भक्तिकालीन सूफी काव्य धारा वैशिष्टय और अवदान | Sufi Kava Dhara Visheshtayen

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भक्तिकालीन सूफी काव्य धारा वैशिष्टय और अवदान

भक्तिकालीन सूफी काव्य धारा वैशिष्टय और अवदान | Sufi Kava Dhara Visheshtayen
 

सूफी काव्य धारा वैशिष्टय और अवदान

भारत में सूफियों का प्रवेश ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के समय हुआ । इन सूफियों की उदार मनोवृत्ति और आध्यात्मिक प्रेम-साधना से प्रभावित होकर कुछ सहृदय मुसलमान कवि इनके धर्मानुयायी बन काव्य रचना में प्रवत्त हुएऔर इनका काव्य 'सूफी प्रेमाख्यानक काव्यकी संज्ञा से जाना जाने लगा। अन्य देशों के साहित्य की भाँति अरबी-फारसी में भी सर्वप्रथम प्रेमकाव्य और वीरकाव्य की परम्परा उद्भूत हुईकिन्तु इस प्रेम परम्परा में परमात्मा के परम प्रेम और आतंरिक अनुभूतियों का चित्रण नहीं थाअरबी साहित्य की अपेक्षा प्रेम और रहस्य तथा सूफी सिद्धान्त का सम्यक् प्रतिपादन फारसी साहित्य में हुआ है। इस समय हिन्दू और मुसलमानों के बीच सामाजिकधार्मिक एवं सांस्कृतिक संघर्ष का आविर्भाव थाइसलिए सूफियों को अपने प्रयास में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही थी। वे राजसत्ता के विरोध में पहले ही परास्त हो चुके थे हिंदी के सूफी कवियों ने भारतीय लोककथाओंहिंदी भाषा हिंदी छंद और भारतीय चरित्रों को अपने काव्य का उपजीव्य बनाकर हिन्दू जनता को सूफी सिद्धान्तों पर विमोहित करके उन्हें इस्लाम की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया। हिन्दी के सूफी कवि भारतीयता के पोषक होकर भी इस्लाम के ही समर्थक हैंक्योंकि यह आखिरी कलाममें उनके वर्णन से ज्ञात हो जाता है। हिन्दू मुसलमान संस्कृतियों के प्रेम पूर्ण काव्य की अभिव्यक्ति इसमें देखी जा सकती है। हिन्दू धर्म के प्रधान आदशों को मानते हुए भी सूफी सिद्धान्तों के निरूपण में मुसलमान साहित्यकारों की कुशलता है। इन दोनों भिन्न सिद्धान्तों के एकीकरण ने प्रेम काव्य को सजीवता के साथ ही साथ लोकप्रियता भी प्रदान की। फलस्वरूप जिस प्रकार संत-काव्य की परम्परा धार्मिक काल के बाद भी चलती रहीउसी प्रकार प्रेम काव्य की परम्परा भी धार्मिक काल के बाद - मी साहित्य में दृष्टिगोचर होती रही है।

 

सूफी काव्य में वैशिष्ट्य और अवदान की प्रक्रिया इस रूप में देखी जा सकती है-

 

1. लोक-पक्ष एवं हिन्दू संस्कृति का अवलोकन: 

सूफी प्रेम काव्यों में हिन्दू लोक-संस्कृति की वैयक्तिकता एवं सामाजिकता का चित्रण हुआ है। हिन्दू लोक-संस्कृति में व्याप्त अन्धविश्वासजादू-टोनामन्नतमनोतियाँतीर्थव्रत आदि का चित्रण हुआ है। लोकोत्सवलोक-व्यवहार लोकाचार तथा लोकनाथ द्वारा हिन्दू लोक-संस्कृति में चली आ रही परम्परागत प्रेम कहानियों की पष्ठभूमिफारसी की मसनवी शैली तथा इस्लाम धर्म की मान्यताओं को समन्वित करके प्रस्तुत किया गया है। प्रेमकाव्यों में षट् ऋतुओं का वर्णन और बारहमासा आदि का वर्णन भारतीय काव्य-परम्परा के अनुसार हुआ है।

 

(i) नारी के विषय में चित्रणः 

सूफियों ने प्रेम द्वारा प्राप्त की जाने वाली सुन्दर नारी को परमात्मा का प्रतीक माना है। प्रेम का प्रमुख पात्र नारी ही वह नूर है जिसके बिना सम्पूर्ण संसार अंधकारमय है। इन कवियों ने नारी का साध्य तथा प्रेम को साधन माना है। नारी का सौन्दर्य ईश्वरीय प्रतिच्छाया है। परशुराम चतुर्वेदी का मत है को 'सूफी कवियों ने नारी को यहाँ अपनी प्रेम साधना के साध्य रूप में स्वीकार किया है जिसके कारण वह इनके यहाँ किसी प्रेमी के लौकिक जीवन की निरी भोग्य वस्तु मात्र नहीं रह जाती। वह उस समय की साध न-सामग्री भी नहीं कहला सकती जिसमें उसे बौद्ध सहजयानियों ने मुद्रा नाम देकर सहज साधना के लिए अपनाया था। वह उन साधनों की दृष्टि में स्वयं एक सिद्धि बनकर आती है। और इसी कारण इन प्रेमाख्यानों में उसे प्रायः अलौकिक गुणों से युक्त भी बतलाया जाता है । 

 

(ii) मनोवैज्ञानिक पद्धति 

सूफियों ने ज्ञानमार्गी संतों की भाँति धर्म या जाति का खण्डन नहीं किया बल्कि मनोवैज्ञानिक आधार पर हिन्दुओं तथा मुसलमानों को प्रेम मार्ग में एक समान बताया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है. प्रेमस्वरूप ईश्वर को सामने लाकर सूफी कवियाँ ने हिन्दू और मुसलमानों दोनों को मनुष्य के सामान्य रूप में दिखाया और भेदभाव के दश्यों को हटाकर पीछे पीछे कर दिया।"

 

2. सूफी काव्य में प्रेम-पक्षः 

सूफियों का मुख्य प्रतिपाद्य प्रेम है और प्रेम के वियोग पक्ष को इन्होंने अधिक महत्त्व दिया है। सूफी कवियों ने प्रेम का जो चित्रण किया हैउस पर विदेशी और भारतीय दोनों शैलियों की छाप दष्टिगोचर होती है। जायसी ने फारसी की शैली के अनुसार नायक को प्रेम में विहल तथा प्रेमपात्र की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील दिखाया है। भारतीय धर्म के अनुसार तो आत्मा को पत्नी और परमात्मा को पुरूष मानकर पत्नीरूपी आत्मा को पुरूषरूपी परमात्मा की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील माना जाता है । सूफी कवियों ने प्रारम्भ में नायक को प्रियतमा (ईश्वर) की प्राप्ति में प्रयत्नशील दिखाने के बाद उपसंहार में नायिका ( प्रियतमा) के प्रमोत्कर्ष को भी दिखलाया ।

 

3. सूफी काव्य में प्रबन्धात्मताः 

सूफी रचनाकारों ने लौकिक प्रेम कहानियों के माध्यम से अलौकिक प्रेम की अभिव्यंजना की है। इन कवियों ने जिस प्रबन्धात्मकता को अपनाया है वह भारतीय महाकाव्य तथा फारसी मसनवी शैलीका मिश्रित रूप है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मसनवी को अन्योक्ति काव्य की संज्ञा दी है। सूफी कवियों के प्रेमाख्यान एक ही प्रकार के साँचे में ढले हुए लगते हैंक्योंकि सभी का लक्ष्य प्रेम तत्त्व का निरूपण करना है । आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का मानना है कि "कथानक को गति देने के लिए सूफी कवियों ने प्रायः उन सभी कथानक रूढ़ियों का व्यवहार किया है जो परम्परा से भारतीय कथाओं में व्यवहत होती रही हैंजैसे चित्रदर्शनस्वप्नद्वारा अथवा शुक-सारिका आदि द्वारा नायिका का रूप देख या सुनकर उस पर आसक्त होनापशु-पक्षियों की बातचीत से भावी घटना का संकेत पानामन्दिर या चित्रशाला में प्रिय युगल का मिलन होना इत्यादि।" सूफी काव्य में व्यवहत कुछ ईरानी साहित्य की रूढ़ियों का भी वर्णन किया हैजैसे प्रेम-व्यापार में पाटियों और देवों का सहयोग आदि ।

 

4. सूफी काव्य में धार्मिक सहिष्णुताः 

धार्मिक दष्टिकोण से हिन्दूओं के वेदान्त और मुसलमानों के सूफीमत में बहुत साम्य है। मौलाना सैयद सुलेमान नदवी सूफीमत को वेदान्त से प्रभावित मानते है। उनका मत है, "इसमें तो कोई सन्देह नहीं कि मुसलमान सूफियों पर भारत में आने के बादहिन्दू वेदान्तियों का प्रभाव पड़ा। इन दोनों धर्म के सिद्धांतों ने प्रेमकाव्य की रूप-रेखा का निर्माण किया। जो प्रेमकथाएँ मुसलमान कवियों द्वारा लिखी गयी है उनमें धार्मिक संकेत अवश्य हैंपर जो प्रेम-कथाएँ हिन्दू साहित्यकारों द्वारा लिखी गयी है उनमें काव्यत्व और घटना वैचित्र्य ही प्रधान है। इतना अवश्य है कि हिन्दू प्रेम कथाकारों ने मुसलमानों द्वारा चलाई गयी प्रेम-कथा के आदर्शों का पूर्ण रूप से पालन किया हैं।

 

5. प्रतीक विधान का मार्मिक चित्रणः 

सूफी कवियों ने अपनी रचनाओं में कुछ शब्दों को सांकेतिक रूप में प्रयुक्त किया हैजिन्हें प्रतीक विधान के अनुसार विशिष्ट सन्दर्भ में विशेष अर्थ के लिए प्रयोग किया है। जायसी द्वारा रचित 'पद्मावतमें इस प्रयोग को देखा जा सकता हैयथा

 

"तन चितउर मन राउर कीन्हा ।

हिय सिंघल बुधि-पद्मिनी चीन्हा ।। "

 

तात्पर्य यह है शरीर तो चितौड़ हैमन राजा हैहृदय सिंघल द्वीप है और बुद्धि पद्मिनी है। इसी प्रकार के प्रेमाख्यानों में प्रतीक- विधान देखा जा सकता हैं। संत काव्य धर्माश्रय एवं राजश्रय से दूर लोकाश्रय में मुक्त रूप में पोषित होने वाली यही एक परंपरा है जिसने तत्कालीन जनता की काव्य- रूचि एवं मनोरंजन की अभिलाषा को रोमांचक आख्यानों द्वारा भर दिया है।

 

सूफी काव्य धारा के प्रमुख कवियों में मौलाना दाऊदकुतुबनजायसीमंझनउसमान आदि हुए हैं जिन्होंने अपने काव्य में सूफी काव्य परम्परा को अग्रसर किया है। सूफी कवियों का कथा क्षेत्र ऐतिहासिक और काल्पनिक दोनों ही है। ऐतिहासिक कथानकों के रूप में रत्नसेन एवं पद्मावती रहे है। सूफी कवियों द्वारा समस्त रचनाएँ एक प्रकार से कथा-रूपक के अन्तर्गत आती है।

 

इनके प्रेमाख्यानों में नायक-नायिका को सांसारिक संबंधों के प्रति उदासीन दिखाया गया है। इन काव्यों में नायकों पर योगियों का प्रभाव दष्टिगत होता है। नायक को जीवन और नायिका को ब्रह्मा का प्रतीक माना गया है। 

सूफी कवियों की लौकिक दष्टि बड़ी सजग थी। अपने आस-पास के विस्तत वातावरण को इन्होंने बखूबी प्रकट किया है। उनकी रचनाओं में भारतीय जीवन एवं संस्कृति का बड़ा सजीव चित्रण हुआ है। भारतीय सामाजिक जीवन के प्रतीक त्योहारोंउत्सवों एवं संस्कारों का इनकी रचनाओं में समावेश देखा जा सकता है। 

सूफी कवियों का प्रमुख काव्य आदर्श अध्यात्म विरह एवं प्रेम का निरूपण करना थाकिन्तु इसके साथ ही यश की लालसालोकहित एवं कल्याण की भावना भी इनके काव्य में समाहित अंग है।

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