भवभूति का जीवन परिचय एवं उनकी कृतियाँ | Bhavbhuti Ka Jeevan Parichay Evam Kritiya

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भवभूति का जीवन परिचय एवं उनकी कृतियाँ

भवभूति का जीवन परिचय एवं उनकी कृतियाँ | Bhavbhuti Ka Jeevan Parichay Evam Kritiya


  • महाकवि भवभूति एक महान् कवि थे उनका हृदय अत्यन्त निर्मल था वह सात्विक प्रेम के पक्षपाती थे। उनमें बाहरी कारणों की कोई अपेक्षा नही थी, उनका हृदय अत्यन्त गंभीर था वह आन्तरिक कारणों में विश्वास करते थे।

 

  • महाकवि भवभूति मानव मन को पहचानने में अत्यन्त पारखी थे। इसीलिए उन्होंने भगवान राम की लीलाओं का वर्णन किया है। अतः इस इकाई के अध्ययन से आप बता सकते हैं कि भवभूति का व्यक्तित्व किस प्रकार था और उनकी रचनाशैली क्या थी।  


भवभूति का जीवन परिचय एवं उनकी कृतियाँ

 

  • भारतीय मत (सिद्धान्त मत) वेदों में ही नाटक के बीच उपलब्ध होते है। सभी नाटकीय तत्वों को वेद में देखा जा सकता है। जैसे-ऋग्वेद के संवाद सूक्तों में यम यमी संवाद, उर्वशी पुरूरवा संवाद, सरमा पाणी संवाद, सामवेद में संगीततत्व की सत्ता, यजुर्वेद में धार्मिक कृत्यों के अवसर पर नृत्य विधान आदि । इससे नाटक तत्वों की वेदमूलकता स्पष्टतया सिद्ध होती है। रामायण और महाभारत रंगशाला नट, कुशीलव आदि शब्दो के प्रयोग से भारतीय नाटयकला की प्राचीनता द्योतित होती है। 


  • पाणिनी के पाराषर्यशिलाभ्यां भिक्षु नट सुत्रयोः ( ) तथा कर्मन्द कुशाश्वादिनिः () सूत्र से सिद्ध होता है कि पाणिनी से पहले ही शिलाली और कुशाश्व दो आचार्य हो चुके थे, जिन्होने नटसूत्र (नाटयशास्त्र) का प्रवचन किया था अर्थात् भारतीय नाटयकला पूर्ण विकसित हो चुकी थी। 


  • पतन्जलि ने महाभारत ( ) में 'कंसवध' और 'बलिबन्ध' नामक दो नाटको का स्पष्ट उल्लेख किया है। हरिवंश में भी रामायण की कथा के अभिनय का उल्लेख देखा जाता है। बुद्ध ने अपने अनुशासन में नाटयाभिनय न करने का उपदेश दिया है। मगधराज दिम्बराज ने नागराज का सम्मान करने के लिए नाटय का अभिनय कराया था, ऐसा ऐतिहासिक दृष्टान्तों से प्रतीत होता है।


  • 'नाटयशास्त्र में भरतमुनि ने नाटक के आविभाव और उसके उद्देश्य के विषय में एक अत्यन्त मनोरंजक कथा का उल्लेख किया है। वह इस प्रकार है- वैवस्वत मनु के दूसरे युग ( त्रेता) में लोग बहुत दुःखी हुए। इस पर इन्द्र तथा अन्य देवताओं ने जाकर ब्रह्मा से प्रार्थना की कि आप मनोविनोद का कोई ऐसा साधन उत्पन्न कीजिए जिससे सबका मनोरंजन हो सके। इस पर ब्रह्माजी ने ऋग्वेद से संवाद, सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से नाट्य (अभिनय) अथा अथर्ववेद से रस लेकर नाटकरूप 'पंचमवेद' की रचना की।

 

नाटक का प्रयोजन- 

  • नाटक का प्रयोजन बहुत ही महत्वपूर्ण है। आचार्य भरत ने नाटक को 'सार्ववर्णिक वेद' कहा है। वेद में स्त्री और शूद्रों का अधिकार नही है। किन्तु नाटक में सबका अधिकार है । कवि कालिदास ने विभिन्न रूचि वाले मनुष्यों के लिए नाटक को मनोरंजन का सर्वश्रेष्ठ साधन कहा है। 


  • आचार्य भरत ने नाटक का उद्देश्य बतलाते हुए कहा है- नाटक उत्तम, मध्यम और अधम पात्रों के क्रम का प्रदर्शन कर अत्यन्त प्रभावपूर्ण हितोपदेश करता है। नाटक मनुष्यों में धैर्य, क्रीडा और सुख आदि को उत्पन्न करता है। दुःखार्त, श्रमार्त, शोकार्त, तपस्वी आदि सभी जनो के लिए नाटक उचित अवसर पर विश्रामजनक (मनोरंजन का हेतु) होता है। (नाटयशास्त्र, ) अग्नि पुराण का वचन है- नाटय (नाटक) एक ऐसी वस्तु है जिससे धर्म, अर्थ और काम तीनो पुरूषार्थ की प्राप्ति होती है। त्रिवर्ग साधनं नाटयम ' । (अग्नि पुराण, ) इस विवेचन से सिद्ध होता है कि नाटक जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी है।

 

साहित्य में नाटक का स्थान- 

  • उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि साहित्य में नाटक का स्थान अत्यन्त मनोरंजक एवं नितान्त जीवनोपयोगी है। अतः यह उक्ति अक्षरशः सत्य है- 'काव्येषु नाटक रम्यम्' तथा 'नाटकात कवित्वम्' । अर्थात् काव्यों में नाटक मनोहर होता है और नाटक काव्य के उत्कर्ष की चरम सीमा है। यों तो कुशल साहित्कार किसी भी क्षेत्र में अपने असाधारण कला का सफलता के साथ प्रदर्शन कर सकता है। इसके विपरीत नाटक के दृश्य प्रधान होने के कारण वह अतिशय रमणीय तो होता ही है, उसका प्रभाव भी चिरस्थायी होता है। इस प्रकार कवि अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल होता है। महाकवि कालिदास की विश्वविश्रुतता में उनके  अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का ही अपेक्षाकृत अधिक हाथ हैं तथा महाकवि भवभूति को उनके अपने उत्तररामचरित' नाटक ने ही विश्व में अमरता प्रदान की है। इस प्रकार साहित्य में नाटक का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

 

महाकवि भवभूति Maha Kavi Bhav Bhuti

 

  • उत्तररामचरित जैसे महत्वपूर्ण नाटक के रचियता के नाम के सम्बन्ध में इनके द्वारा लिखी गयी नाटक पुष्पिकाओं के अतिरिक्त कोई अन्य दृढ़तर प्रमाण न होने से विद्वानो में मतभेद है।


  • भवभूति ने अपने नाटकों की प्रस्तावना में 'श्रीकण्ठपदलान्छनः भवभूतिर्नाम' इस प्रकार अपने नाम का परिचय दिया है। इससे स्पष्ट है कि कवि का वास्तविक नाम भवभूति था और श्री कण्ठइस उपाधि से वे बाद में अलंकृत किये गये ।


  • भवभूतिर्नाम इसमें नाम शब्द प्रसिद्धिद्योतक अव्यव है, इसलिए अधिकतर टीकाकारो ने भवभूति प्रचलित नाम तथा श्रीकण्ठ पैतृक नाम माना है । जैसे-श्रीकण्ठ इति... पैतृकं नामधेयमिदम् । भवभूतिरिति प्रसिद्धनामवान् । (वीरराघव) इन टीकाकारो ने इस विषय में अपने मत की पुष्टि के लिए अनेक हेतु भी कल्पित कर लिए है, जैसे-1 साम्बा पुनातु भवभूतिपवित्रमूर्तिः इत्यादि कविरचित श्लोक से प्रसन्न होकर किसी राजा ने इन्हे भवभूति इस उपाधि से सम्मानित किया गया । 2. गिरिजा की स्तुति में कवि द्वारा रचे गये गिरिजायाः कुचौ वन्दे भवभूतिसिताननौ, इस श्लोक के कारण भवभूति नाम से कवि प्रसिद्ध हो गया। वीरराघव तथा घनश्याम ने तो इस शब्द की व्युत्पत्ति की आधारशिला पर एक नयी कल्पना का भी प्रतिष्ठापन किया है-अस्मै कवये ईश्वर एव भिक्षुरूपेणागत्य भूतिं दत्तवानिति वदन्ति । एवं च भवात् भगवती भूतिर्यस्येति भवभूतिरित्यव इत्याहु: । (वीरराघव) भूतिः सम्पत् यस्य ईश्वरेणैव जातु द्विजरूपेण..... दत्ता तदाप्रभृति भवभूतिरिति प्रसिद्धो जातः। (घनश्याम)। अर्थात् भव (शिव) ने भिक्षुक रूप में आकर इन्हे भूति (सम्पत्ति) प्रदान की, अतः इनका नाम भवभूति पड़ गया। कुछ लोग इनके पिता 'नीलकण्ठ' के नाम के अनुकरण पर इनका वास्तविक नाम 'श्रीकण्ठ' था और 'भवभूति' उपनाम था- ऐसा भी कहते है, किन्तु यह युक्ति सर्वथा मान्य नही हो सकती, क्योंकि इनके वंश में अनुप्रासात्मक नामकरण की परिपाटी सिद्ध नही होती। इनके पितामह का नाम भट्टगोपाल था, मिलता-जुलता इनके पिता का नाम (नीलकण्ठ) नही है। उपर्युक्त अन्य युक्तियाँ भी इसलिए मान्य नही हो सकती है, क्योंकि श्रीकण्ठपदलान्छनः' - इसमें श्रीकण्ठपदमेव लान्छनं (लाछि लक्षणे धातु) लक्षणं यस्य सः' इस विग्रह से से 'श्रीकण्ठ' यह लक्षण ही प्रतीत होता है। 
  • अतएव कवि का नाम भवभूति ही है और 'श्रीकण्ठ' इनका लक्षण (विशेषण) है। हॉ, 'भवभूति' नाम इनके माता-पिता ने सम्भवतः इसलिए रखा होगा कि उन्हें भव (शंकर) की कृपा के परिणामस्वरूप ऐसे पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई होगी- ऐसी सम्भावना करना किसी हद तक ठीक कहा जा सकता है।

 

भवभूति वंश 

  • इनके नाटको की प्रस्तावना के आधार पर ही यह भी ज्ञात है कि दक्षिण में विदर्भ (बरार) के अन्तर्गत पद्यपुर नगर में कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयशाखा वाले, काश्यप गोत्रीय पड.क्तिपावन पंचाग्निपूजक और उदुम्बर उपाधि वाले ब्राह्मण लोग रहते थे। उन्ही की कुल में कोई वाजपेय यज्ञ करने वाले महाकवि हुए। उन्ही की वंश परा परम्परा में पाँचवी पीढ़ी में भवभूति का जन्म हुआ। भवभूति के पितामह का नाम भट्टगोपाल, पिता का नाम नीलकण्ठ तथा माता का नाम जतुकणीं (अथवा जातुकणीं) था इनके गुरू का नाम ज्ञाननिधि था ।

 

भवभूति का निवास स्थान- 

  • टीकाकार घनश्याम ने भवभूति के द्वारा प्रयुक्त अनेक द्राविड़ प्रयोगो के आधार पर भवभूति का जन्म स्थान द्राविड़ देश में माना है । मालतीमाधव के कुछ पाठो में तथा भण्डारकरः द्वारा सम्पादित पाठ में 'दक्षिणापथे विदर्भेषु पद्यपुरं नाम नगरम्- ऐसा उल्लेख है। अतः डा0 मिराशी का मत है कि विदर्भ देश के अन्तर्गत पद्यपुर नगर में भवभूति का जन्म हुआ था। एम0 जी0 लेले, जगद्धर के अनुसार पद्यपुर और पद्यावती को एक मानकर ग्वालियर राज्य के अन्तर्गत नरवाड़ से उत्तर पूर्व एक गाँव पवाया या 'पोलावाया' को भवभूति का जन्मस्थान मानते है। बहुत से आधुनिक विद्वानो का कहना है कि भवभूति ने अपनी रचनाओं में गोदावरी से तथा विन्ध्याचल का हृदयग्राही वर्णन किया है, इसलिए बहुत संभव है कि इन्ही दोनो के आस पास इनका जन्मस्थान रहा हो। इस प्रकार भवभूति का जन्मस्थान आज भी अनिर्णीत ही है। 


भवभूति का समय-

  • उत्तररामचरित के प्रथम अंक के सत्ताइसवें श्लोक का चतुर्थ चरण है अविदितगतयामा रात्रिरेव व्यरंसीत्।' इसके सम्बन्ध में किंवन्दती है कि भवभूति ने पहले इसका पाठ ...रात्रिरेव व्यरंसीत्' - ऐसा रखा था, बाद में कालिदास को यह पद्य दिखलाये जाने पर भवभूति ने कालिदास के सुझाव पर उसके स्थान में 'रात्रिरेव व्यरंसीत्' ऐसा संशोधन कर दिया । इस किंवन्दती से ऐसा मालुम होता है कि भवभूति कालिदास के समय में ही हुए थे, किन्तु इस तथ्य की पुष्टि इतिहास से नही होती है। अतः इसे वस्तुतः किंवन्दती ही मानना चाहिए । इसी प्रकार बल्लाल ने अपने 'भोजप्रबन्ध' में धारानगरी के महाराज भोज के दरबार में कालिदास, भवभूति, बाण और मयूर आदि कवियो को एक साथ लाकर बिठा दिया है। इतना ही नहीं, उन्होने एक कथा भी गढ़ कर इस प्रकार लिखी है-राजाभोज द्वारा दिये गये विषय पर कालिदास और भवभूति दोनो ने अपनी-अपनी काव्य रचना की। उनके काव्यों की परीक्षा भगवती भुवनेश्वरी के मन्दिर में की गयी। कालिदास की रचना उत्कृष्टतर होने को ही थी कि भगवती भुवनेश्वरी ने अपनी कृपा से भवभूति की रचना को ही उत्कृष्टतर प्रमाणित कर दिया। 
  • इस आधार पर भी भवभूति और कालिदास को समकालीन सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है, किन्तु भोज प्रबन्ध में विभिन्न काल के कवियों का जमघट तथा उनसे सम्बन्धित कथाएं सभी कुछ इतिहास से मेल न खाने के कारण कदापि न मान्य है। भोज-प्रबन्धएक मनोरंजक ग्रन्थ हो सकता है, एतिहासिक ग्रन्थ नही। 


  • बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित में अनेक पूर्ववर्ती कवियों यथा भास, कालिदास, भट्टारहरिचन्द्र आदि का स्मरण किया है, किन्तु भवभूति की चर्चा नहीं की है। अतः स्पष्ट है कि बाणभट्ट के बाद ही भवभूति हुए । बाण की शैली से भवभूति की रचनाएं प्रभावित भी है। बाणभट्ट का समय सातवीं शताब्दी का पूर्वार्धं है। अतः भवभूति को इसके बाद होना चाहिए । यह भवभूति के समय की पूर्वसीमा है। (क) आचार्य मम्मट (ख) महिमभट्ट (ग) तथा आचार्य क्षेमेन्द्र (घ) ने अपने-अपने ग्रन्थ क्रमश: काव्यप्रकाश, व्यक्तिविवेक तथा औचित्य विचारचर्चा में भवभूति के अनेक उद्धरण दिये है। धनञ्जय ने दशरूपक में उत्तररामचरित के अनेकानेक उद्धरण है। अतः भवभूति 7500 से परवर्ती नहीं हो सकते हैं।

 

  • (ग) राजशेखर ने बालरामायण में अपने को भवभूति का अवतार माना है ( द्रष्टव्य, बालरामायण) राजशेखर का स्थितकाल 210 से 315 ई. माना जाता है। अतः भवभूति को इससे पूर्व होना चाहिए । 


  • (घ) वामन ने काव्यालंकारसूत्रवृत्ति ग्रन्थ में भवभूति के इयं गेहे लक्ष्मी: ने इत्यादि पद्य (उत्तर. 1/38 ) को उद्धृत किया है। वामन का समय 8वीं शती ई. का उत्तरार्द्ध और 9वीं का पूर्वार्द्ध माना जाता है । अतः भवभूति को इनके पूर्व का होना चाहिए । कल्हण की राजतरंगिणी के अनुसार भवभूति कन्नौज के राजा यशोवर्मा के आश्रित कवि थे तथा गउडवहो प्राकृत काव्य के रचयिता वाक्पतिराज भी इन्ही यशोवर्मा के आश्रित थे (राजत.) यशोवर्मा को थे कश्मीर के राजा ललितादित्य ने परास्त किया था। ललितादित्य का समय कनिंघम के अनुसार ई. तक है । 


  • वाक्पतिराज ने गउडवहो (साख्यक पद्य) में भवभूति की प्रशंसा की है और उस सूर्यग्रहण का निर्देश भी किया है, जिसका समय जैकोबी के अनुसार 14 अगस्त 733 ई. निर्धारित किया गया है। अतः सिद्ध होता है कि वाक्पतिराज 7330 में यशोवर्मा का आश्रित कवि था और उस समय तक भवभूति की कीर्ति फैल चुकी थी और वह उसका ज्येष्ठ समकालीन आश्रित कवि था । अतः वाक्पतिराज का समय ईसा की आठवीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जा सकता है और भवभूति उनसे कुछ पूर्व अर्थात् सातवीं शताब्दी के अन्त में हुए होंगे अथवा यह भी सम्भव है कि जिस समय भवभूति अपनी प्रतिज्ञा के चरम उत्कर्षपर हों, उस समय तक वाक्पतिराज कवि के रूप में प्रसिद्धि न पा सके हों । इस प्रकार भवभूति के स्थितिकाल की उत्तरसीमा सातवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध या आठवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध निश्चित है । अतः भवभूति का स्थितिकाल वाणभट्ट (सातवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध) के बाद से लेकर आठवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के बीच सुनिश्चित है।

 

भवभूति और मीमांसक उम्बेक की अभिन्नता

 

  • कुछ दिन पूर्व श्रीशंकर पाण्डुरंग को मालतीमाधव की एक हस्तलिपि प्राप्त हुई थी, जिसके तृतीय अंक की पुस्तिका में लिपिकार ने उसके रचियता के विषय में इति श्री भट्ट कुमारिलशिष्य मालतीमाधवे तृतीयोऽक और अंक की पुष्पिका में इति श्री षष्ठ कुमारिलस्वामिप्रसादप्राप्तवाग्वैभव- श्रीमदुम्बेकाचार्यविरचिते मालतीमाधवे षष्ठोऽक:- ऐसा लिखा है। इससे यह समस्या खडी हो जाती है कि क्या भवभूति और उम्बेक एक ही थे ? उम्बेकाचार्य मीमांसा के बहुत बड़े विद्वान् थे और उन्होने कुमारिल श्लोक वार्तिक पर टीका लिखी है । उस टीका का उन्होंने वे नाम केचिदिह् ..' से प्रारम्भ किया है, जो मालतीमाधव में भी है। इससे भवभूति और उम्बेक की अभिन्नता की पुष्टि होती है। प्रत्यग्रूप भगवान ने चित्सुखाचार्य की तत्वदीपिका की नयन प्रसादिनी टीका में उम्बेक का कई बार उल्लेख किया है और उनको भवभूति से अभिन्न बतलाया है। 


  • श्री हर्ष के प्रसिद्ध ग्रन्थ खण्डनखण्डखाद्य' पर आनन्द पूर्ण ने विद्यासागरी नामक टीका लिखी है, उसमें श्लोकवार्तिकसे दो श्लोक उद्वत किये गये है। टीकाकार ने बतलाया है कि उबैक (उम्बेक) ने इन श्लोको की टीका की है। हरिचन्द्र सूरी के 'षड्दर्शन-समुच्चय' की टीका में गुणरत्न नामक जैन लेखक ( ई.) ने उम्बेक की कारिका (अर्थात श्लोकवातिंत) का अच्छा ज्ञाता बतलाया है। (उम्बेकः कारिकां वेत्त...... ..) इस विवेचन से सिद्ध होता है कि भवभूति का ही दुसरा नाम उम्बेक था । साहित्य में वे भवभूति' नाम से और मीमांसा में उम्बेक नाम से प्रसिद्ध हुए।

 

श्रेष्ठ: परमहंसानां महर्षीणामिवाऽगिंराः । 

यथार्थनामा भगवान् यस्य ज्ञाननिधिर्गुरूः ॥

 

 

  • इस गुरू परिचय विषयक श्लोक के आधार पर कुछ लोग भवभूति और उम्बेकाचार्य की अभिन्नता स्वीकार नही करते, क्योंकि भवभूति ने अपने गुरू का नाम स्पष्ट रूप से इस श्लोक में ज्ञाननिधि बतलाया है, किन्तु बहुत सम्भव है कि उक्त श्लोक में कुमारिलभट्ट का नामान्तरण अथवा उपाधि ज्ञाननिधि हो । 'परमहंसानां श्रेष्ठ: इस विशेषण ज्ञाननिधि उत्तरमीमांसा के आचार्य सिद्ध होते है | जब भी कुमारिलभट्ट पूर्वमीमांसा के आचार्य थे अतः ज्ञाननिधि और कुमारिलभट्ट की अभिन्नता नही बनती है इसका समाधान यह है कि कुमारिलभट्ट उत्तरमीमांसा के भी विद्वान् थे, जिसकी पुष्टि श्लोकवार्तिकस्थ उन्हीं की इस उक्ति से होती है-

 

'इत्याह नास्तिक्रूनिराकरिश्णुरात्मास्तितां भाष्यकृदत्र युक्त्या । 

हढत्वमेतद्विशयष्च षोधः प्रयाति वेदान्तनिशेवणेन ।। 


  • अथवा भवभूति उम्बेक के उत्तरमीमांसा के गुरू ज्ञाननिधि रहे होंगे और पूर्वमीमांसा के गुरू कुमारिलभट्ट। भिन्न-भिन्न शास्त्रों के अध्ययन के लिए भिन्न गुरू करना अयुक्त तो है नही-नैकः सर्वं विजानातिउत्तररामचरित में पदवाक्यप्रमाणज्ञः' इस विशेषण पद से तथा 'चतुर्थ अंक' के दाण्डायन-सौधातकि संवाद 'समांसो मधुपर्क:' से भी उनके मीमांसाकत्व पर प्रकाश डा है अतः भवभूति और उम्बेकाचार्य को एक ही व्यक्ति मानना अयुक्त नही होगा । 


  • भवभूति की बहुज्ञता-भवभूति की विद्वता अपनी पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त हुई थी । समस्त शास्त्रो में उनकी समान अप्रतिहत गति थी। वाणी इन्हे ब्रह्मा के रूप में ही मानकर वशवतिंनी होकर इनका अनुसरण करती थी । यों तो अपने को वे पदवाक्यप्रमाणज्ञः' (व्याकरण-मीमांसा न्यायशास्त्रवेत्ता) विशेषण से अपनी सीमित विद्वता का परिचय देते है, किन्तु उनकी कृतियो के अनेक पद्यो से यह पता चलता है कि वेद, उपनिषद्, वेदान्त, व्याकरण, योग, सांख्य, तन्त्र, जातक, धर्मशास्त्र, न्याय, मीमांसा, राजनीति, कामसूत्र, नाट्यशास्त्र आदि पर उनका पूर्ण अधिकार था जैसे-उत्तर से वेद-विषयक महा. उत्तर । पन्थानो देपवयानाः', असुर्या नाम ते लोकाःआदि से उपनिषद् विषयक, उत्तर. के विवर्न आदि से वेदान्त विषयक, महा. तृ. अं., मा. मा. वें अंक से योग विषयक मा. मा. अतिबोधिसत्त्वैः से जातक-विषयक, उत्तर. अंक में प्रचीयमानसत्त्वप्रकाशः' से सांख्य विषयक, उत्तर, चौथे अंक के विष्कम्भक से धर्मशास्त्र - विषयक, निगृहीतोऽसिइत्यादि प्रयोगो से न्याय-विषयक, मा. मा. तथा सप्तम अंक गत एक उद्धरण से कामसूत्र विषयक, महा. अंक के अनेक स्थलों से तथा मालती माधव के 'कामन्दकी' से नामकरण से राजनीति-विषयक, उत्तर प्रथम अंक में अर्थवाद के प्रयोग से मीसांसा-विषयक, उत्तर. में भरत के लिए 'तौर्यत्रिकसूत्रधार' के प्रयोग से तथा मालती माधव से नाट्यशास्त्र विषयक उनकी ज्ञानराशि का सम्यक् परिचय प्राप्त होता है।

 


1 भवभूति का वास्तविक नाम क्या था ? 

2 इनके पितामह का नाम क्या था ? 

3 भवभूति का जन्मस्थान कहाँ पर था ? 

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