ओड़िशा में हिन्दी अनुवाद |Hindi translation in Odisha

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ओड़िशा में हिन्दी अनुवाद

ओड़िशा में हिन्दी अनुवाद |Hindi translation in Odisha


 

ओड़िशा में हिन्दी अनुवाद

  • देश तो एक है कहीं भी श्रेष्ठ कृति को अंतरण की बात अन्य क्षेत्रों में बलवती हो जाती है इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण गीतगोविन्द है । सागर तट पर पुरी में इसकी रचना होती है और चित्तौड़ के राणा कुंभा इसकी टीका और उसके संगीत पर विस्तृत काम करते हैं । गुजरात में इसकी नाट्य प्रस्तुति होती है आवागमन की दुरुहता के बावजूद गीतगोविन्द जगन्नाथ जी को सुलाने के लिए गाया जाता है यह बात भूल गये और इसे भारतवर्ष की एक अनमोल संगीतात्मक कृति के रूप में सारे देश में इसके अनुकरण पर कृतियाँ बनी । सब भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ । लोक भाषाओं में अगणित गीत रचे गये। जिन में राधा और कृष्ण का प्रेम नहीं बदला बाकी सब कुछ बदल गया । यह है एक कृति के विशेष क्षेत्र से उठ क र सर्वभारतीय स्तर तक व्याप्त / फैल जाने का परिणाम । जैसे बुद्ध भारत से उठकर विश्व में फैल गये बौद्ध धर्म की अधिकांश कृतियाँ भारत से लुप्त हो गई । उनको पुनः अनुवादकर चीनतिब्बतजापान से वापस लाना पड़ा । उसी प्रकार यह स्थिति लगभग गीतगोविन्द के बारे में भी कही जा सकती है आज भारत की किसी भी भाषा में श्रेष्ठ कृति को लाने के लिए किसी लिंक भाषा का जाए । सहारा लेना पड़ता है । ओड़िया में उन दिनों यह सुविधा भी उतनी उपलब्ध नहीं थी । अतः दूर क्षेत्रों में उपलब्ध संस्कृत की किसी पारंपरिक रचना को छोड़कर उन भाषाओं की कृतियों का आहरण दुरूह कार्य था । यही कारण था कि 19वीं सदी में दक्षिण भारतीय भाषाओं अथवा कश्मीरीसिंधी से एक भी कृति का ओड़िया अनुवाद संभव नहीं हो सका । मराठी की कुछ कहानियाँ तत्काल की पत्रिकाओं में कहीं - कहीं छपी । कन्याकुमारी और रामेश्वर का उल्लेख भले ही मिल जाए पर ओड़िया में कन्नड़ साहित्य की कोई भी श्रेष्ठ कृति उस समय मीडिया में नहीं आ पायी । इसका यह कारण है कि ओड़िया लोगों में कन्नड़ के विशेष जानकार न थे । ओड़िशा से तीर्थयात्री रामेश्वरम और द्वारिका जाने की परंपरा थी केरलीमराठी और पंजाबी सब निरंतर श्रीजगन्नाथ के दर्शन के लिए आते रहते थे परंतु आदान प्रदान के द्वार खुले नहीं थे । अतः अनुवादों की सीमा एक तरह से मानव कृत सीमा थी । उसमें बहुत अधिक विस्तार की गुंजाइश नहीं रहीं जब सरकारी स्तर पर प्रयत्न शुरू हुए तभी इस संबंध में कुछ कार्य संभव हो सका । इनमें प्रमुख भूमिका एन. बी. टी.साहित्य एकादेमी एवं विभिन्न टेक्स्ट बुक बरो की थी जब भारतीय भाषा परिषदभारतीय अनुवाद परिषदयू. पी. हिन्दी संस्थान और अनुवाद बूरोनागरी प्रचारिणी सभाहिंदी साहित्य सम्मेलनराष्ट्रभाषा प्रचार सभादक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा आदि संस्थाओं ने अपने-अपने पंख फैलाये तब उन्हें इस प्रदेश की धरतीसाहित्य और कला के दर्शन होते हैं आजादी के बाद अमृत संतान (गोपीनाथ महांति) का अनुवाद हिन्दी में हुआ और उसे भारत की विभिन्न भाषाओं में पहुँचने के द्वार खुल गये । 'अमृत संतानही ओड़िया की पहली औपन्यासिक कृति है जो ओड़िशा के बाहर सार्थक ढंग से एक नयी दिशा खोलने में समर्थ हुई । इसका श्रेय विशिष्ट अनुवाद चिन्तक एवं समर्थ हिन्दी गद्य लेखक युगजीत नवलपुरी को जाता है । आगे चलकर नवलपुरी ने इस दिशा में और भी कई प्रयास किये ।

 

  • उन दिनों ओड़िशा में आधुनिक शिक्षा की स्थिति उतनी विकसित नहीं थी । इसके अलावा यहाँ शिक्षा के क्षेत्र में जीविका के साधन भी बहुत सीमित थे । अतः लोगबाग उच्च शिक्षा की बात उठते ही पटनाइलाहाबादआगरा या कोलकाता चले जाते । यही कारण है कि इस काल से ओड़िशा के अधिकांश विद्वान पढ़ने के लिए अथवा नौकरी करने के लिए इन्हीं केंद्रों में उपलब्ध हुए । गोलक विहारी धल का भाषा विज्ञान (ध्वनि विज्ञान) आगरा में रचा गया । इसके अलावा चित्तरंजन दास भी विश्व के विभिन्न भागों में यात्रा करते हुए भी आगरा को केंद्र बनाते हैं । धल साहब ने ओड़िशा के पाठकों को प्रेमचंद के गाँव की महक उपलब्ध कराई । उस समय हिन्दी में प्रेमचंद की खूब धूम मची हुई थीऔर रेणुनागरयशपाल वगैरह भी ग्रामीण भारत का दृश्य देखने में मगन थे । धल साहब ने बंकिमशर या रवीन्द्र के बजाय प्रेमचंद को ज्यादा निकट समझा । उत्कल की ग्रामीण स्थिति प्रेमचंद के गाँव से बहुत करीब पड़ती है । भले ही प्रेमचंद भारी पड़ते थे परंतु धल साहब ने उसकी परवाह नहीं की । उस तरह आगे चलकर चित्त बाबू ने भी अरविन्द साहित्य को ओड़िया पाठकों के लिए लाने में अपने जीवन अनेक वर्ष लगा दिये। आगरा में रहते समय उन्होंने कान्हू बाबू के 'काउपन्यास को हाथ में लिया । इसे अनुवाद के क्षेत्र में अंधकार का युग ही कहेंगे । जब हिन्दी पाठक ओड़िया साहित्य से एकदम अपरिचित है । नवलपुरी के प्रयास से कोई विस्तार हो नहीं पाया क्योंकि साहित्य एकादेमी तब तक अनुवाद के जरिए अपनी कोई विशिष्ट छवि बना नहीं सकी थी । चित्त बाबू ने भी हिन्दी अनुवाद के क्षेत्र में ज्यादा काम नहीं किया था । यह उनका प्रारंभिक कार्य ही है । दूसरी बात आगरा में रहने के कारण ही उन्हें हिन्दी के संस्कार उपलब्ध हुए । जो हो, 'काका अनुवाद करते समय उन्होंने अपने साथी क्षेमेन्द्र सुमन का सहयोग लिया । दर असल उस समय सामाजिक उपन्यासों का चलन अधिक था । ओड़िया में कान्हु चरण सर्वश्रेष्ठसामाजिक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गये थे । अतः 'काके लिए भाषा ढूंढने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं हुई । चित्त बाबू ने इस कृति में छोटे-छोटे वाक्य लियेहिन्दी की सहज भाषा को ही वरीयता दी हैं । जहाँ कहीं ओड़िया का ठेठ रूप मिलतावे उसे सीधी और सरल रूप में व्यवहार करते गये हालांकि हिन्दी की जो-जो क्षेत्रीय कहावतें हैं उनका प्रयोग कर भाषा को रोचक बनाया इसी प्रकार बीच -बीच में जो भी ओड़िया लोक तत्व के प्रयोग आतेवे हिन्दी में बड़े सुन्दर ढंग से समाते हैं । जैसे बंजारों का नाचलेकिन वे संपेरों या कालबेलियों के दृश्य को 'सांप खिलानाकहते हैं । गाँव का चित्रण चित्त बाबू ने हिन्दी में बहुत मार्मिकता से उतारा है । औरतों के स्वभाव से परिचित हुये बिना यह शब्दावली प्रयोग नहीं कर सकते थे । इसमें केवल नारी और उसके विभिन्न प्रसंगों में व्यवहार की बात नहीं है । वरन् नारी के समुचित दृष्टिकोण को अंकित किया है । चित्त बाबू का यह अनुवाद आगरा के एक प्राइवेट प्रकाशक ने 1962 में छापा है । क्षेमेन्द्र सुमन के सहयोग के कारण इस अनुवाद में भाषा की सामान्य त्रुटियाँ और व्याकरणगत खामियाँ कहीं नहीं मिलती । चित्त बाबू का यह पहला प्रयास बहुत सराहा गया ।

 

  • चित्तबाबू मूलत: ओड़िया के अंग्रेजी और हिन्दी के अनुवादक हैं । उन्होंने यूरोप के अनेक देशों भ्रमण कर अपने क्षितिज को बहुत विस्तार दिया है। यही कारण है कि 'सावित्रीमहाकाव्य (श्री अरविन्द ) का वह सहज ओड़िया में अनुवाद कर पाते हैं । इसी कलात्मकता का परिचय उन्होंने 'कामें दिया है । यहाँ स्मरणीय है कि अपनी फक्कड़गिरी के दिनों में शांतिनिकेत में हजारी प्रसाद जी जैसों के साथ हिन्दी सीखी और प्रहलाद प्रधान जैसों के साथ ओड़िया को समृद्ध किया । आगरा आकर अपने घनिष्ठ मित्र कान्हुचरण महांति के आग्रह पर उनको 'काअनुवाद करना पड़ा । बाद में वे पांड के दर्शन में रम गये और हिन्दी से संपर्क छूट गया । अतः एक मात्र 'काही ऐसी कृति है जो उनके ओड़िया हिन्दी अनुवाद पर प्रकाश डाल सकती है । एक बात तो स्पष्ट है कि चित्त बाबू मूल कथानकउसके भाव और उसके स्वर को समझने में कभी गलती नहीं कर सकते । उनका आलोचक मन अनुवाद के समय जरूर चुप रहा होगा । इसके अलावा चित्त बाबू के लिए कान्हुचरण का दृष्टिकोण भी अपरिचित नहीं था ।

 

  • अनुवाद करते समय चित्त बाबू के ध्यान में ओड़िया जीवन और शैली का बैकग्राउंड पूरी तरह स्पष्ट था । ओड़िया भाषा उनके संस्कारों में रची बसी और पगी हुई थी । रही बात हिन्दी के मुहावरे कीद्विवेदी जी और प्रधान जी की संयुक्त मेधा ने पहले ही वे संस्कार जगा दिये थे । आगरा में आकर रूपाकार भर देना था । अगर कहीं कुछ कसर रह गईतो वह क्षेमेन्द्र जी ने पूरी कर दी । इस प्रकार हिन्दी के अनुवाद के इस प्रारंभिक दौर में ही एक अच्छे अनुवाद से श्रीगणेश हुआ ।

 

  • आजादी के बाद नई पीढ़ी के साहित्यकार अपने लेखन के जरिए एक नया मानव समाज रचने का सपना देख रहे थे । इसमें सांप्रदायिक दंगे बहुत बड़ी बाधा बनकर आये । परंतु पुरानी पीढ़ी के लोग दंगों से ज्यादा प्रभावित नहीं हुए । वे अपने जीवन मूल्यों को पहले ही स्थापित कर चुके थे । अतः कह सकते हैं कि तत्कालीन समाज में गांधीजी का भाव घटना शुरू हो गया था जब कि धरती के प्रति आकर्षण एक नये उत्साह के साथ बढ़ने लगा । अब ओड़िया साहित्य में कालिन्दीचरण पाणिग्राही अपने युग के सही चित्रकार के रूप में उभर कर आये । 'माटिर मणिषने एकदम हलचल पैदा कर दी । आजादी के बाद के मनुष्य की धरती के प्रति अटूट रिश्ते की बात अपने विविध आयामों के साथ इस उपन्यास में खुल कर आती है । साथ में पारंपरिक परिवार के गहरे बंधन सारे तनावों के बावजूद अटूट दिखाई देते हैं । यह भारतीय चरित्र का अत्यंत उज्वल पहलू है जो कालिन्दी बाबू ने गहराई से अंकि किया । एक तरह से मूल्यों पर पड़ती चोट मनुष्य को दहला देती है कालिन्दी बाबू के साहित्य ने राष्ट्रीय स्तर पर अनुगूंज पैदा कर दी । परंतु उसे व्यापक स्तर पर पहुँचाने की संभावना बहुत कम थी । ओड़िया यह कृति ओड़िशा की सीमाओं से बाहर जाने की मांग कर रही थी । जब कि यहाँ कोई पत्रिका नहीं थीअनुवादक लगभग नहीं थे । अतः इस महान ग्रंथ का रूपांतरण लगभग असंभव था। पूरे राज्य में या उसके बाहर कहीं आशा की किरण दिखाई नहीं पड़ रही थी ।

 

  • ऐसे समय में अनसूया प्रसाद पाठक ने इस ग्रंथ को परखा । पाठक जी ओड़िशा के बाहर के आदमी थे । परंतु यहाँ रहकर ओड़िशा की संस्कृति और परंपरा से सुपरिचित हो गये । उन्होंने एक रफ ड्राफ्ट बनाया । दूसरी तरफ बालेश्वर क्षेत्र के नित्यानन्द महापात्रजो स्वयं अपने आप में कथाकार हैंउन्होंने भी उस उपन्यास को हिन्दी में प्रस्तुत करने का विचार किया । इस बीच ओड़िशा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की पहली महिला मैट्रिकुलेट सरस्वती पाणिग्राही ने इसे हिन्दी में रूपांतरित किया श्रीमती पाणिग्राही जी का जन्म तो जबलपुर में हुआ (1918) । और नौ साल की कच्ची उमर में उनका विवाह ओड़िशा के प्रसिद्ध क्रांतिकारी एवं प्रगतिशील कथाकार भगवती पाणिग्राही से हुआ । तत्कालीन ओड़िशी परंपरा के अनुसार वे सात साल तक जबलपुर में रही और पढ़ाई लिखाई की । कहते हैं वे  पहली ओड़िया महिला थी जिन्होंने इतने आगे तक पढ़ाई की । राष्ट्रभाषा प्रचारक एक तो जबलपुर में जन्म और लम्बे अरसे तक रहनादूसरे पाठकजी के संसर्ग में आना । इन सबसे उनमें हिन्दी के गहरे संस्कार भरे थे । उन्होंने जब इस ग्रंथ का अनुवाद किया तो यह हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका 'हंसमें धारावाहिक रूप में छपी थी । संभवत: ओड़िया की यह पहली कृति थी जिसे इतना बड़ा सम्मान मिला बाद में साहित्य अकादेमी ने इसके प्रकाशन का दायित्व लिया उन दिनों साहित्य अकादेमी अपने सारे प्रकाशन कार्य (किसी भी भाषा में हो चाहें) दूसरों से कराती थी । अतः भदन्त आनन्द कौशल्यायन ने इसकी भूमिका लिखी और प्रकाशन का दायित्व पूर्वोदय प्रकाशन को दिया गया ।

 

  • इस प्रकार ओड़िया की एक विशिष्ट कृति से अनुवाद का श्रीगणेश हुआ । कालिन्दी बाबू उन दिनों ओड़िया साहित्य में पूरी तरह छाये हुए थे । ओड़िशा में प्रकाशक उनकी कृतियों को प्रकाशित करने को तैयार थे । वे कटक आकाशवाणी केंद्र के सलाहाकार थे और साहित्य अकादेमी के भी सदस्य थे । लेकिन 'माटी का पुतलाके बाद और कोई कृति अनूदित रूप में सामने नहीं आई । उसका सबसे बड़ा कारण अनेक कथाकार कवि सक्रिय हो चुके थे । कम से कम सबुज युग के अनेक यशस्वी साहित्यकार प्रकाशित हो रहे थे परंतु किसी को बहादुरी दिखाने का अवसर नहीं मिला ।

 

  • सोभाग्य से उन दिनों उत्कल प्रांतीय राष्ट्रभाषा प्रचार सभा अपनी गतिविधियों के कारण हिन्दी क्षेत्र में नाम कर रही थी । डॉ. हरेकृष्ण मेहताब ओड़िशा में मुख्यमंत्री थे और वे हिन्दी के बहुत बड़े समर्थक थे । उससे पहले पं. गोपबंधु दास के सत्यवादी वनविद्यालय में हिन्दी का महत्व छात्रों को समझा चुके थे । कटक में सभा ने आधुनिक मशीनों से समवाय प्रेस खोल कर एक बहुत बड़ा कदम उठाया । वरना यहाँ हिन्दी में प्रकाशन कार्य ही दुरूह था। सभा के कटक केंद्र से 'राष्ट्रभाषा पत्रिकाप्रकाशन इस दिशा में एक और महत्वपूर्ण कार्य था । इसी बीच कटक में मारवाड़ी हाईस्कूल हिन्दी माध्यम विद्यालय बन कर सामने आया । ऐसे और भी दो तीन विद्यालय खुले जो संबलपुरबलांगीरटिटलागढ़ आदि जगहों में लम्बे अरसे तक काम करते रहे। परंतु इन स्कूलों के छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त कर अपने-अपने धन्धे में लगे हिन्दी में काम करने वाले बहुत कम लोग आये राष्ट्रभाषा का काम भी हिन्दी के जरिए आजादी की लड़ाई को हवा देना था हिन्दी साहित्य के प्रचार-प्रसार से उन दिनों उन्हें कोई मतलब नहीं था परंतु आजादी के बाद जब हिन्दी सरकारी कामकाज की भाषा बन गई और देश की संपर्क भाषा भी हो गईतो इनके आभिमुख्य में जबर्दस्त परिवर्तन आया । केंद्रीय सरकार ने भी इन संस्थाओं को खुलकर आर्थिक सहायता प्रदान की । विभिन्न योजनाओं के जरिए इन संस्थाओं के कार्य में विविधता आयी साहित्य पत्र में ओड़िशा की भाषासाहित्यकलासंस्कृतिइतिहास आदि पर सामग्री प्रकाशित होने लगी श्रेष्ठ साहित्य का ओड़िया से हिन्दी में अनुवाद होने लगा एवं प्रकाशित साहित्य का मूल्यांकन भी चला । इस प्रकार ओड़िया साहित्य के ओड़िशा से बाहर प्रचार-प्रसार का एक बड़ा दरवाजा खुल गया । रेवेंसा कॉलेजगंगाधर मेहेर कॉलेजफकीर मोहन कॉलेज एवं एम.पी.सी कॉलेज आदि में पहले हिन्दी विभाग में पढ़े-लिखे लोगों को बाहर से लाकर अवस्थापित किया गया । इनमें से भी कुछ लोगों ने ओड़िया सीखी और अनुवाद कार्य में मन लगाया इनमें कीर्ति प्रकाश गुप्तकपिलेश्वर प्रसादमायाराम भट्ट और चंद्रसेन कुमार जैन प्रमुख हैं । इन लोगों ने हिन्दी में अनेक छिट पुट कार्य किये । किसी महत्वपूर्ण कृति का अनुवाद प्रकाशित होना संभव नहीं हुआ । लेकिन निश्चित है कि इन अध्यापकों के आ जाने से हिन्दी के कॉलेज स्तर पर अध्यापन को काफी बल मिला जो आगामी समय में अनुवाद कार्य की भूमिका सिद्ध हुई । इन्हीं दिनों हिन्दी टीचर्स ट्रेनिंग स्कूलकटक की स्थापना हुई और राज्य में हिन्दी शिक्षकों के प्रशिक्षण का मार्ग खुला । तारिणी चरण दास इसके प्रथम प्राचार्य बने । आगे चलकर वे प्रशिक्षण कार्य से हटकर आम कॉलेजों में चले गये और ओड़िशा में प्रथम प्रोफेसर बनने का गौरव प्राप्त कर सके । दूसरा प्रशिक्षण संस्थान भुवनेश्वर में खुला जहाँ राधाकांत मिश्र प्रिंसिपल रहे । फिर भट्टजी और रघुनाथ महापात्रडॉ. शंकरलाल पुरोहित ने दायित्व लिया। ऐसा ही एक केंद्र संबलपुर में भी केंद्रीय सरकार के सहयोग से शुरू हुआ । इसके दायित्व में जुगल किशोर बहिदार रहे। बाद में कटक को छोड़ अन्य हिंदी संस्थान बंद हो गए ।

 

  • इससे पूर्व तारिणी बाबू ने हिन्दी अध्यापकी के दौरान हिन्दी में मौलिक सृजन कार्य किया । कविताआलोचना और ओड़िया कविता आदि में काफी महत्वपूर्ण काम किया । परंतु तारिणी बाबू से उस समय 'राष्ट्रभाषा पत्र', साहित्य सम्मेलन के 'माध्यमआदि में ओड़िया से बहुत कुछ अनूदित कर एक नई शुरूआत की । हालांकि उनसे 'कणामामूउपन्यास का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हुआपर उसे प्रकाशकीय दुर्बलता के कारण बाजार में सफलता नहीं मिली । उस समय अनसूया प्रसाद पाठक ने अनेक कृतियाँ ओड़िया से हिन्दी में अनूदित कर राष्ट्रभाषा पत्र और वर्धा की पत्रिका में छपवायी । पाठकजी का इसी बीच 'प्रतिभाउपन्यास (हरेकृष्ण मेहताब ) हिन्दी में छपा इसके प्रकाशक मुद्रक अनुवादक सब दृष्टि से पाठकजी ही थे। यह औपन्यासिक कृति ओड़िशा में अनेक संभावना के द्वार खोल देती है ।

 

  • अनुवाद साहित्य का दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ रहा था । सफलता की ऊंचाइयाँ छूने वाला राष्ट्रभाषा समवाय प्रेस एक के बाद एक अनेक कृतियाँ छापने लगा । 'राष्ट्रभाषा पत्रनियमित रूप से छपने लगा । सभा पाठ्य पुस्तकों के लिए आत्मनिर्भर बन गई । परंतु इसी बीच यह प्रेस ऐसे भंवर में फंस गया कि सारी योजना ठप हो गई । पत्र बंद हो गया । प्रकाशन बंद हो गया । और हिन्दी अनुवाद कार्य फिर एक बार औंधे मुँह गिरा । समवाय प्रेस के साथ साथ कागज बनाने का कारखाना भी बंद हो गया । प्रेस कानूनी कारवाही के चक्कर में पूरी तरह फंसकर पंगु बन गया । उस समय लाखों रुपयों की मशीन जंग खाने लगी। एक बहुत बड़ी संभावना को विराम लग गया । बाद में गोपीनाथ साहु ने इसको फिर एक बार पुनः स्थापन करने का प्रयास किया । एक नई संस्था का नये नाम से पुनर्जागरित संस्थान ने प्रकाशन कार्य हाथ में लिया । पिछले तीन दशक में उसने अनेक महत्वपूर्ण कार्य किया । इस संस्था ने कविताकहानीउपन्यास आदि कुछ मौलिक कृतियों के साथ-साथ कुछ अनुवाद भी प्रकाशित किये इनमें साहित्य एकादेमी पुरस्कार द्वारा सम्मानित 'अर्द्धशताब्दी का ओड़िशा और उसमें मेरा स्थान' (गोदावरीश मिश्र) सर्वोपरि है । नटवर सामन्तराय का आलोचना ग्रंथ और कुछ कविता ग्रंथ उसका महत्वपूर्ण प्रकाशन है । संतोष प्रकाशन संस्था ने 'रमादेवी की आत्मकथाजैसी महत्वपूर्ण कृतियाँ प्रकाशित की हैं ।

 

  • केंद्रीय सरकार के राजभाषा कार्यक्रम के तहत राजधानी भुवनेश्वर का महत्व बढ़ गया । यहाँ हिन्दी की विविध स्तर की गतिविधियों में तेजी आने लगी । आर्थिकशैक्षिकसरकारी प्रोत्साहन के कारण हिन्दी का वातावरण बनने लगा । आधारभूमि भी दृढ़ होने लगी यहाँ से अनुवादों का सिलसिला चल पड़ा जो अब तक जारी है बनमाली दास पहले तो हिन्दी टीचर्स ट्रेनिंग से जुड़े थेबाद में डिग्री कालेजों में पढ़ाने चले आये । अर्जुन शतपथी और बनमाली दास ने प्रारंभ में हिन्दी की विभिन्न स्तर पर पाठ्य पुस्तकें लिखी । हिन्दी प्रचार संस्थाओंहिंदी शिक्षा समिति से जुड़ कर प्रचार-प्रसार के काम में लगे । तारिणी चरण दास ने बनारसराधाकान्त मिश्रअर्जुन शतपथीरघुनाथ महापात्रअजय पटनायक ने इलाहाबाद में हिन्दी की पढ़ाई की। पर बनमाली दास जबलपुर में पढ़ कर आये । इस प्रकार यह पीढ़ी हिन्दी के गढ़ कहे जाने वाले क्षेत्र से हिन्दी सीख कर आयी थी । इसे ही पहली पीढ़ी के पांच-सात कंट्राक्ट पर आये हिन्दी अध्यापकों का स्थान लेना था इन्होंने सबने (किसी ने कम किसी ने ज्यादा) हिन्दी अनुवाद में रुचि ली। सरकारी गैर सरकारी सभी संस्थाओं ने इनको प्रकाशित किया । इन अनुवादों से भारत की अन्य भाषाओं की तरह ओड़िया साहित्य का अनुवाद भारत वर्ष में अपनी विशेष मर्यादा बनाने में सफल हो सका ।

 

  • सौभाग्य से हिन्दी पढ़ाने वालों की संख्या बढ़ी । परंतु राजभाषा कार्यक्रम (राजभाषा अधिकारीअनुवादकसहायकटंकक आदि) के अंतर्गत देश भर में काफी लोग इसमें नौकरी पा कर आये । परंतु उनका रुझान कार्यालयीन हिन्दी में अनुवाद करने पर था । वे वैज्ञानिक तकनीकी अनुवाद में काम - करते । साहित्यिक सांस्कृतिक दृष्टि से अनुवाद में रुचिशील बहुत कम लोग निकले । इनमें पूर्णचंद्र रथ भोपाल में रहकर काफी कुछ काम करने में सफल हुए। वे भारत भवन से संबद्ध थे । उधर राउरकेला इस्पात कारखाने में जुड़े मधुसूदन शाह ने अनुवाद कार्य में रुचि ली। दिल्ली में अवस्थापित डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र यद्यपि एनटीपीसी में समर्पित थेपर अनुवाद की रुचि और समर्पण कम न था । उनकी प्रतिभा का दिल्ली के प्रकाशकों ने पूरा दोहन किया । कहानियों और कविता के अनुवाद में डॉ. मिश्र ने पहले ज्यादा रुचि ली । पर बाद में 'देश-काल-पात्र' (जगन्नाथ प्रसाद दास) के अनुवाद से उनकी क्षमता सामने आयी । दर असल यह उपन्यास कथानक की दृष्टि से भले ही अनूठा होभाषा को लेकर विशेष संकट नहीं है । जे. पी. दास की ओड़िया में प्राय: मानकता बनी रहती है । पर ऐतिहासिक यात्रा के कारण यह उपन्यास कुछ सावधानी चाहता है । एक समय पर स्थिर नहीं है । भाषा में कई जगह मोड़ आते हैं । उनका सामना डॉ. मिश्र करने में सफल रहे । दिल्ली में रहने के कारण पूरी तरह हिन्दी वातावरण मिला । पुनरीक्षण के लिए सहयोगियों की कोई कमी नहीं रही । इस प्रकार मिश्रजी के काव्यानुवादों व अन्य अनुवादों का जब दबदबा बढ़ाउनकी समीक्षा में भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और आलोचकों ने सहयोग दिया । रायरांगपुर में जनमेदिल्ली (जेएनयू) से पढ़कर निकलने के कारण हिन्दी का चलता मुहावरा और साहित्यिक बारीकियों से पहचान लेकर आये थे । मिश्र के अनुवादों में भाषा की रवानगी होने के कारण पठनीयता में कोई कसर न थी । अतः हिन्दी साहित्य में ओड़िया साहित्य को सम्मानजनक जगह दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही । सच्चिराउराय की प्रगतिशील कविता हो या सीताकांत महापात्र की मानववादी चेतनायुक्त काव्य कृतिरमाकांत रथ का अद्यतन मृत्यु चेतना युक्त काव्यसंकलनडा. मिश्र ने हर स्थिति में अपने को ढालाहिन्दी मुहावरे में ओड़िया के श्रेष्ठ साहित्य को प्रस्तुत किया ।

 

  • प्रभात कुमार त्रिपाठी ने पढ़ाई रायगढ़ और उज्जैन में की पर वे अध्यापक ओड़िशा में बने । उनकी रुचि मौलिक (कविताउपन्यास) में रही और अनुवाद के क्षेत्र में कविता ही प्रिय विषय रहा । रमाकांत रथसीताकांत महापात्रराजेन्द्र पंडा आदि अनेक प्रतिष्ठित कवियों का हिन्दी रूप प्रभात के हाथों हुआ है । कथा साहित्य में बहुत कम अवसर मिला । प्रभात को हिन्दी का लौकिक मुहावरा भी सिद्ध था । अतः कविता को यथासाध्य उसके मिजाज में रखा । इसी कारण हिन्दी में प्रभात के पाठक प्रशंसक बहुत अधिक हैं ।

 

  • योगेंद्र त्रिपाठी राउरकेला आये। वहीं ओड़िया सीखी और ओड़िया की भक्ति कविता को हिन्दी पूरी शक्ति से अनूदित कर सके । त्रिपाठी जी ने गोपबंधु की 'कारा कविता' 'दांडी रामायण', ‘लावण्यवतीआदि का रूपांतर किया । बाद में गोपबंधु दास की 'कारा कविताको और गंगाधर मेहेर की 'तपस्विनीको हिन्दी में प्रस्तुत किया । त्रिपाठी कानपुर के पढ़े-लिखेओड़िशा में आजीविका के लिए रहे । ओड़िया सीखी । सारा अनुवाद विभिन्न छंदों में हुआ । संभवतः हिन्दी के तुकांत छंद में ओड़िया काव्य को इतने विस्तृत स्तर पर अनूदित करने का श्रेय योगेंद्रजी को है । उनकी कविता में तुक साधते समय गजब का संयम मिलता है। योगेंद्रजी के अनुवाद में खड़ी बोली का मुहावरा अविमिश्रित भाव से मिल जाता है भुवन वाणी ट्रस्ट (कानपुर) ने इनके अनुवादों को अपनी राष्ट्रीय योजना के तहत छापा है । उसमें प्राय: ओड़िया के मध्यकालीन अतीत (प्रारंभिक) के काव्य संभार को हिन्दी में प्रस्तुत किया । यह राष्ट्रीय महत्व की दृष्टि से किया कार्य है ।

 

  • बलांगीर में श्रीनिवास उद्गाता ने आँसू और चित्रलेखा का ओड़िया में रूपांतरण कर एक महत्वपूर्ण शुरूआत की । बाद में उन्होंने कई ग्रंथों का ओड़िया से हिंदी में अनुवाद किया ।

 

  • ढेंकनाल के श्री सिद्धार्थ मानसिंह होनहार अनुवादक थे उन्होंने महापात्र नीलमणि साहू की आत्मकथात्मक कृति का रूपांतर किया । बाद में वीणापाणि महांति की 'पाटदेई' (कहानी संकलन) से उनकी हिन्दी मुहावरे में गहरी पकड़ सामने आयी । परंतु अल्पायु में उनके देहावसान से यह कार्य अधूरा रह गया । एक विशिष्ट प्रतिभा के जाने से अनुवाद कार्य की सर्वाधिक क्षति हुई ।

 

  • इधर युवा पीढ़ी में अनुवाद के प्रति रुझान बढ़ रहा है। कई लोग सक्रिय हैं। इधर डा. भगवान त्रिपाठी ने कुछ उपन्यास एवं मनोज दास की महानियों का अनुवाद हिन्दी में किया है । यद्यपि भगवान ने अनुवाद काफी अर्से पहले शुरू किया थापरंतु पिछले चार-पांच साल से ही चर्चा में आ पाये हैं। उनका सारा बैकग्राउंड ओड़िशा में रहापरंतु हिन्दी अध्ययन अध्यापन से निरंतर जुड़े रह कर वे अनुवाद में आगे बढ़ सके हैं ।

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