भ्रमरगीत प्रसंग की भाषा-शैली | Bhramargeet Bhasha Shaili

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भ्रमरगीत प्रसंग की भाषा-शैली

भ्रमरगीत प्रसंग की भाषा-शैली | Bhramargeet Bhasha Shaili
 

भ्रमरगीत प्रसंग की भाषा-शैली- प्रस्तावना (Introduction)

 

सूरदास की भाषा ब्रजभाषा है। सूरसागर ब्रजभाषा का सबसे प्राचीन काव्यग्रंथ है। विद्वानों ने यह माना है कि सूरसागर जैसी इतनी उच्चकोटि की ब्रजभाषा की रचना पहले-पहल ही कोई कैसे लिख सकता है? यह किसी प्रचलित ब्रजभाषा की गीति परम्परा का विकसित रूप है। हो सकता है वह परम्परा मौखिक रही हो। सूरदास ने ग्रामीण ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। उनकी ब्रजभाषा गोस्वामी तुलसीदास जैसी साहित्यिक नहीं है। ब्रजभाषा अपनी कोमलता और सरसता के बल पर एकदम काव्योचित भाषा है। सूरदास की भाषा में दोनों प्रकार की विशेषताएँ- सामान्य विशेषताएँ और शास्त्रीय विशेषताएँ मिलती हैं।

 

भ्रमरगीत प्रसंग की भाषा-शैली (Bhramargeet Bhasha Shaili)

 

सूरदास की भाषा में सरलता का गुण विद्यमान है। उन स्थलों को छोड़कर जहाँ सूर का कार्य रूप अधिक उबुद्ध है, उसमें सर्वत्र बोधगम्यता मिलती है। उन्होंने जो दृष्ट कूट लिखे हैं उनकी भाषा अलबत्ता इस प्रकार के गुणों से अलग है। प्रवाहपूर्णता में भी ऐसी ही विशेषता व्याप्त है। सूर का काव्य गीति काव्य है। उनकी रचना विभिन्न राग-रागनियों में हुई है। उसमें संगीतात्मकता और सहज प्रवाह का आना सर्वथा संभाव्य है

 

तेरो बुरो न कोऊ मानै 

रस की बात मधुप नीरस, सुनु, रसिक होत सो जानै ॥ 

दादुर बसै निकट कमलन के जनम न रस पहिचाने। 

अलि अनुराग उड़त मन बांध्यों कहे सुनत नहिं आने ॥ 

सरिता चले मिलन सागर को कूल मूल द्रुम यानै। 

कायर बकै लोह तैं भाजै, लरै जो सूर बखानै ॥ - (पद 31 )

 

कवि ने अपनी भाषा में तत्सम तद्भव, देशज और विदेशी सभी प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया है। इससे लगता है कि सूरदास को भावों को अभिव्यक्त करने में जिस प्रकार के शब्द उपयुक्त लगे हैं, उन्होंने ग्रहण कर लिए हैं। उनके द्वारा प्रयुक्त कुछ शब्दों के उदाहरण इस प्रकार हैं

 

तत्सम-

जैसे, जल, सुत, दारा, मदन, अनंग, पद, पट, अवधि, इदि, घन, समीर, द्रुम, मीन, मृग, पीताम्बर, कुसुम, गिरि आदि ।

 

तद्भव - 

पाती, बुधि, वचन, अंखियाँ, नैन, हाथ, लोन, संपदा, जमुना, दही, जुबनिम आदि ।

 

देशज - 

छाक, लरिकिनी, कीन, तोर, केदा।

 

विदेशी-

तरवारि, नफा, दिवानी, जहाज, बाज, ख्याल

 

 

भाषा को सशक्त बनाने के लिए सूरदास ने अपने काव्य में मुहावरे और लोकोक्तियों का भी प्रयोग किया है। उदाहरण के लिए आँख बरति हैं मेरी, ठगोरी लाई, तेरो कह्यो पवन को मुसमयो, निपट दई को खोयो, मामी पीना, मन ही मन मांझ रही, आदि मुहावरे बड़ी स्वाभाविकता के साथ प्रयुक्त किए गए हैं।

 

अपने स्वारथ से सब कोऊ अपनी दूध छांडि को पीवै खार कूप को वारी, कथा कहत मौसी के आगे जानत नानी नाना, खाटी मही कहा रुचि माने सूर खवैया घी को काफी भूख गई मन लाडू, सूर सुकल हठि नाव चलावत से सरिता हैं सूखी। आदि लोकोक्तियाँ भी भ्रमरगीत की भाषा को चुटीला बना देती हैं।

 

काव्य रूप की दृष्टि से सूरदास का काव्य मुक्तक काव्य है। मुक्तक काव्य में प्रत्येक छन्द का अपना अलग-अलग महत्त्व होता है। उसमें पहले छंद से दूसरे छन्द को आगे बढ़ाने वाली बात नहीं होती। भ्रमरगीत में भी इसी छवि को देखते हैं। एक-एक पद अपने आप में स्वतंत्र है। इसमें पूर्वापर सम्बन्ध भी नहीं है। फिर भी 'भ्रमरगीत' में भी और पूरे सूरसागर में भी एक हल्की-सी कथा चलती है। हल्की-सी कथा भ्रमरगीत प्रसंग में भी है, परन्तु उससे यह काव्यांश प्रबन्ध काव्य नहीं बन जाता। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने प्रबन्ध काव्य को एक बागीचा कहा है और मुक्तक काव्य को चुने हुए फूलों का गुलदस्ता । 'भ्रमरगीत प्रसंग' में वही बात देखने में आती है। यह सूरदास द्वारा रचे गये चुने हुए पदों का संग्रह है। उसमें मुक्तक काव्य के लक्षण ही घटते हैं। यों मुक्तकों को भी विद्वानों ने दो वर्गों में बांटा है- पाठ्य मुक्तक और गेय मुक्तक । इस दृष्टि से देखने पर "भ्रमरगीत' प्रसंग के पद गेय मुक्तक हैं। ये विभिन्न राग-रागनियों में बँधे हुए हैं और गीति काव्य का अच्छा उदाहरण माने जाते हैं। विद्वानों ने माना है कि सूरदास के पदों को देखकर ऐसा लगता है कि इससे पूर्व अवश्य ही कोई गीति परम्परा रही होगी चाहे मौखिक ही रही हो तभी तो सूर ने इतने उच्च कोटि के संगीतमय गीत लिखे हैं। ये सभी गीत मुक्तक हैं।

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