हिंदी कहानी विकास का द्वितीय चरण ( प्रेमचन्द युग) (सन् 1916-1935 ई.)। Premchan Yugin Hindi Kahani

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 हिंदी कहानी विकास का द्वितीय चरण (सन् 1916-1935 ई.)

हिंदी कहानी विकास का द्वितीय चरण ( प्रेमचन्द युग) (सन् 1916-1935 ई.)। Premchan Yugin Hindi  Kahani
 

हिंदी कहानी विकास का प्रेमचन्द युग 


  • द्वितीय चरण को कहानी की प्रेमचन्द की अपूर्व देन के कारण प्रेमचन्द युग कहा जाता है। मुंशी प्रेमचन्द द्वारा रचित कहानियों की संख्या लगभग तीन सौ से अधिक है जो मान सरोवर के आठ भागों में संग्रहीत हैं। इसके अतिरिक्त इनकी कहानियों के संग्रह 'सप्तसरोज', 'नव निधि', 'प्रेम पचीसी', 'प्रेम पूर्णिमा' 'प्रेम द्वादशीप्रेम तीर्थतथा 'सप्त सुमन आदि हैं। 
  • प्रेमचन्द पहले उर्दू में लिखते थे। उनका उर्दू में लिखा हुआ प्रसिद्ध कहानी संग्रह सोचे वतन सन् 1907 ई. में प्रकाशित हुआ था जो स्वातंत्र्य भावनाओं से ओत-प्रोत होने के कारण अंग्रेजी सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया था। 
  • सन् 1919 ई. में उनकी हिंदी रचित प्रथम कहानी पंच परमेश्वर प्रकाशित हुई। उनकी कहानियों में इसके अतिरिक्त आत्माराम', 'शतरंज के खिलाड़ी', 'रानी सारंघा', 'वज्रपात', 'अलग्योझा', 'ईदगाह', पूस की रात', 'सुजान भक्त', 'कफन', 'पंडित मोटे रामआदि विशेष उल्लेखनीय हैं। 
  • प्रेमचन्द की कहानियों में जन साधारण के जीवन की सामान्य परिस्थितियों मनोवत्तियों एवं समस्याओं का मार्मिक चित्रण हुआ है। वे साधारण से साधारण बात को भी मर्मस्पर्शी रूप में प्रस्तुत करने की कला में निपुण कहानीकार थे। उनकी शैली सरल स्वाभाविक एवं रोचक है। जो पाठक के हृदय पर सीधा प्रहार करती है। उनकी सभी कहानियां सोद्देश्य हैं उनमें किसी न किसी विचार या समस्या का अंकन हुआ है किन्तु इससे उनकी रागात्मकता में कोई न्यूनता नहीं आई है। 
  • भाव-विचारकला-प्रचार का सुंदर समन्वय किस प्रकार किया जा सकता हैइसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्रेम चंद का कहानी साहित्य है। 


हिन्दी कहानी विकास द्वितीय चरण में हिंदी कहानी दो विशिष्ट धाराओं में विभक्त होकर चलती है-

 

  • (i) प्रथम धारा व्यक्ति हित या व्यक्ति सत्य के भावात्मक अंकन की हैजिसके सर्वप्रथम प्रमुख कहानीकार जयशंकर प्रसाद हैं और रायकृष्ण दासविनोद शंकर व्यास तथा चतुरसेन शास्त्री इस परंपरा को अग्रसर करने वाले सहयोगी हैं।

 

  • (ii) द्वितीय धारा के विषय में डॉ. इंद्रनाथ मदान का कथन है "हिंदी कहानी के विकास की दूसरी दिशा जिसमें समष्टि-सत्य की संवेदना हैसमष्टि विकास की संचेतना हैसमष्टि मंगल की भावना हैसमष्टि यथार्थ को आत्मसात करने की प्रेरणा हैप्रेम चन्द के कहानी साहित्य से आरंभ होती है।" प्रेमचन्द के समसामयिक कहानीकार सुदर्शन और विश्वंभरनाथ

 

  • शर्मा कौशिक प्रेमचन्द की कथा दष्टि का समर्थन करते हुए दष्टिगोचर होते हैं। प्रेमचन्द और उनके सहयोगी कहानीकारों में समकालीन यथार्थ की आदर्शात्मक परिणति मिलती है। अपनी कहानी यात्रा के अंतिम चरण में प्रेमचंद ने स्वयं को आदर्श के मोह से अलग कर दिया था लेकिन सुदर्शनविश्वंभर नाथ शर्मा 'कौशिकज्वाला दत्त शर्मा आदि बराबर आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहानियां लिखते रहे। इस दृष्टि से कौशिक की रक्षा बंधनसुदर्शन की एलबम', 'हार जीतऔर 'एथेन्स का सत्यार्थीउल्लेखनीय कहानियां हैं।

प्रेमचन्द की कहानी यात्रा के तीन मोड़ माने जा सकते हैं।

 (i) 'पंच परमेश्वर', 'बड़े घर की बेटी नमक का दरोगा आदि प्रारंभिक कहानियों में उनका आग्रह पुरातन आदर्शों को प्रतिष्ठित करता प्रतीत होता है। इन कहानियों में उपदेश का प्रच्छन्न स्वर सुनाई देता है। 

(ii) सन् 1920-30 ई. के मध्य लिखी गई गांधी वादी विवाद धारा सतह पर है। 


(iii) 'मैकू', 'शेख नाद', दुर्गा मन्दिर', 'सेवा मार्गआदि कहानियों में प्रेम चन्द स्थूल कथात्मकता को छोड़कर यथार्थ को विश्लेषण और संकेत के स्तर पर ग्रहण करते दिखाई देते हैं। डॉ. बचन कुमार सिंह के अनुसार, "चरित्रों के चित्रण में मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मताओं का समावेश भी उनमें आ गया है। नाटकीयता तथा व्यंग्य के पैनेपन के कारण उसमें जीवंतमयता और प्रभान्विति की घनता आ गई है। 'नशापूस की रातऔर 'कफनआदि कहानियां प्रेम चन्द की कहानी कला के अंतिम चरण की है। यहां तक आते-आते प्रेम चन्द अपनी सारी आस्थाओं का परित्याग कर देते हैं और जीवन के प्रति उनकी दष्टि अधिक तीखी और निर्मम हो गई है। इन में जो सूक्ष्मता और सांकेतिकता विद्यमान है वह नई कहानीकी अच्छी कहानियों में भी नहीं है। यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि हिंदी कहानी का विकास प्रेमचन्द द्वारा संकेतित दिशा में ही हुआ है।

 प्रेमचन्द की कहानियों की विशेषताएँ 

  • प्रेमचन्द की कहानियों में जहां एक ओर युग का सच्चा चित्रण हैसामाजिकआर्थिकराजनीतिक संदर्भों के विश्लेषण की कोशिश है वहीं दूसरी ओर प्रेमसहानुभूतितपस्या सेवा आदि महनीय मूल्यों का जोरदार समर्थन उनमें है। अधिकांश कहानियों में प्रेम चंद ने जन साधारण के जीवन को उसी की भाषा में उपस्थित किया है। वे संभवतः पहले कहानीकार हैं जिनकी कहानियों में ग्रामीण जीवन अपनी समूची शक्ति और सीमा के साथ उभरा है। डॉ. भगवत स्वरूप मिश्र ने लिखा है, 'मानव स्वभाव के परिचययुगबोधविषय क्षेत्र के विस्तारकहानी कला के उत्कर्ष आदि की दृष्टि से प्रेमचन्द स्कूल का एक भी कहानीकार प्रेमचन्द की गरिमा को नहीं पहुंच सका।"

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