हिन्दी कहानी का उद्भव विकास एवं इतिहास | हिन्दी के प्रमुख कहानीकार और कहानियाँ | Hindi Story Literature History

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 हिन्दी कहानी का उद्भव व विकास ,हिन्दी के प्रमुख कहानीकार और कहानियाँ 

हिन्दी कहानी का उद्भव विकास एवं इतिहास | हिन्दी के प्रमुख कहानीकार और कहानियाँ | Hindi Story Literature History




हिन्दी कहानी का उद्भव व विकास प्रस्तावना 

इस आर्टिकल में हिन्दी कहानी के उद्भव व विकास पर प्रकाश डाला गया है। आधुनिक हिन्दी कहानी के पूर्व भी भारत वर्ष में कहानी का अस्तित्व था, लेकिन अंग्रेजों के भारत आगमन के पश्चात् हिन्दी कहानी जिस रूप में आयी इसका यहाँ पर विस्तृत विवेचन किया गया है। यह विधा वर्तमान में पूर्ण रूप से गद्य की विधा है। जो समय-समय पर अनेक विचारों वादों और साहित्य आन्दोलनों से प्रभावित होती रही। इसकी इसी विकास यात्रा पर हम इस इकाई में गहनता से विचार करेंगे।

 

हिन्दी काहानी का उद्भव 

कहानी शब्द हमारे लिए अपरचित शब्द नहीं है, क्योंकि बचपन में हम जिसे कथा कहते थे, कहानी उसी कथा का साहित्यिक रूप है। इस कहानी को हमने कभी दादी-नानी के मुख से लोक कथा के रूप में सुना तो कभी पण्डित जी के मुख से धार्मिक कथा के रूप में, ये सभी राजा रानी की कहानियाँ, पशु पक्षियों की कहानियाँ, देवताओं और राक्षसों की कहानियाँ, चमत्कारों और जादूटोनों की कहानियाँ, भूत प्रेतों की कहानियाँ, मूर्ख और बुद्धिमानों की कहानियाँ वर्तमान की कहानियाँ का पुरातन स्वरूप थीं, जिन्हें लोग बड़े चाव से सुनते और सुनाते थे। इनके अतिरिक्त, पुराण, रामायण, महाभारत, पन्चतंत्र, बेताल पच्चीसी, जातक कथाएँ आदि कई प्राचीन ग्रन्थ इन कहानियों का आदि स्रोत रहे हैं। इन कहानियों को पढ़ने-सुनने से जहाँ जन सामान्य से लेकर विद्वानों का मनोरंजन होता था, वहाँ इनके माध्यम से अनके शिक्षाएँ तथा उद्धेश्य प्राप्त होते थे। इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इन्हें एक ही साथ कई घंटों और दिनों तक सुना जा सकता है। जिन्हें बार-बार सुनने पर नीरसता की अपेक्षा और अधिक सरसता प्राप्त होती है। ये सभी कहानियाँ हमें परम्परा से प्राप्त हुई, इनमें अतिसंख्य कहानियाँ कल्पना पर आधारित होती हैं, लेकिन कहीं-कहीं इन कहानियों में ऐतिहासिक तथ्यों को भी उजागर किया जाता है। ये ही कहानियाँ वर्तमान कहानी का प्राचीन स्वरूप है।

 

प्राचीन कहानियाँ घटना प्रधान होती थी, जिस घटना के माध्यम से लेखक या वक्ता अपने उद्धेश्य की पूर्ति करते थे। इसके लिए वे कहानियों की घटनाओं को मनोइच्छित रूप देते थे। कहानी की रचना के लिए वे काल्पनिक, दैवीय, और चमत्कारी घटनाओं का आविष्कार करते थे। लेकिन वर्तमान की कहानी पुरातन कहानी से एकदम भिन्न है। क्योंकि आज का कहानीकार कहानी की घटना को मानव के यथार्थ जीवन से जोड़ता कहानी लिखते समय कहानीकार यह ध्यान रखता है कि जिस कहानी की वह रचना कर रहा है वह अस्वाभाविक न लगे। जिस चरित्र को वह प्रस्तुत कर रहा है, वह समाज के अन्दर क्रियाशील मानव की भाँति प्रतीत हो। वह उसके द्वारा ऐसे कार्य नहीं करा सकता जो मुनष्य के लिए असम्भव हो। पुरातन कहानियों के चरित्र ऐसे होते हैं जो असम्भव कार्य को कर देते है। लेकिन वर्तमान की कहानियों के पात्र अपने समय और परिस्थितियों के अनुकूल क्रियाशील होते हैं। आज समाज में अ परिवर्तन हो रहे हैं जिसका प्रभाव साहित्य पर भी पड़ रहा है, इसीलिए इसी साहित्य के गद्य रूप कहानी में भी काफी बदलाव आ रहे हैं। वर्तमान की हिन्दी कहानी का उद्भव 18 वीं सदी से लेकर 19 वीं शदी के मध्य में हुआ। कुछ विद्वान हिन्दी कहानी के प्रारम्भ के अन्तसूत्र भारत की प्राचीन कथा परम्परा से जोड़ते है तो कुछ कहानी विधा को पाश्चात्य साहित्य की देन मानते हैं। कुछ साहित्यधर्मी हिन्दी कहानी का उद्भव स्रोत्र गुणाढ्य की वृहद कथा, कथा सरित सागर, पंचतंत्र कथाएँ, हिंतोपदेश जातक कथाओं से जोड़ते हैं तो कुछ विद्वान स्वामी गोकुल नाथ की चौरासी वैष्णवन की वार्ता को हिन्दी का प्रथम कहानी संग्रह मानते हैं, लेकिन ये कहानियाँ नही जीवनियाँ मात्र हैं।

 

हिन्दी कहानी का विकास 

जैसा कि विद्वान स्वीकारते हैं कि खड़ी बोली हिन्दी में कहानी का आरम्भ उस समय हुआ जब अंग्रेजों के प्रभाव से गद्य लिखा गया। अंग्रेजों ने हिन्दी गद्य के विकास के लिय जिन लेखकों को तैयार किया उनकी आरम्भिक रचनाएँ एक तरह की कहानियाँ हैं। इन गद्य लेखकों में इंशा अल्ला खाँ एक ऐसे गद्यकार थे जिन्होंने रानी केतकी कहानी" जैस कहानी का सृजन किया लेकिन वर्तमान के समालोचक इसे आधुनिक हिन्दी कहानी के स्वरूप और कथ्य से भिन्न मानते हैं। वर्तमान में कहानी के लिए जिन तत्वों को निर्धारित किया गया है, रानी केतकी की कहानी में वे सभी तत्व नहीं मिलते। वर्तमान की कहानी लेखन की प्रेरणा में अंग्रेजी और बंगला में रची गई और हिन्दी में अनुदित कहानियों से मिली, क्योंकि 19 वीं शताब्दी में अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच आदि भाषाओं में कहानी का अच्छा विकास हो चुका था।

 

'नासिकेतोपाख्यान' तथा 'रानी केतकी' की कहानी को हिन्दी की प्रथम कहानी न मानने के पीछे उसमें कहानी तत्वों का अभाव है। इसके पश्चात् भारतेन्दु की एक अद्भुत अपूर्व स्वप्न' तथा राधाचरण गोस्वामी की 'यमलोक की यात्रा' प्रकाश में आयी लेकिन विद्वानों ने इनमें भी कहानी कला के तत्वों के अभाव के दर्शन किये। वैसे हिन्दी कहानी का प्रारम्भ सन् 1900 में प्रकाशित होने वाली उस 'सरस्वती' पत्रिका से हुआ जिससे पंडित किशोरी लाल गोस्वामी को इन्दुमती’ (19000) को प्रकाशन हुआ था। हिन्दी कहानी के इस विकास पर हरी दृष्टि डालने के लिए हमें हिन्दी कहानी के महान कहानी कार प्रेमचन्द को केन्द्र में रखकर चर्चा करनी होगी।

 

हिन्दी कहानी के विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उपन्यास सम्राट मुशी प्रेमचन्द ने निभायी। इस युग पुरूष ने अपनी कहानियों को विविध शैलियों के माध्यम से साहित्य संसार को सौंपा, इसलिए कहानी साहित्य संसार शिरोमणियों ने हिन्दी कहानी परम्परा में प्रेमचन्द का स्थान केन्द्रीय महत्व का स्वीकारा। मुशी प्रेमचन्द ने अपने जीवन काल में तीन सौ कहानियाँ लिखी, इन्होंने हिन्दी कहानी को वह श्रेष्ठता प्रदान की जिससे प्रेरणा प्राप्त कर हिन्दी के अन्य कहानिकारों ने हिन्दी कहानी कोष की श्रीवृद्धि की, इसलिए हिन्दी कहानी के विकास के केन्द्र में मुंशी प्रेमचन्द को रखकर हम तीन चरणों में बाँटते हैं -

 

1. प्रेमचन्द से पूर्व की कहानी - सन् 1901 से 19140 

2. प्रेमचन्द युग की कहानी (सन् 1914 से सन् 19360) 

3. प्रेमचन्दोत्तर युग की कहानी (सन् 1936 से वर्तमान तक) प्रवृत्तियों की दृष्टि से इन चरणों को

 

कई धाराओं में विभाजित किया जाता है जिनका विवेचन हम यहाँ निम्न प्रकार से करते हैं। 


1 प्रेमचन्द युग से पूर्व की कहानी (सन् 1901 से सन् 19140) :-

 

जैसा कि विद्वान प्रेमचन्द पूर्व युग कहानी का समय सन् 1901 सन् 1914 तक मानते हैं। हिन्दी की प्रथम कहानी कौन है ? इस विषय में काफी विवाद है। हिन्दी गद्य की प्रारम्भिक अवधि में मुंशी इंशा अल्ला खाँ ने 'उदय भान चरित्र' या रानी केतकी की कहानी की रचना की समय की दृष्टि से यह सबसे पुरानी कहलाती हैं परन्तु आधुनिक कहानी कला की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण रचना नही है।

 

आचार्य हजारी प्रसार द्विवेदी का विचार है कि- "यह मुस्लिम (फारसी) प्रभाव की अन्तिम कहानी है यद्यपि इसकी भाषा और शैली में आधुनिक कहानी कला का आभास मिल जाता है।" राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द की कहानी 'राजाभोज का सपना' भी ऐसी ही कहानी है, इसमें भी थोड़ा बहुत आधुनिकता का स्पर्श मिलता है। इन कहानियों के अतिरिक्त किशोरी लाल गोस्वामी की इन्दुमती, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की ' ग्यारह वर्ष का समय' बग महिला की 'दुलाई वाली' आदि कहानियाँ इसी कोटि की कहानियाँ हैं। इन कहानियों को हम प्रयोगशील कहानियाँ कह सकते हैं। जिनमें कहानी लेखकों ने विदेशी और बंगला कहानियों के प्रभाव में आकर हिन्दी भाषा में भी कहानी लिखने का भी प्रयास किया। कहानी कला को केन्द्र में रखकर वर्तमान के समालोचक अब माधव राव सप्रे की कहानी एक टोकरी भर मिट्टी' को हिन्दी की प्रथम कहानी मानते हैं जिसका प्रकाशन सन् 1903 में हुआ था। 

प्रेमचन्द युग से पूर्व की कहानियों की विशेषताऐं- 

1. प्रेमचन्द पूर्व युग की आरम्भिक कहानियाँ पुराने स्वरूप की थी। जिनका कथानक अलौकिक चमत्कारों से युक्त होता था।

 

2. प्रेमचन्द पूर्व युग की आरम्भिक कहानियाँ प्रायः आदर्श-वादी होती थी जिनमें भावुकता के साथ किसी भारतीय आदर्श की कथा कही जाती थी।

 

3. प्रेमचन्द युग की कहानियाँ धीरे-धीरे यथार्थ की और उन्मुख हुई, लेकिन इस यथार्थ का रूप ऐसा नहीं था जैसा कि प्रेमचन्द की कहानियों में मिलता है।

 

4. भाषा की दृष्टि से इस युग की कहानियों की भाषा उतनी प्रौढ़ और परिमार्जित भाषा नहीं है जितनी प्रेमचन्द की कहानियों में है।

 

5. इस युग के कहानीकार प्रयोगधर्मी कहानी कार अधिक थे, इसलिए उस युग की कहानी प्रयोगधर्मी कहानियाँ अधिक है।

 

2 प्रेमचन्द युग की कहानी (सन् 1915 से 1936 तक) :- 

हिन्दी कहानी का प्रेमचन्द युग का आरम्भ सन् 19150 से माना जाता है। मुशी प्रेमचन्द जिस अवधि में कहानियाँ लिख रहे थे उसी अवधि में कई कहानीकारों ने इस विधा को आगे बढ़ाने के लिए अपनी लेखनियाँ उठायी। जिनमें जयशंकर प्रसाद, चन्द्रधर गुलेरी, सेन शास्त्री, सुदर्शन आदि मुख्य कहानीकार हैं। इसी युग में जिन अन्य कहानीकारों ने हिन्दी कहानी विधा को नई दिशा प्रदान की उनमें श्री विश्वम्भर नाथ शर्मा, 'कौशिक', आचार्य चतुर राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह, श्री शिव पूजन सहाय, श्री वृन्दावन लाल वर्मा, श्री गोपाल राम गहमरी, श्री रायकृष्ण दास, पदुम लाल पुन्नालाल वख्शी, रमाप्रसाद घिल्डियाल पहाड़ी पंडित ज्वालाप्रसाद शर्मा, श्री गंगाप्रसाद श्रीवास्तव आदि का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। अनके पत्र-पत्रिकाओं में इन कहानीकारों की कहानियाँ प्रकाशित हुई, जिससे हिन्दी कहानी के लेखक ही नहीं पाठकों की संख्या में भी वृद्धि हुई, इस युग के जिन मुख्य कहानीकारों की साहित्य सेवा का आंकलन करने के लिए साहित्य के इतिहासकारों ने इन्हें विशेष रूप से सम्मान दिया वे इस प्रकार हैं-


प्रेमचन्द युगीन कहानीकार

पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी - 

हिन्दी के श्रेष्ठ कहानीकारों में प्रेमचन्द युगीन कहानीकार पंडि चन्द्रधर शर्मा गुलेरी को का नाम भी बड़े समादर से लिया जाता है। यदि आधुनिक कहानी कला दृष्टि से किसी कहानी को हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ कहानी कहा जाय तो वह है- उसने कहा था: यह कहानी यथार्थवादी कहानी है जो एक आदर्श को प्रस्तुत करती है। गुलेरी जी ने इसके अतिरिक्त सुखमय जीवन और बुद्ध का कांटा दो कहानियाँ और लिखी ।

 

जयशंकर प्रसाद 

प्रेमचन्द में ही जयशंकर प्रसाद ने हिन्दी में कई कहानियाँ लिखी लेकिन इनकी कहानियाँ प्रेमचन्द की कहानी शैली से बिल्कुल भिन्न कहानियाँ हैं। एक राष्ट्रवादी साहित्यकार होने के कारण इनकी कहानियों में राष्ट्रीय भावना और सांस्कृतिक चेतना का प्रभाव परिलक्षित होता है। प्रसाद जी ने आधिकांश ऐतिहासिक कहानियाँ लिखी हैं, जिनकी भाषा संस्कृत निष्ठ, भाव प्रधान, अलंकारिक और काव्यात्मक है। यही नहीं इनकी कहानियों में नाट्य शैली के भी दर्शन होते हैं, इनकी कहानियों में आकाश दीप, पुरस्कार, ममता, इन्द्रजाल, छाया, आँधी, दासी जैसी कहानियाँ आदर्शवादी कहानियाँ हैं तो मधुवा, और गुंडा जैसी कहानियाँ यथार्थवादी कहानी |

 

मुंशी प्रेमचन्द - 

मुंशी प्रेमचन्द हिन्दी कहानी संसार के लिए वरदान बनकर आये, इनकी हिन्दी की पहली कहानी पंच परमेश्वर सन् 1915 में प्रकाशित हुई । 'पंच परमेश्वर' प्रेमचन्द जी की एक आदर्शवादी कहानी है जिसमें मनुष्य के अन्दर छिपे दैवत्व के गुणों को उजागार किया गया है। लेकिन इनकी बाद की कहानी यथार्थवादी कहानियाँ हैं जिनमें ग्रामीण और शहरी पददलितों के जीवन में घटने वाली घटनाओं को कहानियों के माध्यम से सार्वजनिक किया गया है। इस सम्बन्ध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं -

 

प्रेमचन्द, शताब्दियों से पददलित, अपमानित और उपेक्षित कृषकों की आवाज थे, पर्दे में कैद, पद-पद लांछित और असहाय नारी जाति की महिमा के जवरदस्त वकील थे। गरीबों और बेबसों के महत्व के प्रचारक थे। (हिन्दी साहित्य: उद्भव और विकास पृष्ठ- 266)

 

प्रेमचन्द ने अपने युग की सामाजिक बुरी दशा को अपने उपन्यास तथा कहानियों का विषय बनाया। अपने इस कथा साहित्य के माध्यम से प्रेमचन्द जी ने स्पष्ट किया था कि हमारे सामाजिक कष्टों के दो ही कारण हैं- एक धार्मिक अंधविश्वास और सामाजिक रूढ़ीवादिता और दूसरा आर्थिक शोषण और राजनीतिक पराधीनता, इनका सारा कथा साहित्य इसी पर केन्द्रीत है। इनकी आरम्भिक कहानियाँ आर्दशवादी कहानियाँ हैं लेकिन धीरे-धीरे इन्होंने यथार्थ से नाता जोड़ा। प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों के पात्र गरीब, बेबस और दबे-कुचले लोगों को बनाया। इन सबके अन्दर गुप्त मानवतावाद को एक नया प्रकाश दिया, प्रेमचन्द ने जहाँ अपनी कहानियों के माध्यम से समाज में व्याप्त रूढ़ीवाद और कुरीतियाँ के दमन के उपाय सुझाए वहाँ राजनैति पराधीनता और आर्थिक शोषण के प्रति विद्रोही आवाज उठायी। प्रेमचन्द की कहानियाँ इनके इसी भावों को प्रदर्शित करती है ।  

इनमें मुख्य हैं- 'कफन', पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी, दूध का दाम, ठाकुर का कुआँ, नशा, बड़े भाई साहब, सवा सेर गेहूँ, अलाग्योझा, नमक का दरोगा, पंचपरमेश्वर, ईदगाह, बूढ़ी काकी, ईदगाह आदि। इनमें से कुछ यथार्थवादी कहानियाँ हैं तो कहानियाँ। कुछ आदर्शवादी

 

भाषा की दृष्टि से मुंशी प्रेमचन्द की भाषा तत्कालीन समाज की बोल चाल की भाषा है। जिसे हम लोक भाषा का अनुपम उदाहरण कह सकते हैं। हिन्दी उर्दू शब्दों की यह मिश्रित भाषा वर्तमान में भी उतनी ग्राह्य और भाव बोधक है जितनी इनके लिखते समय में थी ।

 

विश्वम्भर नाथ शर्मा- 

प्रेमचन्द के समान ही विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक की कहानियाँ में आदर्श और यथार्थ का समन्वय दिखाई देता है। इनकी कहानियाँ भी घटना प्रधान और वर्णात्मक है। ताई, ‘रक्षावधन', 'माता का हृदय' कृतज्ञता आदि कहानियों में जहाँ मानवीय भावों की सक्ष्म व्यंजना हुई है। वहाँ आदर्श के नये रूप के दर्शन होते हैं। श्री काशिक ने अपने जीवनकाल में तीन सौ कहानियाँ लिखी हैं, 'मणिमाला', 'चित्रशाला', कल्लौल, कला-मन्दिर, इनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह है।

 

श्री सुदर्शन - 

प्रेमचन्द युगीन कहानिकारों में श्री सुदर्शन का नाम भी बड़े आदर से लिया जाता है। इन्होंने भी प्रेमचन्द की भाँति अनेक घटना प्रधान कहानियाँ लिखी, इनकी इन कहानियों के पात्र सामान्य कोटि के मजदूर, किसान आदि पात्र हैं जिनका सम्बन्ध ग्रामों और नगरों के सामान्य मध्यमवर्ती मोहल्लों से है। इनकी अनेक कहानियाँ मानवीय संवदनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति देती है। इनकी कई लोक प्रिय कहानियाँ हैं जिनमें 'हार की जीत', सलबम, आशीर्वाद, न्याय मंत्री, एथेन्स का सत्यार्थी, कवि का प्रार्याश्चित, आदि लोकप्रिय कहानियाँ हैं। इनके सभी कहानियाँ पनघट, सुदर्शन सुधा, तीर्थ यात्रा आदि कहानी-संग्रहों में संग्रहित है।

 

बाबू गलाब राय के शब्दों में- प्रेमचन्द, कौशिक और सुदर्शन, हिन्दी - कहानी साहित्य के प्रेमचन्द स्कूल के वृहद्व्रयी कहलाते हैं- (हिन्दी साहित्य का सुबोध इतिहास - बाबू गुलाब राय- पृष्ठ- 157)

 

प्रेमचन्द के कथा शिल्प और कथ्य को लेकर कहानी लिखने वालों में- वृन्दावनलाल शर्मा - ( शरणागत कटा-फटा झंडा, कलाकार का दण्ड जैनावदी वेगम, शेरशाह का न्याय, आदि) आचार्य चतुरसेन की दुखिया में कासे कहू सजनी, सफेद कौआ, सिंहगढ़ विजय, आदि। गोविन्द बल्लभ पंत सियाराम शरण गुप्त ( बैल की बिक्री) भगवती प्रसाद वाजपेयी, मिठाई वाला, निंदियालागी, खाल, वोतल, मैना, ट्रेन पर, हार जीत आदि ) रामवृक्ष बेनीपुरी, उषादेवी मित्रा आदि अनेक कहानीकारों की रचनाएं बहुत प्रसिद्ध हुई । 


प्रेमचन्द युगीन कहानियों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- 

ये परिमार्जित भाखा वाली कहानियाँ हैं। 

ये आदर्श और यथार्थ वादी कहानियाँ हैं। 

ये मानवीय सम्बन्धों का उद्घाटन करने वाली कहानियाँ हैं। 

ये ग्राम्यजीवन पर प्रकाश डालने वाली कहानियाँ हैं। 

ये राष्ट्रवादी और देश प्रेम से ओतप्रोत कहानियाँ हैं। 

ये राजनैतिक पराधीनता और आर्थिक शोषण में विरूद्ध आवाज उठाने वाली कहानियाँ हैं। 

ये समाज में व्याप्त रूढ़ीवादी, कुरीतियों और अशिक्षा को दर्शाने वाली कहानियाँ हैं।

 

3 प्रेमचन्दोत्तर युग की कहानी :- 

प्रेमचन्द के पश्चात् हिन्दी कहानी का विकास और तीव्रता से हुआ। प्रेमचन्द और जयशंकर प्रसाद के पश्चात् नये युग में हिन्दी कहानी की दो प्रमुख शाखाएँ उभरकर आयी। इनमें एक शाखा का सम्बन्ध प्रेमचन्द के यथार्थवादी परम्परा से था, ओर दूसरी शाखा का सम्बन्ध 'जयशंकर प्रसाद की भाववादी मनोवैज्ञानिक परम्परा से। इसलिए इन्हें इतिहासकारों ने प्रगतिवादी और मनोवैज्ञानिक कहानियों का नाम दिया। 

प्रगतिवादी कहानी 

हिन्दी की प्रगतिवादी कहानी को यथार्थवादी और समाजिक कहानी भी कहा जाता है। सन् 1936 में जब प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई इसके पश्चात् अनेक कहानी लेखक इससे जुड़े जिन्होंने अनेक यथार्थवादी कहानियाँ लिखी । साहित्य समीक्षकों ने इन्हीं कहानियों को प्रगतिशील कहानियों का नाम दिया, इन कहानिकारों में यशपाल, उपेन्द्रनाथ अश्क, रामप्रसाद थिल्डियाल पहाडी, पाण्डेय वेचन शर्मा उग्र, विष्णु प्रभाकर, अमृतलाल नागर, आदि कहानीकार मुख्य हैं। इन सभी कहानीकारों ने प्रेमचन्द की तरह ही धार्मिक अंधविश्वासों, सामाजिक कुरीतियों, आर्थिक शोषण तथा राजनैतिक पराधीनता ने निर्धन वर्ग को अपनी कहानियों का विषय बनाया। इन कहानीकारों ने निर्धन वर्ग को अपनी कहानियों के केन्द्र में रखा, इनकी कहानियाँ कहानी तत्वों की कसौटी पर खरी उतरती है। इन कहानियों के शीर्षक, कथानक, कथोपकथन, चरित्र चित्रण, पात्र, उद्देश्य, देशकाल - वातावरण तथा भाषा-शैली जैसे तत्व इनकी कहानियों में प्रमुखता से उभरे हैं. ये जब कभी पात्रों का चरित्र चित्रण करते हैं तो इनकी दृष्टि व्यक्ति के अन्तर्मन के बजाय उसके सामाजिक व्यवहार पर अधिक स्थिर होती है। 


प्रमुख प्रगतिवादी कहानीकार और उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं- 

यशपाल - 

इस अवधि में मार्क्सवादी यशपाल हिन्दी कहानी के क्षेत्र में उतरे। इन्होंने सामाजिक जीवन के यथार्थ को लेकर उसकी मार्क्सवादी व्याख्या की। यशपाल की रचनाओं पर फ्रायड के मनोविश्लेषणवाद का प्रभाव दृष्टिगत होता है। इनकी कहानियों में मध्यम वर्गीय जीवन की विसंगतियों का मार्मिक चित्रण मिलता है। साथ ही निम्नवर्गीय शोषितों की व्यथा, अभाव और जीवन संघर्ष के भी दर्शन होते हैं। इनकी प्रसिद्ध कहानियाँ हैं। महाराजा का इलाज, परदा, उत्तराधिकारी, आदमी का बच्चा, परलोक, कर्मफल, पतिव्रता, प्रतिष्ठा का बोझ ज्ञानदान, धर्मरक्षा, काला आदमी, चार आना, फूलों का कुरता आदि । पिजड़े की उड़ान, फूलों का कुर्ता, धर्मयुद्ध, सच बोलने की भूल, आदि आपके कहानी संग्रह हैं।

 

उपेन्द्र नाथ अश्क - 

उपेन्द्रनाथ 'अश्क' मानवतावादी दृष्टिकोण और मनोविश्लेषण चरित्र - युक्त कहानी लिखने वाले कहानीकार हैं। समाज की विषमताओं, मध्यमवर्गीय जीवन की विसंगतियों, निम्न वर्गीय अभावग्रस्त जीवन- संकटों का मार्मिक अंकन वाली इनकी कहानियाँ कथा - शिल्प की दृष्टि से सफल कहानियाँ हैं। इनकी प्रसिद्ध कहानियों में डाची, आकाश चारी, नासूर, अंकुर, खाली डिब्बा, एक उदासीन शाम आदि कहानियाँ प्रसिद्ध कहनियाँ हैं। इन्होंने अपने जीवनकाल में दो सौ से अधिक कहानियाँ लिखी । बैगन का पौधा, झेलम के सात पुल छीटे आदि कहानी - संग्रह इनके इन्हीं कहानियों के प्रसिद्ध संग्रह है।

 

रमाप्रसाद घिल्डियाल पहाड़ी - 

रामप्रसाद घिल्डियाल पहाड़ी ने मनोवैज्ञानिक कहानियों के साथ-साथ प्रगतिवादी कहानियाँ लिखी, इनकी कहानियों में कहीं-कहीं उन्मुक्त प्रेम की छटा भी दर्शन होते हैं। 'राजरानी' हिरन की आँखें, तमाशा, मोर्चा आदि इनकी लोकप्रिय कहानियाँ हैं।

 

पाण्डेय वेचन शर्मा 'उग्र'- 

पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' ने इस काल में प्रेमचन्द और जयशंकर प्रसाद से भिन्न एक अलग रास्ता बनाया, उस समय की राजनीति और समाज की विकृतियों को अपनी रचनाओं का विषय बनाने वाले उग्र जी ने अंग्रजी संघर्ष के विरूद्ध चल रहे क्रान्तिकारी संघर्ष को लेकर कई कहानियाँ लिखी। 'उसकी माँ', 'देशभक्त' जैसी कहानी इनकी इसी कोटि की कहानियाँ हैं। 'दोजख की आग', इन्द्रधनुष आदि आपके कहानी-संग्रह हैं।

 

बिष्णु प्रभाकर

बिष्णु प्रभाकर एक सुधारवादी लेखक हैं। इन्होंने वर्तमान समय की समाजिक व्यवस्था तथा व्यक्ति एवं परिवार के सम्बन्धों को लेकर कहानियों की रचना की। इस कहानीकार ने वर्तमान सामाजिक एवं शासन व्यवस्था में व्यक्ति- जीवन के संकट को बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है, इनकी "धरती अब भी घूम रही हैलोकप्रिय कहानी है, रहमान का बेटा, ठेका, जज का फैसला' गृहस्थी मेरा बेटा, अभाव आदि कहानियाँ बिष्णु प्रभाकर की उत् कोटि की कहानियाँ हैं।

 

अमृतलाल नागर 

अमृतलाल नागर ने आज के जीवन के आर्थिक संकट, विपन्नता, - पारिवारिक सम्बन्धों का तनाव आदि विषयों को अपनी कहानियों की सामग्री बनाया। दो आस्थाएँ, गरीब की हाय, निर्धन कयामत का दिन, गोरख धन्धा आदि कहानियाँ इनकी महत्वपूर्ण कहानियाँ हैं।

 

मनोवैज्ञानिक कहानियाँ - 

मुंशी प्रेमचन्द पश्चात् हिन्दी कहानी संसार में कुछ ऐसे कहानिकार भी आये जिन्होंने मानवमन को केन्द्र में रखा। इन कहानीकारों ने सामाजिक समस्याओं की अपेक्षा आदमी की वैयक्तिक पीड़ाओं और मानसिक अन्तर्द्वन्द्व को अधिक महत्व दिया। इन्होंने मानव के अवचेतन मन की क्रियाओं और उनकी मानसिक ग्रन्थियों को अपनी कहानियों का विषय बनाया मानव के अन्तर्द्वन्द्व को केन्द्र में रखने के कारण इन कहानीकारों की कहानियों में मनोवैज्ञानिक सत्य और चरित्र की वैयक्तिक विशिष्टता विशेष रूप से व्यक्त हुई है। इन कहानिकारों में, जैनेन्द्र, इलाचन्द्र जोशी, अज्ञेय, भगवती चरण वर्मा, चन्द्र गुप्त विद्यालंकारआदि कहानीकार मुख्य हैं।

 

प्रमुख मनोवैज्ञानिक कहानियाँ एवं कहानीकार 

जैनेन्द्र कुमार - 

प्रेमचन्द और जयशंकर प्रसाद के यथार्थ और आदर्श की दिशा से बिल्कुल हटकर मानव मन के चितेरे के रूप में जिन अन्य कहानीकारों ने हिन्दी कहानी संसार में प्रवेश किया उनमें जैनेन्द्रकुमार का प्रमुख स्थान है। इनका ध्यान समाज के विस्तार की अपेक्षा व्यक्ति की मानसिक गुत्थियों, सामाजिक परिवेश, के दबाब और प्रतिबद्धता के कारण होने वाली वैयक्तिक समस्याओं की ओर अधिक गया। परिवार एवं समाज में नारी-पुरूषों के सम्बन्धों तथा उनसे उत्पन्न उलझनों का विश्लेषण करने वाले इनकी कहानी जहाँ लोक प्रिय और सर्वग्राह्य हुई हैं वहाँ इन कहानियों ने समाज के चिन्तकों को जीवन के अनके पहलुओं पर चिन्तन करने के लिए भी बाध्य किया हैं इनकी प्रसिद्ध कहानियाँ हैं- पत्नी, खेल, चोर, पाजेब, जाह्नवी, समाप्ति, एक रात, नीलम देश की राजकन्या, जय संधि, मास्टर जी आदि, जैनेन्द्र कुमार के आठ कहानी संग्रहों में इनकी सभी कहानियाँ संग्रहित हैं।

 

अज्ञेय -

'अज्ञेय' एक ऐसे कहानीकार हैं जिन्होंने मानव के मानसिक अन्तर्द्वन्द्वों और गूढ़ रहस्यों को परखने का यत्न किया। इसलिए इनकी कहानियों में एक विशेष प्रकार की 'चिन्तन शीलता तथा तटस्थ बैदिकता के दर्शन होते हैं। विषय की दृष्टि से जैसी विविधता अज्ञेय जी की कहानियों मिलती है वह विविधता इस युग के अन्य कहानिकारों की कहानियों में कम मिलती हैं। इनकी प्रसिद्ध कहानियों में रोज, गैग्रीन, कोठरी की बात छोड़ा हुआ रास्ता, पगोड़ा वृक्ष, पुरूष भाग्य' आदि कहानियाँ हैं। इन कहानियों के अतिरिक्त अज्ञेय जी ने स्वतन्त्रता आन्दोलन सम्बन्धी घटनाओं तथा पौराणिक और ऐतिहासिक सन्दर्भों पर भी कहानियाँ लिखी हैं। विपथगा, शरणार्थी, परम्परा, अमर वल्लरी, कोठरी की बात आदि आपके कहानी संग्रह है।

 

इलाचन्द्र जोशी - 

इलाचन्द्र जोशी फ्राइड के मनोविश्लेषण सिद्धान्त को साथ लेकर चलने वाले लेखक हैं। इनकी कहानियों में मध्यमवर्गीय समाज के व्यक्तियों का विश्लेषण मिलता है। इनकी प्रमुख कहानियाँ हैं - चरणों की दासी, रोगी, परित्यक्ता, जारज, अनाश्रित, होली, धन का - अभिशाप, प्रतिव्रता या पिशाची, एकाकी, मैं, मेरी डायरी के दो नीरस पृष्ठ आदि ।

 

स्वातंत्योत्तर हिन्दी कहानी - 

स्वतन्त्रता के पश्चात् हिन्दी कहानी के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन आये। स्वतंत्रता पश्चात् लिखी गई हिन्दी कहानी में आधुनिक जीवन की विविध समस्याओं का यथार्थ चित्रण हुआ। इन समस्याओं में निम्नवर्गीय व्यक्ति के द्वारा अपने विकास के लिए किये जाने वा यत्नों से पैदा हुए अवरोध और संकटों से लेकर उच्चवर्गीय व्यक्तियों के जीवन में उपस्थित विसंगति, कुण्ठा आदि की बातें शामिल है। नगरीय जीवन में व्यक्ति का अकेलापन, नौकरीपेशा नारी के अनके पक्षीय सम्बन्ध और उससे उत्पन्न होने वाली कठिनाइयाँ, शिक्षितों की बेरोजगारी की समस्या, राजनैतिक गिरावट, परिवारों के टूटने आदि कई विषयों पर कहानियाँ लिखी गई है। शिल्प की दृष्टि से इन कहानियों में कई प्रयोग किये गए हैं। इस समय के कहानीकारों में, मोहन राकेश राजेन्द्र यादव, निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, मार्कण्डेय, अमर कान्त मन्नू भण्डारी, फणीश्वर नाथ रेणु, कमल जोशी, उषा प्रियंवदा शिवप्रसाद सिंह, रघुवीर सहाय, रामकुमार भ्रमर, विजय चौहान, धर्मवीर भारती, भीष्म साहनी, लक्ष्मी नारायण लाल, हिमांशु जोशी, हरिशंकर परसाई, महीपसिंह, श्रीकान्त वर्मा, कृष्ण वलेदव वैद, ज्ञानरंजन, सुरेश सिन्हा, गिरिराज किशोर, भीमसेन त्यागी, धर्मेन्द्र गुप्त, इब्राहिम शरीफ, विश्वेश्वर, महेन्द्र भल्ला, रवीन्द्र कालिया, काशीनाथ सिंह, प्रबोध कुमार, प्रयाग शुक्ल गोविन्द्र मिश्र विजय मोहन सिंह आदि है। ( हिन्दी साहित्य का सुबोध इतिहास - बाबू गुलाब राय- पृष्ठ- 165 )

 

नयी कहानी - 

नयी कहानी सन् 1950 और सन् 1953 के पश्चात् अस्तित्व में आयी । वास्तव में 'नयी कहानी' लेखक साहित्य के क्षेत्र में एक आन्दोलन था। इस आन्दोलन से हिन्दी जगत में काफी तर्क वितर्क सामने आये, जिसके फलस्वरूप 'नयी कहानी' अपने स्वरूप, कथ्य ओर उद्धेश्य की दृष्टि से पूर्ववर्ती कहानियों से विशिष्ट है। 'स्वतन्त्रता के पश्चात् भारतीय जन जीवन में अनेक परिवर्तन आये जिसका यथार्थ प्रतिबिम्ब 'नई कहानी' में देखने को मिलता हैं। कमलेश्वर की राजा निरबंसिया', 'मुर्दों की दुनिया', तीन दिन पहले की बात, चार घर, मोहन राकेश की - 'मलबे का मालिक', राजेन्द्र यादय की 'जहाँ लक्ष्मी कैद हैं,' अमरकान्त की 'डिप्टी कलक्टरी' आदि कहानियों में समकालीन यर्थाथ बखूबी व्यक्त हुआ है।

 

पुराने विश्वासों और मूल्यों को त्यागना तथा नवीन मूल्यों की खोज करना आधुनिकता है। आधुनिकता का यह लक्षण हमारे दैनिक जीवन की क्रियाओं से लकर चिन्तन मनन को भी प्रभावित कर रहा है। यह आधुनिकता मात्र नगरों और कस्बों तक ही सीमित नहीं है अपितु इस धीरे-धीरे ग्रामों को भी अपने आँचल में समेट लिया है। आज का कहानी कार भी जिससे वंचित नहीं है। इसलिए उसकी कहानी भी आधुनिकता की पक्षधर हो गई है। शिल्प की दृष्टि से नयी कहानी' की अपनी विशिष्टता है। कहानी की भाषा, पात्र, घटना आदि में दिन प्रति दिन नये परिवर्तन आ रहे हैं। इस कहानी में नये प्रकार के बिम्ब विधान, नयी भाषा शैली, नये उपमान और नये मुहावरे आदि में विशेषता परिलक्षित होती है। भाषा में अलंकारिता का अभाव तथ बोल चाल की परिपूर्णता होती है। वर्तमान में कहानी दो वातावरणों को केन्द्र में रखकर लिखी जा रही है। प्रथम ग्रामीण वातावरण और द्वितीय नगरीय परिवेश । ग्रामीण वातावरण को केन्द्र में रखकर लिखी गई कहानी आंचलिक कहानी कहलाती है। फणीश्वरनाथ 'रेणु' की 'तीसरी कसम” ‘ठुमरी, ‘लाल पान की बेगम, 'रसप्रिया' शैलेश मटियानी की 'प्रेतमुक्ति' माता' 'भस्मासुर', दो मुखों का एक सूर्य, शिवप्रसाद सिंह की 'नीच जात' धरा, मुरदा सराय, अँधेरा हँस्ता है, मार्कण्डेय की 'हंसा जाई अकेला' 'भूदान', शेखर जोशी की 'तर्पण', राजेन्द्र अवस्थी की अमरबेल’, लक्ष्मीनारायण लाल की माघ मेले का ठाकुर', रामदरश मिश्र की एक आँख एक जिन्दगी' आदि कहानियाँ आंचलिक कहानियाँ हैं।

 

नगरीय परिवेश को केन्द्र में रखकर लिखी गई कहानियों में नगरो की कृत्रिम जीवन प्रणाली, परिवार और समाज के अन्दर व्यक्तियों के नयी पद्धति के अन्तः सम्बन्ध, स्त्री-पुरूष सम्बन्धों में तनाव, व्यक्ति का अकेलापन, जीवन मूल्यों का विघटन इत्यादि का वर्णन विस्तार से हुआ है। निर्मल वर्मा के पराये शहर में' 'अन्तर' 'परिन्दे', 'लवर्स', 'लन्दन की रात', मोहन राकेश की 'वासना की छाया', 'काला रोजगार', मिस्टर भाटिया 'मलवे का मालिक', राजेन्द्र यादव की 'जहाँ लक्ष्मी कैद है', एक कमजोर लड़की का कहानी', 'टूटना', कृष्ण बलदेव वैद की 'अजनबी', 'बीच का दरवाजा,' 'भगवान के नाम सिफारिश की चिट्टी', 'मन्नू भण्डारी की वापसी', 'मछलियाँ', 'गीत का चुम्बन, भीष्म साहनी की 'चीफ की दावत', 'खून का रिश्ता', रघुवीर सहाय की प्रेमिका', 'मेरे और नंगी औरत के बीच', 'सेब', रमेश बक्षी की आया गीता गा रही थी’, 'अलग-अलग कोण', 'राजकुमार की लौ पर रही हथेली', 'सेलर', श्रीकान्त वर्मा की शव यात्रा', 'दूसरे के पैर', महीपसिंह की 'काला बाय, गोरा बाय', आदि कहानियाँ नगरीय परिवेश की कहानियाँ हैं।

 

छोटे-छोटे कस्बों के व्यक्तियों की मनोवृत्ति और उपेक्षित जन जीवन का चित्रण करने वाली कहानियोंमें कमलेश्वर की 'मुरदों की दुनिया', 'तीन दिन पहले की बात', 'चार घर', धर्मवीर भारती की सार्वत्री न0 दो', 'धुआँ', 'कुलटा', गुलकी बन्नों, 'अगला अवतार', "कृष्णा सोवती की', यारों के यार, अमरकान्त की 'जिन्दगी और जोंक' 'डिप्टी कलेक्टरी' 'दोपहर का भोजन' विष्णु प्रभाकर की 'धरती अब धम रही है', मनहर चौहान की 'घर धुसरा', रामकुमार भ्रमर की गिरस्तिन', हिमांशु जोशी की 'एक बूंद पानी' अभाव, हृदयेश की सभाएँ' ‘डेकोरेशन पीस’” कहानियाँ काफी लोकप्रिय हुई।

 

ग्रामीण अंचल, नगरीय परिवेश और कस्बों के जन जीवन पर लिखी कहानियों के अतिरिक्त वर्तमान समाज की विकृतियों, व्यक्तियों के ढोंग, आरोपित प्रतिष्ठा, भ्रष्टाचार आदि पर व्यंग्य तथा उपहार करती हुई अनेक, कहानियाँ लिखी गई, इन कहानियों में हरिशंकर परसाई की निठल्ले की डायरी, 'सड़क बन हरी है', 'पोस्टर एकता', शरद जोशी की 'रोटी और घण्टी का 'सम्बन्ध', "बेकरी बोध' 'प्रमुख है।

 

वर्तमान में इन कहानियों की संख्या में वृद्धि करने वाले अन्य कहानीकारों में, गंगा प्रसाद विमल, दूधनाथ सिंह, राजकमल चौधरी, गिरिराज किशोर, सुरेश सिंन्हा ज्ञानरंजन, धर्मेन्द्र गुप्त, इब्राहिम शरीफ, विश्वेश्वर, भीमसेन त्यागी, अमर कान्त, रतीलाल शाहनी, कुष्ण बलदेव वैद, विपिन अग्रवाल आदि है।

 

कहानी की इस जीवन यात्रा में साठ के बाद की कहानी में अनके आन्दोलन चलाये गए, जिनमें सामन्तर कहानी', 'सचेतन कहानी', ‘अकहानी आदि साहित्य आन्दोलन मुख्य हैं। इन आन्दोलनों पर फ्रान्स - जर्मनी में प्रचलित आन्दोलनों का प्रभाव था। इन आन्दोलनों से कमलेश्वर, गंगाप्रसाद विमल, महीपसिंह, रवीन्द्र कालिया, ज्ञानरंजन आदि कथाकार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे। हिन्दी कहानी के विकास में मात्र इन आन्दोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही अपितु 'कहानी', नई कहानियाँ ' कल्पना', सारिका' संचेतना, कहानियाँ आदि कहानी पत्रिकाओं ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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