देशी भाषा काव्य | Deshi Bhasha Kavya

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देशी भाषा काव्य 

देशी भाषा काव्य | Deshi Bhasha Kavya


देशी भाषा काव्य 

➽ एक बात और भी ध्यान देने योग्य है। वह यह है कि 'देशी भाषा काव्यनामक शब्द से इस काल-निर्धारण संबंधी भ्रांति को काफी पुष्टि मिली है। देशी भाषा से हमें उस समय की अपभ्रंश भाषा के लोकप्रचलित रूप को ग्रहण करना होगा। प्रत्येक भाषा की दो स्थितियाँ हुआ करती हैं। पहली स्थिति उसका लोकप्रचलित रूप (Dialects) और दूसरी हैउसका साहित्यिक रूप। वैदिकप्राकृतअपभ्रंश और आज की हिंदी सबकी दोनों स्थितियों रही हैं। साहित्यिक हिंदी का रूप कुछ और है और हिंदी की ग्रामीण बोलियों का रूप कुछ और प्रत्येक काल की भाषा के लोकप्रचलित रूप के लिए देशी भाषा का प्रयोग किया जा सकता है। भरत मुनि ने अपने नाट्य शास्त्र में उस समय की लोकप्रचलित भाषा के लिए 'देशी भाषाशब्द का प्रयोग किया है। दंडी ने अपने काव्यादर्श में तत्कालीन अपभ्रंश भाषाओं को देशी भाषा के नाम से अभिहित किया है। अतः देशी भाषा से हमें अपभ्रंश को ग्रहण करना होगा न कि हिंदी का साहित्य नष्ट हो जाने की मनगढ़ंत कहानियों से शायद ही काम चले।

 

➽ इस तथ्य को सभी भाषा वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं कि अपभ्रंशों से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का जन्म हुआ। यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि सं. 1050 के निश्चित मुहूर्त में हिंदी का जन्म तो हो गया जबकि मराठीबंगाली और गुजराती आदि आधुनिक आर्य भाषाओं का उद्भव नहीं हुआहालाँकि इन सब भाषाओं का उत्स समान ही था । यदि दुर्जन-तोष न्याय के अनुसार मान भी लिया जाये कि हिंदी का उदय 1050 संवत् में हुआतब भी उस समय की ऐसी कोई प्रामाणिक रचना उपलब्ध नहीं होती है जिसके आधार पर इस तथ्य की पुष्टि हो सके ।

 

हिंदी साहित्य के आदिकाल का लक्षण-निरूपण करने में जो पुस्तकें सहायक सिद्ध होती हैंवे निम्न हैं-

 

(1) पृथ्वीराज रासो । 

(2) परमाल रासो । 

(3) विद्यापति की पदावली । 

(4) कीर्तिलता। 

(5) कीर्तिपताका । 

(6) संदेशरासक-अब्दुर्रहमान कृत । 

(7) पउम चरिउ स्वयंभूकृत रामायण 

( 8 ) भविष्यत कथा - धनपालकृत 10वीं सदी । 

(9) परमात्माप्रकाश - जोइन्दु कृत । 

(10) बौद्ध गान और दोहा। 

(11) स्वयंभू छंद 

(12) प्राकृत पैंगलम्

 

➽ उपर्युक्त पुस्तकों में से प्रायः सभी पुस्तकें अपभ्रंश में रचित हैं। इनमें से दसवीं या ग्यारहवीं सदी की कोई ऐसी रचना नहीं है जिनके आधार पर हिंदी के उद्भव की कहानी को पूरे रूप से कहा जा सके। हाँशालिभद्र सूरि की 'भरतेश्वर बलिराम' (रचनाकाल 1241 वि.) में हिंदी के भावी रूप को देखा जा सकता है। इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बारहवीं शती के अंत में हिंदी के चिह्न मिलने लग गये होंगे। इस प्रकार हिंदी साहित्य के आदिकाल की पूर्वापर सीमा निर्धारण का प्रश्न भी साहित्य जगत में अभी तक प्रश्नवाचक चिह्न (?) से युक्त है।

 

➽ आदिकाल की समस्या के संबंध में डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त के विचार विशेष अवलोकनीय हैं- “ आदिकाल की समस्या सुलझाने का एक ही मार्ग है। हम अपने वैयक्तिक पूर्वाग्रहों या दूराग्रहों को त्यागकर शुद्ध भाषा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पहले इस बात का निर्णय करें कि हिन्दी भाषा का उद्भव कब से होता है तथा फिर वे कौन-कौन सी प्रामाणिक रचनाएँ हैं जो भाषा की दृष्टि से प्रारंभिक हिंदी के अंतर्गत रखी जा सकती हैं। इन रचनाओं के रचना काल एवं उनकी प्रवृत्तियों के आधार पर ही इस काल की सीमा एवं नामकरण का निर्णय किया जा सकता है।”

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