पंच क्लेश क्या होते हैं |पंचक्लेशों के भेद (प्रकार ) और उनका विस्तृत वर्णन | Panch Klesh Kya Hain Details in Hindi

Admin
0

पंचक्लेशों के भेद (प्रकार ) और उनका विस्तृत वर्णन

पंच क्लेश क्या होते हैं |पंचक्लेशों के भेद (प्रकार ) और उनका विस्तृत वर्णन | Panch Klesh Kya Hain Details in Hindi

पंच क्लेश क्या होते हैं ?

 

महर्षि पतंजलि कृत योगदर्शन के साधनपाद के तीसरे सूत्र में पाँच प्रकार के क्लेशों का वर्णन किया गया है।

क्लेश शब्द का अर्थ 

  • क्लेश का यदि शाब्दिक अर्थ करें तो क्लेश शब्द का अर्थ है विपर्यय, मिथ्याज्ञान और वह अविद्या आदि भेद के कारण पाँच प्रकार का होता । ये पाँचों क्लेश जीव मात्र के संसार चक्र में बार - बार आने के हेतु है, तथा महा दुःखदायी हैं। संसार के सभी दुःखों का कारण ये पंचक्लेश ही है। ये पाँचों बन्धन रूपी पीड़ा को उत्पन्न करते है। ये संस्कार समूह हमारे चित्त में वर्तमान में रहते हुये संस्कार रूप गुणों के परिणाम को परिपक्व अर्थात् दृढ़ करते हैं, इसलिये इन्हें क्लेश कहा गया है। 


  • संसार के समस्त दुःखों के मूल ये मिथ्याज्ञान रूपी क्लेश ही है। मनुष्य जीवन भर अज्ञानता वश इन्हीं क्लेशों के कारण भटकता रहता है, तथा ऐसे कर्मों में लिप्त रहता है, जिससे फिर से इस संसार के जन्म मरण के दुष्चक्र फसता रहता है। यदि ये क्लेश रूपी (मिथ्याज्ञान) नष्ट हो जाये तो मनुष्य को आत्मज्ञान रूपी प्रकाश प्राप्त हो जायेगा। इन क्लेशों को क्षीण क्रियायोग से किया जा सकता है। इन सभी क्लेशों के मूल में अविद्या है, अविद्या के कारण ही मनुष्य के अन्य क्लेश भी जीवित रहते है। इसको इस प्रकार समझा जा सकता है जिस प्रकार शरीर में ज्वर आने पर शरीर में अन्य रोग भी उत्पन्न होते हैं, जैसे सिरदर्द, बेचैनी, घबराहट, भूख ना लगना, शरीर में दर्द, अरूचि आदि, तथा जैसे ही ज्वर उतरता है। तब ये लक्षण स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं। उसी प्रकार अविद्या के समाप्त होते ही इन क्लेशों की सत्ता भी समाप्त हो जाती है।

 

पंचक्लेशों के भेद (प्रकार )

 

महर्षि पतंजलि ने इन क्लेशों का वर्णन योगदर्शन में इस प्रकार किया है, इनके पाँच भेद बताये हैं, जो निम्न है-

 

  1. अविद्या 
  2. अस्मिता 
  3. राग 
  4. द्वेष 
  5. अभिनिवेश

 

अविद्याऽस्मितारागद्वेषभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः 2 / 3 पाo यो० सू०

 

अर्थात् 

अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश ये पाँच क्लेश है। उपरोक्त वर्णित पाँचों क्लेश मनुष्य को जगत के प्रपंचों से बांध कर विकारों के रूप में पीड़ित करते रहते हैं। चित्त में स्थिर बने रहने के कारण संस्कार रूप गुणों के परिणाम को परिपक्व करते रहते है।

 

महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में वर्णन करते हुये कहा है कि मनुष्य को जाति, आयु भोग एवं कर्मफल सभी इन क्लेशों के कारण होते हैं, क्योंकि पूर्व जन्म में जैसे हमारे कर्म होते है उन्ही के आधार पर अगले जन्म का निर्धारण होता है। ये क्लशों के कारण ही हमें दुःख भोगने पड़ते है । क्लेश मनुष्य के लिये दुःख के प्रदाता है। इन क्लेशों को अन्य नामों से भी जाना जाता है, यथा मिथ्याज्ञान, भ्रांतिज्ञान, अज्ञान, विपर्यय आदि। 

 

योग भाष्यकार व्यास जी ने लिखा है 

'क्लेशः इति पन्च विपर्ययाः इत्यर्थः ।'

 

अर्थात् क्लेश मिथ्याज्ञान ही है, और वह अविद्या आदि भेद से पाँच प्रकार के हैं। 

सांख्य के अनुसार क्लेश को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है


सांख्य में अविद्या को तम अस्मिता को मोह, राग को महामोह, द्वेष को तामिस्र और अभिनिवेश को अन्ध तामिस्र कहा गया है।

 

  • प्रिय विद्यार्थियों ये अविद्या से उत्पन्न क्लेश प्राणियों के दुःखों के कारण होने से क्लेश कहलाते हैं। क्लेश वह विपरीत ज्ञान है, जो मनुष्य के कर्मों में सहायक होकर कर्मविपाक त्र कर्मफलों अर्थात् जन्म, आयु और भोगों को प्रकट करते हैं, तथा विभिन्न अवस्थाओं में रहते हैं। 


क्लेशों की अवस्थाएं

क्लेशों की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन इस प्रकार है  --

 

महर्षि पतंजलि ने पाँच क्लेशों में अविद्या को इन क्लेशों की जननी कहा है। क्लेशों का मूल ही अविद्या है। अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश क्लेश की ही चार अवस्थाएं हैं। ये चारों अवस्थायें अविद्या की नहीं है। अविद्या सभी क्लेशों की उत्पत्ति का कारण हैं, तथा अविद्या का नाश होते ही सभी क्लेशों का अभाव हो जाता है। 


महर्षि पतंजलि ने इन अवस्थाओं का वर्णन साधनपाद में इस प्रकार से किया  है-


'अविद्या क्षेत्रमुत्त रेषां प्रसुप्त तुन विच्छिन्नो दाराणाम् ।' 2/4 पा० योo सू०

 

अर्थात् 

  • जो प्रसुप्त, तुन, विच्छिन्न और उदार अवस्थाओं में रहने वाले हैं एवं जिनका वर्णन अविद्या के बाद किया गया है उन अस्मिता आदि चारों क्लेशों का मूल कारण अविद्या ही है, अज्ञानता ही है।

 

अविद्या इन चारों क्लेशों (अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) के मूल में हैं। इन चार क्लेशों की ही चार अवस्थायें है। ये चारों अवस्थायें अविद्या की नहीं हैं, क्योंकि अविद्या के कारण ही ये क्लेश है। अविद्या के अभाव में ये सभी क्लेशों का भी अभाव हो जाता है। 

चारों क्लेशों की चार अवस्थाओं का वर्णन निम्न है -

 

1. प्रसुप्त अवस्था - 

  • प्रसुप्त क्लेश वह क्लेश है जो चित्त में स्थिर रहकर भी अपना कार्य नहीं कर पाते हैं। ये क्लेश जब अपना कार्य नहीं कर पाते है, केवल चित्त में संस्कार रूप में सोये रहते हैं। वह अवस्था प्रसुप्तावस्था कहलाती है।

 

2. तनु अवस्था - 

  • जिन क्लेशों को साधना द्वारा शक्ति से रहित कर दिया जाता है, लकिन उनकी वासनाएँ बीज रूप में चित्त में निरन्तर विद्यमान रहती है। क्लेशों की यह अवस्था तनु अवस्था कहलाती है। ऐसी स्थिति में मनुष्य कार्य करने में असमर्थ होकर शांत रहते है। 


3. विछिन्न अवस्था

  • यह वह अवस्था है जिसमें एक क्लेश किसी दूसरे बलवान क्लेश से - दबा हुआ रहता है। तब यह क्लेश की विछिन्न दशा होती है। जैसे राग (क्लेश) के उभरने पर क्रोध (द्वेष) दब जाता है और द्वेष (क्लेश) के उभरने पर राग दब जाता है। जो क्लेश उभरता है वह उसकी उदार दशा है और जो दब जाता है वह उसकी विछिन्न दशा होती है।

 

4.  उदार अवस्था 

  • वह अवस्था है जब क्लेश अपने सहयोगी विषय भोगों को पाकर अपना कार्य सुचारू रूप से कर रहे हो। अपने कार्य में पूर्ण रूपेण प्रवृत्त हो रहे हो। 


उपर्युक्त पाँचों क्लेशों में से अस्मिता आदि चार क्लेशों के ही चार अवस्थाएं, भेद कहे गये हैं। अविद्या के कोई भी भेद अवस्थायें नहीं कही गयी है, क्योंकि अविद्या ही इन चारों क्लेशों का मूल है। अविद्या के समाप्त होते ही सभी क्लेश समाप्त हो जाते है। 


1 अविद्या - 

अविद्या सभी क्लेशों का मूल कारण है। अविद्या के यर्थाथ स्वरूप का वर्णन इस प्रकार है - 

'अनित्यषचिदुःखानात्मसु नित्यषुचि सुखात्मरव्यातिर विद्या । '2/5 पा० योo सू० 


अर्थात अनित्य में नित्य, अपवित्र में पवित्र, दुख में सुख और आनात्मा में आत्मा है का ज्ञान अविद्या है। 

इस सूत्र में अविद्या के स्वरूप का विवेचन किया गया है। अविद्या एक प्रकार का मिथ्याज्ञान है। विपर्यय ज्ञान है। अर्थात् जिसमें जो धर्म नहीं है, उसको उसमें मान लेना, यही अविद्या है। 


अविद्या के चार चरण इस प्रकार है

 

1. अनित्य में नित्य का ज्ञान

  • यह संसार शरीर, मन, इन्द्रियाँ आपसी रिश्ते, धन दौलत मान सम्मान आदि अनित्य है। मनुष्य के लोक परलोक के भोग, भोगों की क्षमता रखने वाला यह शरीर भी विनाशी है। नाशवान है। इस बात को सभी जानते हुय भी राग व द्वेष आदि में घिरे रहते हैं। यह संसार, शरीर, मन, इन्द्रियाँ धन आदि सभी अनित्य है, सदा रहने वाले नहीं है। ये सभी इसी जीवन तक रहने वाले है, नित्य नहीं है, किन्तु फिर भी मनुष्य इसी अनित्य पदार्थो को ही नित्य समझता है। यही अविद्या है।

 

2. अपवित्र को पवित्र की संज्ञा देना

  • मनुष्य का यह शरीर हाड़, मांस, मज्जा, मल, मूत्र आदि अपवित्र धातुओं का बना है। तथा मनुष्य अहंकार वश इस अपवित्र शरीर में पवित्रता का अहंकार करता है तथा इस शरीर के प्रति व अपने पुत्र स्त्री के शरीरों से प्रेम करता है। यही अपवित्रता में पवित्र बुद्धि ही अविद्या है।

 

3. दुःख में सुख की अनुभूति होने का ज्ञान - 

  • यह जगत् तथा इस जगत के सभी विषय दुःख देने वाले है। ऐसा मनुष्य मानता भी हैं। किन्तु फिर भी इन विषय भोगों को सुख देने वाले समझकर उनको भोगने की ईच्छा रखता है। यही दुःख में सुख की अनुभूति का ज्ञान ही अविद्या है।

 

4. अनात्मा में आत्मा की अनुभूति होना

  • मनुष्य का शरीर मन सहित दस इन्द्रिया - एवं चित्त जड़ माने जाते है, तथा आत्मा इनसे अलग है। पृथक् है। आत्मा इस शरीर से सर्वथा पृथक् है। आत्मा चेतन है। किन्तु मनुष्य को ऐसा ज्ञान होते हुये भी अविद्या के कारण इसी को अपना ही स्वरूप मान लेता है। आत्मा को इस देह से पृथक् अनुभव नहीं कर पाता है। इसी का नाम अनात्मा में आत्मभाव की अनुभूति होना कहते है, यही अविद्या है।

 

अस्मिता 

दादर्शन शक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ।' - 2/6 पा० यो० सू०

 

  • अर्थात् दृक शक्ति और दर्शन शक्ति का एकी भाव ही अस्मिता है। इस सूत्र में अस्मिता क्लेश के स्वरूप का वर्णन है। यहाँ आत्मा (पुरूष) को हक शक्ति अर्थात देखने वाला दृष्टा कहा है, और दर्शन शक्ति को बुद्धि या चित्त कहा है। दृष्टा (पुरूष) और दर्शन शक्ति (बुद्धि, चित्त) ये दोनों एक दूसरे से विलक्षण एवं पृथक है। 
  • पुरूष चेतन है और चित्त या बुद्धि जड़ है। ये दोनों कभी एक नहीं हो सकते है, किन्तु मनुष्य अविद्या के कारण ही इन दोनों को एक ही समझता है। आत्मा चेतन है और चित्त जड़ है। पुरूष त्रिगुण सत्, रज, तम से परे है, तथा चित्त तीनों गुणों से संयुक्त है। पुरूष स्वामी है जबकि चित्त सेवक है। पुरूष परिणाम से रहित है जबकि चित्त परिणाम से युक्त है। इस तरह आत्मा (पुरूष) व चित्त दोनों के अलग- अलग होते हुये भी मनुष्य को इनमें अविद्या के कारण भेद ज्ञान प्रतीत नहीं होता है। इस प्रकार अविद्या के कारण भेद ज्ञान की प्रतीति ना हो पाने की स्थिति को अस्मिता क्लेश कहा गया है।

 

महर्षि व्यास के अनुसार 

'पुरूषो हकषक्ति बुद्धि- दर्शनषक्तिरित्येतयोरेकस्वरूपापत्तिरिवास्मिताक्लेश उच्यते ।' 

व्यास भाष्य पा० यो सू० 2/6 


पुरुष हक शक्ति अर्थात देखने जानने वाला और बुद्धि दर्शन शक्ति अर्थात दिखाने वाला है। इन दोनों की एक स्वरूपता ख्याति ( दोनों पृथक-पृथक है फिर भी ) अर्थात एकरूपता जैसी प्रतिति को ही अस्मिता क्लेश कहते है ।

 

इस अस्मिता क्लेश के कारण ही मन इन्द्रिय और शरीर में आत्म भाव अर्थात अहमत्व और ममत्व पैदा हो जाता है, तथा शरीर मन और इन्द्रियों को सुख पहुँचाने वाले विषयों और वस्तुओं में राग उत्पन्न हो जाता है।

 

3 राग 

मनुष्य ने संसार में जिन सुखों का अनुभव कर लिया है, मनुष्य को उस सुख अथवा सुख के साधनों में इच्छा व तृष्णा या लोभ का होना ही राग नाम क्लेश है। 

महर्षि पतंजलि ने राग का स्वरूप इस प्रकार वर्णित किया है-


सुखानुशयी रागः । 2/7 पा० यो० सू०

 

अर्थात सुखों के पश्चात रह जाने वाला संस्कार तथा सुखप्रद वस्तु में जो लगाव रूप भाव है, वही राग क्लेश है। 

सुख भोगने के पश्चात चित्त में उसको भोगने की आकांक्ष हमेशा बनी रहती है। उसे ही राग कहा गया है। 


महर्षि व्यास के अनुसार -

 

'सुखाभिज्ञस्य सुखानुस्मृतिपूर्वः सुखे तत्साधने वा यो गर्धस्तृष्णा लोभः स राग इति ।' 

व्यास भाष्य-पा० यो० सू० 2/7 


  • अर्थात सुख को जानने वाले को उस (सुख ) के अनुस्मरण पूर्वक उस (सुख) में या उसके साधनों को जो प्राप्त करने की इच्छा रूप तृष्णा या लोभ है, वही राग है।

 

  • आचार्य राजवीर शास्त्री पुरूष संसार में जिन भोगों को भोगता है उनके इन्द्रियों के अनुकूल सुखात्मक भोगों को भोगने के बाद उनके संस्कारों की स्मृति बार - बार होती रहती है और ऐसी इच्छा बनी रहती है कि मैं उन भोगों को फिर से भोगू इस प्रकार लौंकिक सुखात्मक वस्तु को देखकर अथवा सुनकर उसके प्रति तृष्णा या उत्कट इच्छा उत्पन्न होती है वही राग नाम क्लेश होता है।'

 

  • यही राग द्वेष का कारण होता है। क्योंकि चित्त में राग के संस्कार एकत्रित हो जाने पर जिन वस्तुओं से शरीर इन्द्रियों और मन को दुःख प्रतीत हो अथवा सुख के साधनों में विघ्न डालने वाली वस्तुओं से द्वेष होने लगता है


4 द्वेष -

 

चौथा क्लेश द्वेष है। यह वह द्वेष रूप संस्कार है, जो दुख के अनुभव के पश्चात दुख देने वाले साधनों के प्रति घृणा भाव से उत्पन्न होता है। जिसका वर्णन महर्षि पतंजलि ने इस प्रकार किया है-

 

'दुःखानुषयी द्वेषः ।'  2 / 8 पा० यो० सू०

अर्थात् दुःख की प्रतीति के पीछे रहने वाला क्लेश ही द्वेष है। 


महर्षि व्यास के अनुसार -  

'दुःखाभिज्ञस्य दुःखानुस्मृतिपूर्वो दुःखे तत्साधने वा यः प्रतिधोमन्युर्जिघांसा क्रोधःद्वेषः ।' 

व्यास भाष्य पा० यो० सू० – 2 / 8 


अर्थात 

दुख का अनुभव करने वाले मनुष्य का दुःख के अनुरूप स्मृतिपूर्वक दुःख या दुःख के साधनों में जो घृणा भाव उत्पन्न होता है या क्रोध उत्पन्न होता है, वह द्वेष है। 


आचार्य श्री राम शर्मा जी - जब कभी किसी व्यक्ति को प्रतिकूल वस्तु या पदार्थ में दुःख का अनुभव होता है तब उसके कारणों या साधनों के प्रति घृणा हो जाती है, और क्रोध पैदा होता है। जब यह क्रोध उसके चित्त में प्रतिष्ठित हो जाता है, यही द्वेष कहलाता है। 


स्वामी विवेकानन्द के अनुसार जिसमें हम दुःख पाते हैं, उसे तत्क्षण त्याग देने का प्रयत्न - करते है ।

 

स्वामी ओमानन्द तीर्थ - जिन वस्तुओं अथवा साधनों से दुःख प्रतीत हो, उनसे जो घृणा  क्रोध हो, उसके जो संस्कार चित्त में पड़े, उसको द्वेष क्लेश कहते हे ।

 

द्वेष क्लेश वह स्थिति है जब सुखात्मक भोगों में कोई बाधक बन रहा हो। तब उस व्यक्ति या वस्तु के प्रति एक विरोधी भावना उत्पन्न होती है कि मैं उस प्रतिकूल वस्तु अथवा बाँधा से बच सकूँ। ऐसी प्रतिकूल भावना ही द्वेष नामक क्लेश है। यह क्लेश राग के विपरीत है। द्वेष क्लेश से चित्त अत्यधिक व्यथित हो जाता है तथा ऐसे अनिष्ट कार्यों में प्रवृत्त हो जाता है, जिसका बाद में पछतावा होता है। अतः योगी को क्लेशों से बचने का सदा प्रयत्न करना चाहिये। 


5 अभिनिवेश -

 

पाँचवा क्लेश अभिनिवेश है। महर्षि पतंजलि पांचवे क्लेश अभिनिवेश को इस प्रकार वर्णित करते हुये कहते हैं-

 'स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढ़ोऽभिनिवेशः।'

पा० योo सू० 2 / 9 

अर्थात 

  • जो परम्परागतानुसार चला आ रहा है तथा जो मूढ़ों की भाँति ज्ञानी पुरुषों में भी आरूढ़ हुआ देखा जाता है। यह मृत्यु भय रूपी क्लेश अभिनिवेश है। सृष्टि के नियमानुसार यदि देखा जाय तो मनुष्य इस संसार में जन्म लेगा तो उसकी मृत्यु भी निश्चित है, किन्तु मृत्यु को निश्चित जानकर सभी भयभीत होते है। जीने की इच्छा सभी की होती हैं मरना कोई भी नहीं चाहता है।

 

प्रिय पाठको, इस चराचर जगत में एक कीट पतंगे से लेकर विवेकशील पुरूषों में भी मृत्यु भय समान रूप से होता है। मनुष्य बचपन से ही इस भय से ग्रस्त रहता है। उसे अनेक कारणों से भय लगता है। जैसे आग, पानी, जानवर ऊँचे स्थान आदि। यह भय - उसे मृत्यु का ही होता है। क्योंकि यह परम्परागत रूप से मनुष्य स्वभाव से चला आ रहा है किन्तु मृत्यु सभी की निश्चित है। चाहे वह विद्वान हो, मूर्ख हो, मूढ़ हो, विवेकी हो, सभी में मृत्यु का भय व्याप्त होता है। यह मृत्युभय ही "अभिनिवेश" है । जो एक क्लेश है। परन्तु जो ज्ञान द्वारा आत्मा के स्वरूप को पहचान लेता है वह इस मृत्युभय रूपी क्लेश से मुक्त हो जाता है क्योंकि आत्मा कभी नहीं मरती, वह तो अजर अमर है, फिर भय किसका ? क्योंकि मृत्यु तो वस्त्र परिवर्तन की भाँति है। जैसे पुराने वस्त्रों को त्यागकर हम नये वस्त्र धारण करते है उसी प्रकार आत्मा भी पुराने जीर्ण क्षीर्ण शरीर को त्याग कर नया शरीर - धारण करती है। जिसका वर्णन श्री कृष्ण ने श्रीमदभगवद्गीता में इस प्रकार किया है यथा-

 

"वांसासि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृहाति नरोऽपराणि 

यथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।" 

गीता 2/22


यह आत्मा अव्यक्त अर्थात् इन्द्रियों का अविषय और अविकारी है, अजर है, अमर है। अतः इस आत्मा को इस प्रकार जानकर मनुष्य को शोक नहीं करना चाहिये ।

 

  • फिर भी मनुष्य को इन क्लेशों राग द्वेष के कारण शरीर में आत्माध्यास हो जाता है। तथा मूढ़ से लेकर विवेकी पुरूष अज्ञान के कारण अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूल कर इस नश्वर, नाशवान, भौतिक शरीर की रक्षा में लगे रहते तथा उसके नाश से भयभीत होते है। इस मृत्यु के भय से जो भी संस्कार चित्त में पड़ते हैं, वहीं मृत्युरूपी भय अभिनिवेश क्लेश है।

 

व्यास भाष्य के अनुसार 

  • महर्षि व्यास पातंजल योगसूत्र के व्यास भाष्य में कहते है कि सभी प्राणियों को नित्य यही आशा होती है कि हम सदैव शरीर के साथ बने रहे। अर्थात हमारी कभी मृत्यु नहीं हो। यह ज्ञान पूर्व जन्म के अनुभव के कारण होता है। यही मृत्यु रूपी भय अभिनिवेश क्लेश है। जो कि विद्वान, मूर्ख तथा क्षुद्र जन्तुओं में भी बराबर दिखाई देता है।

 

आचार्य श्री राम शर्मा जी के अनुसार 

  • यह करण भय रूपी क्लेश समस्त प्राणियों में - अनादि काल से स्वाभाविक रूप से चला आ रहा है। अतः कोई भी प्राणी यह नहीं चाहता कि मेरी मृत्यु हो, सभी संसार में अपनी उपस्थिति चाहते है। एक लघु कीटक भी मृत्यु भय से भयभीत होकर अपनी रक्षा का प्रयास करता है। यह मृत्यु रूपी भय मूढ़जनों की भांति विद्वानों को भी सताता है। 


स्वामी हरिहरानन्द - 

  • वास्तव में 'मैं' अमर होने पर भी उसकी मृत्यु या नाश हो जायेगा। 
  • यह अज्ञान मूलक मरणभय ही प्रधान अभिनिवेश क्लेश है।

 

  • इस प्रकार ये पाँचों क्लेश मनुष्य को दुःख देते है। महर्षि पतंजलि ने इन क्लेशों को तनु (कम) करने के लिये क्रिया योग का वर्णन किया है। ये अविद्या आदि क्लेशों के संस्कार मनुष्य की चित्त भूमि में बीज रूप में अनादि काल से पड़े हुये है । उनको शिथिल (तनु) करने के लिये तथा चित्त को समाधि की प्राप्ति योग्य बनाने के लिये क्रिया योग आवश्यक है।

 

  • प्रिय पाठकों अब आप के मन में प्रश्न उठ रहे होंगे कि यह क्रिया योग है क्या? जिसके अभ्यास से इन दुख रूपी क्लेशों से निवृत्ति प्राप्त की जा सकती है। आपकी इन्हीं जिज्ञासाओं का उत्तर आपको अगले सूत्रों में विस्तार से मिल सकेगा।

Post a Comment

0 Comments
Post a Comment (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top