पाश्चात्य चिंतन में मूल्य की अवधारणा |सुखवाद पूर्णतावाद | Concept of value in western thought

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पाश्चात्य चिंतन में मूल्य की अवधारणा (Concept of value in western thought)

पाश्चात्य चिंतन में मूल्य की अवधारणा |सुखवाद पूर्णतावाद | Concept of value in western thought



पाश्चात्य चिंतन में मूल्य की अवधारणा :

 

  • नीतिशास्त्र में 'मूल्य' शब्द का क्या अर्थ है? नैतिक दृष्टि से मूल्य मानव जीवन में क्या महत्व रखता है? 'मूल्य' शब्द की कोई सर्वमान्य परिभाषा करना अत्यंत दुष्कर हैं। क्योंकि विभिन्न परिप्रेक्ष्य में इस शब्द का प्रयोग विभिन्न अर्थों में किया गया है। सामान्य रूप से मूल्य शब्द से किसी भौतिक वस्तु अथवा उस मानसिक अवस्था के उस गुण का बोध कराता है जिसके द्वारा मनुष्य की किसी आवश्यकता, कामना या इच्छा की तृप्ति होती है। स्पष्ट है कि ऐसी सभी वस्तुएँ या मानसिक अवस्थाएँ जिनसे मनुष्य की किसी न किसी इच्छा या आवश्यकता की पूर्ति होती है, उन सभी को मूल्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। 'मूल्यों' का अस्तित्व इस प्रकार अंततोगत्वा मानवीय आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की पूर्ति पर निर्भर है। इनके अभाव में 'मूल्य' की कोई कल्पना निरर्थक और असम्भव है। प्रकारान्तर से हम कह सकते है कि मनुष्य की इच्छाओं और आवश्यकताओं की अनुपस्थिति में किसी वस्तु या मानसिक अवस्था का कोई 'मूल्य' नहीं हो सकता है।

 

  • पुनः मनुष्य के लिए सभी वस्तुएँ समान रूप से मूल्यवान' नही होती क्योंकि कुछ को केवल साधन रूप में और कुछ को 'साध्य रूप में मूल्यवान माना जा सकता है । इस दृष्टि से मूल्यों की विवेचना दो प्रकार (अ) साधन मूल्य ( ब ) एवं साध्य मूल्य' के रूप में की जा सकती है। साधन मूल्यों को 'परतः मूल्य एवं साध्य मूल्यों को 'स्वतः मूल्य' भी कहा जाता है। साधन मूल्य ऐसी वस्तुएँ होती है जो स्वयं में शुभ न होकर किसी अन्य वस्तु के साधन के रूप में ही शुभ होती है जैसे भोजन, वस्त्र, मकान, धन, दौलत आदि । मार्क्स के शब्दों में इनकी उपयोगिता मनुष्य की प्राकृतिक सत्ता की दृष्टि से मानी जा सकती है। इन्हें 'शारीरिक मूल्य' अथवा आर्थिक मूल्य भी कहा जा सकता है।

 

  • उपर्युक्त साधन मूल्यों के अतिरिक्त कुछ ऐसे मूल्य भी मनुष्य के लिए स्वीकृत है जिन्हें 'साध्य मूल्य' कहा जाता है। भौतिक वस्तुओं के विपरीत मनुष्य की कुछ मानसिक अवस्थाएँ किसी वस्तु के साधन के रूप में शुभ न होकर अपने आपमें शुभ एवं स्वतः साध्य होती है। इनकी शुभता परिणामों से निर्धारित नहीं होती बल्कि स्वतः सिद्ध होने के कारण वांछनीय होती है। इन्हीं स्वतः साध्य मानसिक अवस्थाओं से सम्बन्धित मूल्यों को ही 'साध्य मूल्य' कहा जाता है। प्रश्न है कि मनुष्य की वे कौन सी मानसिक अवस्थाएँ जो स्वतः शुभ एवं वांछनीय है? इस प्रश्न का कोई सर्वमान्य उत्तर देना अत्यंत कठिन है क्योंकि विभिन्न चिंतकों ने अपने-अपने ढंग से ऐसी मानसिक अवस्थाओं का उल्लेख किया है जो अपने आप में शुभ है। प्लेटो तथा अरस्तू ने दार्शनिक ज्ञान या चिंतन को स्वतः साध्य माना है जबकि बेन्थम, मिल, सिजविक जैसे दार्शनिकों ने 'सुख' या 'आनन्द' को स्वतः शुभ माना है। इन सभी से भिन्न कांट ने 'शुभ संकल्प को ही स्वतः शुभ एवं वांछनीय माना है। इसी तरह सुन्दर वस्तुओं के प्रत्यक्ष एवं पारस्परिक मैत्री एवं स्नेह में निहित आनन्द को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। भारतीय मनीषियों ने 'सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्'- 'सत्य, कल्याण, सौन्दर्य को स्वतः साध्य मूल्य माना है। स्पष्ट है कि मूल्यों का निर्धारण नीतिशास्त्र का एक प्रमुख विषय है और विभिन्न विचारधाराओं ने अपने-अपने ढंग से इसे स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि मूल्यों का अविर्भाव कैसे होता है? तथा उनका स्वरूप क्या है


1 सुखवाद

 

सुखवाद का घनिष्ठ सम्बन्ध स्वार्थवाद है। इसलिए स्वार्थवाद की विवेचना करते हुए सुखवाद को समझने का प्रयास होगा।

 

  • 'स्वार्थवाद' जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, 'यह व्यक्ति के अपने हित या लाभ को महत्व देता है। बटलर ने इसे 'आत्मप्रेम के सिद्धान्त के रूप में निरूपित कर इसके स्वरूप को स्पष्ट किया है । इस दृष्टि से मनुष्य के किसी भी कार्य के उचित या अनुचित होने का निर्णय, करने वाले के व्यक्तिगत काम या हित के संदर्भ में किया जा सकता है। जिस कार्य से करने वाले का हित सिद्ध होता हो वह शुभ या उचित है अन्यथा वे अशुभ या अनुचित है। स्वार्थवाद को सामान्य रूप से दो वर्गों में विभाजित किया गया है - नैतिक स्वार्थवाद और मनोवैज्ञानिक स्वार्थवाद ।

 

  • नैतिक स्वार्थवाद के अनुसार ऐसे सभी कार्य जिससे व्यक्ति को लाभ मिलता हो उचित है तथा जिससे उसे लाभ न मिलता हो वे अनुचित है। इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति को कोई भी कार्य करने के पूर्व केवल और केवल अपने हित का ध्यान रखना चाहिए। ऐसा भी सम्भव है कि व्यक्ति को दूसरो की भलाई करने में भी अपना लाभ दिखाई दें तो ऐसी स्थिति में दूसरे के काम आना भी व्यक्ति का कर्त्तव्य हो जाता है। इसलिए इस सिद्धान्त में विश्वास रखने वाला परोपकार, सहानुभूति, नम्रता, सत्यनिष्ठा आदि को भी अपने हित का साधन बना सकता है। नैतिकता का मौलिक आधार केवल व्यक्तिगत हित या आत्मप्रेम न होकर परोपकार एवं सामाजिक कल्याण है जिसे यह सिद्धान्त स्वीकार नहीं करता। इसलिए मनुष्य के कर्त्तव्य एवं उसके कर्मों के औचित्य को सिद्ध करने के लिए जो कसौटी यह सिद्धान्त देता है उसे नैतिक आदर्श के रूप में स्वीकार करना कठिन है क्योंकि इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति यदि परोपकार भी करता है तो इसी दृष्टि से करता है जिससे उसका हित पूरा हो सके। यह सिद्धान्त व्यावहारिक बुद्धिमत्ता की दृष्टि से तो ठीक है लेकिन यह नैतिकता से बहुत दूर है।

 

  • उपर्युक्त नैतिक स्वार्थवाद के समर्थन हेतु जिस मानव स्वभाव सम्बन्धी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जाता है उसे मनोवैज्ञानिक स्वार्थवाद कहते है। इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य मूलतः स्वार्थी एवं सदैव अपने ही हित की बात सोचने वाला है। प्रत्येक व्यक्ति सदैव अपने ही कल्याण या हित की कामना करता है तथा ऐसे ही कार्य करने को तत्पर रहता है जिसमें उसका हित या कल्याण हो सके। इस सिद्धान्त का समर्थन हाब्स एवं श्लिक ने किया है। मनोवैज्ञानिक स्वार्थवाद के आधार पर नैतिक स्वार्थवाद का समर्थन करने में तार्किक विसंगतियाँ भी है। मनोवैज्ञानिक तथ्य इससे सम्बन्धित होते है कि मनुष्य क्या करता है, जबकि नैतिक निर्णय इससे सम्बन्धित होते है कि मनुष्य को क्या करना चाहिए। इतना ही नही यदि यह मान भी लिया जाय कि मनुष्य स्वभावतः केवल अपने-अपने कल्याण, हित को सिद्ध करने वाले ही कार्य करने को बाध्य है तो यह कहना भी वस्तुतः निरर्थक होगा कि उसे केवल अपने हित को दृष्टिगत रखते हुए कोई कार्य करना चाहिए।


सुखवाद किसे कहते है

  • सुखवाद उस नैतिक चिंतन को कहते है जो सुख को ही मानव जीवन का परमध्येय - शुभ मानता है और सुख की इच्छा' को ही मनुष्य के समस्त कर्मों की एकमात्र मूल प्रेरणा के रूप में स्वीकार करता है। सुखवाद के भी दो भेद है- नैतिक सुखवाद एवं मनोवैज्ञानिक सुखवाद । जो सिद्धान्त यह मानता है कि मनुष्य के लिए सुख या आनन्द के अतिरिक्त कोई वस्तु अपने आप में शुभ नही है उसे नैतिक सुखवाद तथा जो यह मानते है कि मनुष्य के समस्त कर्म सुख प्राप्त करने की स्वाभाविक इच्छा से प्रेरित है उन्हें मनोवैज्ञानिक सुखवाद कहा जाता है।

 

सुख क्या है 


  • सुख क्या है ? इस प्रश्न का कोई सर्वमान्य एवं सुनिश्चित उत्तर देना अत्यंत कठिन है। यद्यपि हम सभी अपने जीवन में सुख का अनुभव करते है तथा उसे दुःख से भिन्न भी मानते है लेकिन जब इसे परिभाषित करने का मौका आता है तो हमें कठिनाई का सामना करना पड़ता है। सामान्यतः "शारीरिक पीड़ा तथा मानसिक कष्ट के अभाव को दुख कहा जा सकता है।" सुख की यह परिभाषा निषेधात्मक है क्योंकि इसमें सुख को केवल दुःख के अभाव के रूप में समझा गया है। सुख को वांछनीय अनुभूति के रूप में भी स्वीकार किया है। सुख को जीवन का आनन्द नहीं माना जा सकता है यद्यपि दोनों ही मूलतः संतोष देने वाली अनुभूतियाँ हैं । इन्द्रिय संवेदनों एवं प्राकृतिक इच्छाओं के पूर्ण होने पर उत्पन्न अनुभूति, सुख कही जा सकती है जबकि आनन्द का सम्बन्ध मनुष्य की प्राकृतिक शारीरिक इच्छाओं की अपेक्षा उसके मानसिक, बौद्धिक पक्ष से अधिक होता है। इसलिए आनन्द, सुख की अनुभूति की तुलना में कम तीव्र लेकिन स्थायी अनुभूति है। 


2 उपयोगितावाद :

 

जो सिद्धान्त मनुष्य के वैयक्तिक सुख या हित के स्थान पर अधिकतम व्यक्तियों के सुख या हित को ही मनुष्य के सभी कर्मों की कसौटी मानता है उसे सर्वार्थमूलक सिद्धान्त कहा जा सकता है। इस सिद्धान्त के अनुसार वैयक्तिक सुख के स्थान पर अधिकतम व्यक्तियों के लिए "अधिकतम उपयोगिता को समस्त मानवीय कर्मों के मूल्यांकन का एकमात्र कसौटी है। बेन्थम, मिल एवं सिजविक आदि चिंतकों ने इस सिद्धान्त का समर्थन एक दूसरे के विचारों से पूर्णतः सहमत न होते हुए भी किया । कतिपय प्रमुख चिंतकों के विचारों की विवेचना निम्नलिखित रूप में की जा सकती है :-

 

  • बेंथम को उपयोगितावाद का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है। उनके अनुसार कानून सामान्य लोगों के कल्याण के महत्वपूर्ण साधन है। उनके अनुसार वही कानून या नियम न्यायसंगत या उचित होते है जो सामाजिक उपयोगिता की कसौटी पर खरे उतरते है। बेंथम कहते है कि किसी कार्य या नियम की उपयोगिता उससे प्राप्त होने वाले सुख पर निर्भर होती है। दूसरे शब्दों में जो नियम या कार्य सुख की उत्पत्ति एवं वृद्धि में जितना अधिक सहायक होता है वही उपयोगी माना जा सकता है। इसलिए इस सिद्धान्त को सुखमूलक उपयोगितावाद' की संज्ञा से अभिहित भी किया जाता है।

 

  • स्पष्टतः यह सिद्धान्त 'मनोवैज्ञानिक सुखवाद' पर आधारित है जो मनुष्य के सभी कर्मों के प्रमुख प्रयोजन का उत्तर देता है। मनुष्य वही कार्य करने को प्रेरित होता है जिसमें उसे अधिक से अधिक सुख प्राप्त हों तथा दुःख से बचाव हो सके। बेंथम के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के समस्त कार्यो का एकमात्र प्रयोजन स्वयं के लिए अधिकतम सुख प्राप्त करना है। हाब्स के समान वे भी मनुष्य को मूलतः स्वार्थी मानते है इसलिए केवल सुख ही स्वयं में शुभ एवं वांछनीय है तथा शेष वस्तुएँ - गुण या मानसिक अवस्थाएँ सुख के साधन रूप में ही शुभ एवं वांछनीय होती है। सत्य, शिव एवं सुन्दर, ईमानदारी जैसे नैतिक सद्गुण भी सुख के साधन के रूप में ही शुभ है न कि स्वयं में शुभ है।

 

  • यदि सुख ही समस्त मानवीय कर्मों के शुभत्व को निर्धारित करने की कसौटी है तो जिस कार्य से जितना ही सुख मिलता है उसे उतना ही शुभ माना जा सकता है। बेन्थम ने सुख को मापने के लिए, उसकी मात्रा या परिमाण पर जोर दिया है क्योंकि गुणात्मक दृष्टि से सभी सुख समान होते है; किसी भी सुख को दूसरे की तुलना में उत्कृष्ट या निकृष्ट नहीं माना जा सकता है। सुख के परिमाण को मापने के लिए बेन्थम द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्त को 'सुख - कलन' कहा जाता है। इसके अनुसार सुख की कमी या अधिकता को तीव्रता, अवधि, निश्चितता, निकटता, उत्पादकता, शुद्धता एवं व्यापकता - इन सात तत्त्वों द्वारा मापा जा सकता है। यही तत्त्व सुख की मात्रा के साथ-साथ उसकी वांछनीयता को भी सुनिश्चित करते है. । 


  • जॉन स्टुअर्ट मिल ने बेन्थम के सुखमूलक उपयोगितावाद को विकसित एवं अधिक तर्कसंगत ढंग से प्रस्तुत करते का कार्य किया। उनकी दृष्टि में भी कोई कर्म उसी अनुपात में शुभ या अशुभ होता है जिस अनुपात में उससे प्राप्त होने वाले सुख या दुख की उत्पत्ति होती है। सुख ही स्वतः साध्य है एवं एकमात्र शुभ है तथा शेष अन्य सभी उसके साधन के रूप में ही शुभ एवं वांछनीय है। मिल भी बेन्थम के समान स्वार्थमूलक नैतिक सुखवाद को स्वीकार नहीं करते है तथा व्यक्ति के सुख के स्थान पर अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख को ही मनुष्य के समस्त नैतिक कर्त्तव्यों का आधार मानते है । दूसरे शब्दों में उपयोगिता ही नैतिकता का मूल आधार है।


3 पूर्णतावाद :

 

  • सुखवाद एवं उपयोगितावाद मनुष्य की शारीरिक, मानसिक इच्छाओं, वासनाओं एवं आवश्यकताओं को केन्द्र में रखते हुए उसके कर्त्तव्यों का निर्धारण करता है लेकिन मनुष्य का जीवन मात्र इन्हीं स्वाभाविक प्रवृत्तियों द्वारा ही निर्धारित नही होता, क्योंकि बुद्धि या विवेकशीलता भी उसके जीवन की प्रमुख विशेषता है जो उसके कर्मों को निर्धारित करती है या कर सकती है। इसलिए मनुष्य के कर्त्तव्यों को केवल शारीरिक या मानसिक प्रवृत्तियों एवं आवश्यकताओं के आधार पर ही सुनिश्चित नही किया जा सकता है। हीगल, ग्रीक एवं ब्रेडले जैसे प्रत्ययवादी चिंतकों ने मनुष्य के कर्त्तव्य की विवेचना हेतु पूर्णतावाद या आत्मपूर्णतावाद का प्रतिपादन किया ।

 

  • प्रत्ययवादी दार्शनिकों के अनुसार मनुष्य मूलतः एक आत्म प्रबृद्ध, विवेकशील प्राणी है, चेतना उसका मुख्य स्वरूप है। स्वयं को जानना, पहचानना ही उसके जीवन का प्रमुख लक्ष्य है जिसमें उसे बुद्धि एवं विवेक की सहायता प्राप्त होती है। इन दार्शनिकों के अनुसार समाज में रहते हुए मनुष्य को अपनी सभी शक्तियों के अधिकतम विकास के लिए निरंतर प्रयत्न करते रहना चाहिए क्योंकि इसी में उसकी वास्तविक 'आत्मपूर्णता' निहित है। भले ही यह सिद्धान्त मनुष्य के स्वतंत्र व्यक्तित्व और उसकी आत्मपूर्णता को सर्वाधिक महत्व देता है लेकिन यह स्वार्थवाद से मूलतः भिन्न है क्योंकि इन दार्शनिकों के अनुसार समाज के व्यापक हित में ही अंततोगत्वा व्यक्ति का हित निहित होता है। व्यक्ति को व्यापक सामाजिक कल्याण के एक अंश के रूप में ही अपने व्यक्तिगत हित या कल्याण हेतु प्रयास करना चाहिए क्योंकि समाज में रहकर ही व्यक्ति का वास्तविक कल्याण सम्भव है।

 

  • आत्मपूर्णतावाद मनुष्य की स्वार्थमूलक एवं पदार्थमूलक दोनों प्रवृत्तियों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास करता है। मनुष्य के जीवन में विवेक या बुद्धि के साथ-साथ उसकी इच्छाओं एवं भावनाओं को भी उचित महत्व प्रदान करके यह सिद्धान्त बुद्धिवाद एवं सुखवाद इन दोनों विरोधी सिद्धान्तों में निहित सत्यों को भी स्वीकार करता है। यह सिद्धान्त न तो सिनिक्स तथा स्टोइक की भांति मनुष्य के जीवन में बुद्धि की एकमात्र महत्ता स्वीकार करते है और न ही सैरेनैक्स की भाँति केवल शारीरिक, ऐन्द्रिक इच्छाओं की तृप्ति में उसका कल्याण देखते है।

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