्यास के अभाव में प्रतिभा का कोई महत्व नहीं। एक कहावत आपने अक्सर सुनी होगी - पूत के पाँव पालने में ही पहचान लिए जाते हैं, यानी शैशव काल से ही व्यक्ति की प्रतिभा का पता चल जाता है, लेकिन यदि उसकी प्रतिभा को सही दिशा निर्देश नहीं मिलता, उसकी प्रतिभा को परिमार्जित नहीं किया जाता तो वह ठीक वैसे ही धारहीन हो जाती है जैसे किसी अस्त्र का प्रयोग न किये जाने की स्थिति में उसमें जंग लग जाती है। सिद्ध है कि प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास के हेतु हैं। इन हेतुओं में एक हेतु और कहा गया है- समाधि या अवधान। यह बात सत्य है कि में प्रतिभा है, उसने विविध विषयों का अध्ययन भी किया है और निरन्तर अभ्यास से अपनी प्रतिभा मजा भी है लेकिन उसका मन एकाग्र नहीं है, तो भी काव्यरचना नहीं हो सकती। किन्तु मन की एकाग्रता तो प्रत्येक कार्य के लिए आवश्यक है अतः उसे काव्यहेतुओं में शामिल करने की आवश्यकता नहीं है। आगे हम काव्य के इन तीन हेतुओं के विषय में समझने का प्रयास करेंगे।

 

काव्यरचना और प्रतिभा 

आचार्यों का यह मानना है कि प्रतिभा काव्य का वह हेतु है, जिसके बिना काव्यरचना हो ही नहीं सकती और यदि हो जाती है, तो उपहास्यता को प्राप्त होती है। यह प्रतिभा कवित्व का बीज है, और यह कवि को पूर्व पूर्व जन्मों के संस्कारों से प्राप्त होती है। यह नवनवोन्मेषशालिनि अर्थात् नई नई उद्भावना करने वाली होती है। यह कवियों के प्रत्युत्पन्नमतित्व (जिसे 'Presence of mind कहा जाता है) की द्योतक होती है। संस्कृत के आचार्य भट्टतौत ने लिखा है-

 

बुद्धिस्तात्कालिक ज्ञेया मतिरागाभिगोचरा । 

'प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनि प्रतिभा मता" - काव्यकौतुक, पृ 212

 

नवनवोन्मेषशाली प्रज्ञा को प्रतिभा कहा जाता है। मनुष्य की जन्मजात दैवी शक्ति, जिससे उसके अन्दर नवीन वस्तुओं की रचना करने की स्फूर्ति पैदा होती है, प्रतिभा है। भामह के अनुसार यह प्रतिभा किसी किसी को ही प्राप्त होती है। वामन के अनुसार प्रतिभा प्राक्तन जन्मों के संस्कार से युक्त होती है। रुद्रट का मानना है कि मन की एकाग्र अवस्था, जिसमें अभिधेय का अनेक रूपों में विस्फुरण होता है और जिसमें अक्लिष्ट पद सूझ पडते हैं, उसे शक्ति कहते हैं। यह शक्ति दो प्रकार की हाती है- सहजा और उत्पाद्या। कवि में स्वाभाविक रूप में विद्यमान प्रतिभा सहजा है और साधनों के उपयोग से उत्पन्न की जाने वाली उत्पाद्या । राजशेखर ने बुद्धि के तीन प्रकार बताए हैं- स्मृति, मति और प्रज्ञा| स्मृति वह बुद्धि है, जो अतीत का स्मरण कराती है, मति वर्तमान काल से जुडी है और प्रज्ञा भविष्य अर्थ को प्रकृष्ट रूप में ज्ञात करने वाली होती है। ये तीनों प्रकार की बुद्धिकवियों का उपकार करती हैं और दो प्रकार से कवियों में स्थित रहती हैं। जन्मजात रूप में और आहार्य रूप में। इस प्रकार कवि भी दो प्रकार के होते हैं- बुद्धिमान और आहार्य बुद्धि ।

 

पश्चिम में भी काव्यरचना के लिए प्रतिभा के महत्व को विद्वानों ने स्वीकार किया है। इस सन्दर्भ में सुप्रसिद्ध चिन्तक प्लेटो को याद किया जा सकता है। प्लेटो का मानना है कि 'यदि कोई व्यक्ति कविता की देवी 'म्यूज' से से प्राप्त होने वाली प्रेरणा के अभाव में काव्यमन्दिर में प्रवेश पाना चाहता है और सोचता है कि वह वहाँ अपनी कला के बल पर प्रवेश पा लेगा, तो मैं कहता हूँ कि उसे और उसकी कविता को काव्य के पवित्र मन्दिर में प्रवेश नहीं मिलेगा क्योंकि वह उस व्यक्ति की तुलना में कहीं भी नहीं ठहरता, जिसे कविता की देवी से प्रतिभा रूपी प्राकृतिक शक्ति (Muse's madness, or Natural gift) की प्राप्ति है। प्लेटो की मान्यता है कि यदि तुम्हारे पास कृ शक्ति है और उसे तुमने आवश्यक वस्तुओं के ज्ञान तथा अभ्यास द्वारा मांज लिया है, तो तुम श्रेष्ठ कवि हो सकते हो। स्पष्ट है कि पश्चिमी चिन्तक भी प्रतिभा, व्युत्पत्ति, और अभ्यास से परिचित हैं। पश्चिम के अनेक चिन्तकों ने इस बात पर विचार किया है कि कवि में ऐसी कौन सी बात होती है, जिसके बल पर वह काव्यरचना में समर्थ हो जाता है। वर्डस्वर्थ के अनुसार 'कवि कौन होता है? वह मानव होता है, मानवों से ही अपनी बात कहता है: हाँ उसकी संवेदनशक्ति अधिक जीवन्त होती है, उसे मानवस्वभाव का अधिक गम्भीर ज्ञान होता है, उसकी आत्मा अधिक विशाल होती है...... अभ्यासवश वह जो कुछ सोचता और अनुभव करता है, उसे अभिव्यक्त करने की अधिक तत्परता उसने अर्जित कर ली है। (पाश्चात्य काव्यशास्त्र की परम्परा, सं., डॉ. नगेन्द्र )

 

पश्चिम में प्रतिभा को जीनियस अर्थात् दुनिया के छिपे हुए सौन्दर्य को अनावृत्त करने में समर्थ कहा गया है। कल्पना के रूप में भी प्रतिभा को स्वीकार किया गया है और कल्पना को विस्तार से विवेचित भी किया गया है। प्लेटो की दृष्टि में कल्पना फैंटेसिया है, अरस्तू का मानना हैं कि रचनाकार अपनी कल्पना के बल पर नाटक के विभिन्न पात्रों में प्रविष्ट होकर यह जानने की कोशिश करता है कि दर्शकों या पाठकों पर उसके नाटक का क्या पभाव पडेगा? कॉलरिज कवि- शक्ति को कल्पना मानते हैं, और उसके दो भेद करते हैं- प्रारम्भिक और दूसरी । दूसरी कल्पना भारतीय कारयित्री प्रतिभा है, जिसके बल पर कवि नूतन निर्माण करता है। क्रोचे की सहानुभूति का आधार भी कल्पना ही है, फ्रायड के अनुसार दिवास्वप्नों या कल्पनाचित्रों की सृष्टि करना अतृप्त मानव का स्वभाव है।

 

संक्षेप में कहा जा सकता है कि पश्चिमी चिन्तकों का मानना है कि कवि में अन्य लोगों की अपेक्षा संवेदना अधिक प्रखर होती है। उसमें एक शक्ति ऐसी होती है, जो सामान्य जन में नहीं होती। इसी शक्ति के सहारे वह अप्रत्यक्ष वस्तुओं को प्रत्यक्ष कर लेता है।

 

2 काव्य रचना और व्युत्पत्ति

 

काव्य का दूसरा हेतु है व्युत्पत्ति । लोकहृदय का ज्ञान प्राप्त करने के लिए व्युत्पत्ति अत्यावयक है। राजशेखर के अनुसार औचित्यानौचित्य का विवेक और बहुज्ञता ही व्युत्पत्ति है। व्युत्पत्ति के अन्तर्गत सभी प्रकार का लौकिक, शास्त्रीयज्ञान, लक्षण तथा लक्ष्य ग्रन्थों की जानकारी, छन्दशास्त्र, अलंकारशास्त्र का ज्ञान, विविध कलाओं की जानकारी, कोश, व्याकरण आदि की जानकारी आदि आ जाते हैं। इस बात को आप इस तरह समझ सकते हैं- यदि आपसे कहा जाय कि बागेश्वर में लगने वाले बग्वाल मेले का या नैनीताल में लगने वाले नन्दादेवी के मेले का वर्णन कीजिए और आपको उस मेले से सन्दर्भित यथेष्ट जानकारियाँ नहीं हैं, तो आपमें लिखने की क्षमता होने पर भी क्या आप ठीक ठीक वर्णन कर पाएंगे? नहीं। उसका सुन्दर, ठीक ठीक वर्णन आप भी कर सकेंगे जब उसके विषय में आपको पूरी जानकारी हो। हमारे आचार्यों का भी यह मानना है कि काव्यपरम्परा का अध्ययन करके कवि अपनी रचना को सुन्दर, यथार्थ से सम्पन्न बना सकता है।

 

शास्त्रज्ञान द्वारा कवि के कथन में सौन्दर्य और व्यवस्था आती है, लोकज्ञान द्वारा वह अपनी विषयवस्तु को सम्यक् रूप से व्यक्त कर सकता है, अपने अनुभवजन्य ज्ञान से कवि लोक की प्रस्तुति करने में सफल होता है। व्यवहारज्ञान द्वारा वह जीवन और जगत् से जुडी विभिन्न स्थितियों, समस्याओं पर विचार करके उनका समाधान कर सकता है। काव्यदोषों के निराकरण के लिए भी व्युत्पत्ति आवश्यक है। व्युत्पत्ति को ही आचार्य मम्मट ने निपुणता कहा है। यह निपुणता शास्त्रज्ञान, लोकज्ञान, विद्याज्ञानादि से तो प्राप्त होती ही है, काव्यमर्मज्ञों की निकटता से भी प्राप्त होती है। पश्चिम के सुप्रसिद्ध विचारक मैथ्यू आर्नल्ड कहते हैं कि रचनाकार को चाहिए कि वह श्रेष्ठ कवियों की रचना की कुछ पंक्तियों को कसौटी के रूप में चुने और फिर उनके आधार पर अपनी रचना करे । काव्यरचना का नैपुण्य प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि श्रेष्ठ साहित्यिक कृतियों का निरन्तर अध्ययन हो, अपनी रचना को आलोचक की दृष्टि से परखा जाय और विविध विषयों की जानकारी लेते रहा जाय। पश्चिम के नव्यशास्त्रवादी चिन्तकों ने भी व्युत्पत्ति, लोकशास्त्र के निरीक्षण पर और औचित्यानौचित्य के ज्ञान पर बल दिया है।

 

काव्य रचना और अभ्यास 

आपने यह कहावत बार-बार सुनी होगी- 'करत-करत अभ्यास के जडमति होत सुजान, रसरी आवत घाट ते सिल पर परत निसान'अर्थात् अभ्यास द्वारा जड़बुद्धि वाला व्यक्ति भी ज्ञानवान् हो जाता है जैसे पत्थर पर निरन्तर पानी गिरने से पत्थर में भी निशान बन जाते हैं। अभ्यास से आशय है निरन्तर प्रयास करना। हमारे चिन्तकों का मानना है कि काव्य को से सुचारु रूप करने के लिए अभ्यास भी आवश्यक है। काव्यज्ञों या काव्यनिर्माण के तत्वों को जाननेवाले व्यक्तियों सम्पन्न का साहचर्य प्राप्त करके उनके निर्देशन में निरन्तर अभ्यास करना कवि का कर्तव्य होना चाहिए। इससे रचना व्यवस्थित होकर निखर जाती है (भारतीय साहित्यशास्त्र कोश, राजवंश सहाय हीरा,)। अभ्यास प्रतिभा का पोषक है। अभ्यास से ही काव्यरचना में सौष्ठव और प्रौढ़ता आती है। अभ्यास के अभाव में प्रतिभा भी कुंठित हो जाती है। आचार्य दण्डी का कहना है कि 'पूर्व वासनाजन्य अद्भुत प्रतिभा के न रहने पर भी शास्त्राध्ययन और अभ्यास से वाणी की उपासना करने पर वाणी अवश्य ही अनुग्रह करती है (हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, पृ.)।

 

काव्यहेतु विषयक इस विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय तथा पश्चिमी काव्यशास्त्रियों ने प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास तीनों का वर्णन काव्यहेतु के सन्दर्भ में किया है। हाँ, आचार्यों में इस बात को लेकर अवश्य मतभेद है कि इन तीनों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कौन सा उपकरण है। ध्यान से देखें तो हमारे सामने यह स्पष्ट है कि ये तीनों अलग-अलग नहीं हैं, अपितु तीनों कवि व्यक्तित्व के ही विभिन्न पक्ष हैं। ये तीनों परस्पर आश्रित हैं। जैसे केवल मिट्टी से घड़ा नहीं बन सकता, उसे बनाने के लिए पानी, चाक, कुम्हार, आग आदि भी आवश्यक होते हैं, वैसे ही प्रतिभा से काव्य का सृजन नहीं हो सकता। इसी तरह प्रतिभा के अभाव में व्युत्पत्ति और अभ्यास का कोई महत्व नहीं है और व्युत्पत्ति और अभ्यास के अभाव में प्रतिभा की सार्थकता नहीं।

 

हम इन तीनों काव्यकारणों को मम्मट की तरह तीन नहीं अपितु एक ही कारण कह सकते हैं और मान सकते हैं कि इनकारणों के तीन रूप हैं- 1;प्रेरक कारण, 2; निमित्त कारण तथा 3; उपादान कारण। प्रेरककारण रचनाकार की वह प्रकृति है, जो उसे काव्यरचने की प्रेरणा देती है, निमित्तकारण कवि की प्रतिभा है और उपादान कारण लोकादिशास्त्रों का मनन और अभ्यास है और ये तीनों मिलकर काव्यका हेतु कहलाता है।

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