केन्द्रीय प्रवृत्ति तथा विचलनशीलता की मापें |Masures of Central Tendency in Hindi

Admin
0

केन्द्रीय प्रवृत्ति तथा विचलनशीलता की मापें

केन्द्रीय प्रवृत्ति तथा विचलनशीलता की मापें |Masures of Central Tendency in Hindi
 

केन्द्रीय प्रवृत्ति तथा विचलनशीलता की मापें प्रस्तावना

 

सांख्यिकी व्यवहारिक विज्ञानों के एक साधन के रूप में समस्या समाधान हेतु सहायक होती है। सांख्यिकी, व्यवहारिक गणित से लेकर शोध अध्ययनों तक किसी भी कार्य को नहीं छोड़ती, सबका साथ देती है। यह अन्तिम निर्णय बिन्दु तक पहुँचने में सहायक होती है। यह समस्या हल करने में साधन एवं उपकरण के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। वैसे सांख्यिकी के महत्वपूर्ण कार्य है- आंकड़ों का संकलन, आंकड़ो का वर्गीकरण, आंकड़ो का सारणीयन, आंकड़ों का व्यवस्थापन, आंकड़ो का विश्लेषण, आंकड़ो का निर्वचन, आंकड़ों का सामान्यीकरण, चयन, पूर्वकथन आदि। इस इकाई में हम लोग केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों के साथ-साथ विचलनशीलता की मापों आदि को भी समझने का प्रयास करेंगे।

 

केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापें (Masures of Central Tendency)

 

केन्द्रीय प्रवृत्ति का अर्थ उस मान से है जो प्राप्त ऑकड़ों का प्रतिनिधित्व करता है अर्थात यह मान जो प्राप्त आँकड़ों में सबसे अधिक केन्द्र में आया हो। सामान्यतः यह एक ऐसा मान होता है जो आंकड़ों के केन्द्र में स्थित होता है तथा सभी मान इस मान की ओर ही प्रवृत्त होते हैं. इसलिये इन्हें केन्द्रीय प्रवृत्ति का मान कहते हैं। इन मापों के कई प्रकार होते हैं। परन्तु शैक्षिक क्षेत्र में निम्न तीन मानों का प्रयोग किया जाता है -

 

(i) मध्यमान (Mean ) 

(ii) मध्यांक (Median) 

(iii) बहुलांक (Mode)

 

(i) मध्यमान या माध्य (Mean) -


समस्त अंकों के योग में उन अंकों की संख्या का भाग देने पर जो भागफल प्राप्त होता है, उसे मध्यमान कहा जाता है। उदाहरण के लिए 5 और 7 का मध्यमान 5+7 / 2 अर्थात 6 है। मध्यमान के संकेत को 'M' से प्रदर्शित करते हैं। इसकी निम्न विशेषतायें होती हैं मध्यमान की विशेषतायें :- -

 

(1) वितरण का प्रत्येक अंक मध्यमान की स्थिति को प्रभावित करता है अर्थात वितरण के प्राप्तांकों में से किसी प्राप्तांक के घटने-बढ़ने से उस वितरण का मध्यमान घट-बढ़ जाता है। 

(2)  मध्यमान दिये हुये वितरण का सन्तुलन बिन्दु या केन्द्र - बिन्दु होता है। 

(3) दिये हुए वितरण के छोरों पर स्थिति प्राप्तांक मध्यमान के मान को सर्वाधिक प्रभावित करते है। 

(4) दिये गये वितरण के सभी प्राप्तांकों को एक निश्चित राशि से गुणा करने पर मध्यमान का मान भी निश्चित राशि के गुणनफल के बराबर हो जाता है।

 

मध्यमान का प्रयोग कब करें

 

1.जब सबसे अधिक विश्वसनीय केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान का पता लगाना हो । 

2.शुद्ध केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप की गणना हेतु भी मध्यमान की गणना की जाती है। 

3. दिये गए वितरण के प्रत्येक अंक को महत्व देने के लिए भी मध्यमान की गणना की जाती है। 

4. अनेक सांख्यिकी गणनाओं जैसे प्रमाणिक विचलन, मध्यमान विचलन, सह सम्बन्ध आदि की गणना में भी मध्यमान का प्रयोग होता है। 

5. तुलनात्मक अध्ययन करते समय भी मध्यमान की गणना की जाती है। 

6. जब प्राप्तांको का वितरण सामान्य होता है तब भी मध्यमान की गणना की जाती है।

 

मध्यमान के लाभ (Advantages of Mean) -

 

1. इसकी गणना शीघ्रता से की जा सकती है। 

2. केन्द्रीय प्रवृत्ति का सर्वाधिक शुद्ध मान इसी के प्रयोग से प्राप्त होता है। 

3. मध्यमान की सहायता से दो या दो से अधिक समूहों के मध्य तुलना अन्य केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापों की तुलना में सबसे अधिक सरलता से होती है। 

4. दिये गये वितरण के अंकों का शुद्ध प्रतिनिधित्व मध्यमान ही करता है। 


मध्यमान के दोष (Disadvantages of Mean)-

 

1. मध्यमान के द्वारा कभी-कभी असम्भव प्रकृति के परिणाम भी प्राप्त हो जाते हैं जैसे- 10.50 विद्यार्थी आदि 

2. प्राप्तांको के अधूरे होने पर मध्यमान की गणना नहीं की जा सकती है। 

3. प्राप्तांको का वितरण सामान्य न होने पर मध्यमान की गणना करना उपयुक्त नहीं होता है। 


(ii) मध्यांक (Median ) - 

केन्द्रीय प्रवृत्ति का दूसरा महत्वपूर्ण माप मध्यांक (Median) है। यह दो शब्दों मध्य + अंक से मिलकर बना है, जिसका अर्थ मध्य का अंक बताने वाला माप है। अतः मध्यांक वह बिन्दु है जो कि प्रदत्त (data) को दो समान भागों में विभक्त कर देता है। मध्यांक के बिन्दु से एक ओर अधिक मान वाले 50 प्रतिशत प्रदत्त होते हैं तथा दूसरी ओर कम माने वाले शेष 50 प्रतिशत प्रदत्त होते हैं । इसे सामान्यतः संकेत Md से प्रदर्शित किया जाता है।

 

मध्यांक की विशेषताएं :- 

1. मध्यांक वह बिन्दु है जो कि प्रदत्त को दो समान भागों में विभाजित करता है । 

2. किसी वितरण के छोरों पर स्थित प्राप्तांक मध्यांक के मान को कम प्रभावित करते हैं। 

3. मध्यांक की मानक त्रुटि मध्यमान की मानक त्रुटि से अधिक परन्तु बहुलांक की मानक त्रुटि से कम होती है।

 

मध्यांक का प्रयोग कब करें -

 

1. जब अंक सामग्री या प्रदत्तों का वास्तविक मध्य बिन्दु ज्ञात करना हो। 

2. जब प्रदत्त सामान्य वितरण के अनुरूप न हो तथा उसमें विषमता भी निहित हो, तब केन्द्रीय प्रवृत्ति के माप के रूप में मध्यांक का प्रयोग करना चाहिए।  

3. जब अपेक्षाकृत कम शुद्ध केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान की आवश्यकता हो । 

4. जब अपूर्ण वितरण दिया हो अर्थात् प्रदत्तें से कुछ अंक न मिल सके हों।

 

(iii) बहुलांक (Mode) 

अव्यवस्थित अंक सामग्री में जिस प्राप्तांक की आवृत्ति सबसे अधिक होती है उसे प्राप्तांक की दी हुई अंक सामग्री का बहुलांक कहते हैं। गिलफोर्ड के अनुसार, “किसी वितरण में वह बिन्दु जिसकी आवृत्ति सर्वाधिक हो, बहुलांक कहलाता है।" बहुलांक को अंग्रेजी में Mode कहा जाता है। Mode शब्द फ्रेंच भाषा के La Mode से बना है, जिसका अर्थ फैशन या रिवाज होता है। जिस वस्तु का फैशन होता है, अधिकांश व्यक्ति उसी वस्तु का उपभोग करते हैं सांख्यिकी में इसका अर्थ उस प्राप्तांक से होता है जिसकी आवृत्ति सर्वाधिक हो ।

 

बहुलांक की विशेषतायें :- 

1. बहुलांक की गणना अन्य केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापों की अपेक्षा सरल हैं। 

2. यह केन्द्रीय प्रवृत्ति का अधिक स्थिर और विश्वसनीय मान नहीं है । 

3. बहुलांक शुद्धता की दृष्टि से मध्यमान (Mean) तथा मध्यांक (Median) की अपेक्षा कम शुद्ध माप है। 

4. बहुलांक का मापन अधिक सरलता से व शीघ्रता से ज्ञात किया जा सकता है।

 

बहुलांक का प्रयोग कब करें :-

 

1. जब सबसे कम शुद्ध केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान की गणना करनी हो । 

2. जब केवल निरीक्षण मात्र से ही केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान की गणना करनी हो । 

3. जब अधिक लोकप्रिय, फैशन या शीघ्रता से किसी समस्या का अध्ययन करना हो । 

4. जब वितरण के कुछ वर्ग या अंक छूटे हुए हों। 


विचलनशीलता की मापें (Masures of Variability)

 

प्रदत्त की मध्य स्थिति अथवा केन्द्रीय स्थिति का ज्ञान मध्यमान (Mean), मध् यांक (Median) तथा बहुलांक द्वारा ज्ञात होता है, किन्तु प्रदत्त के प्राप्तांको का फैलाव किस प्रकार का है ? यह ज्ञान हमें विचलन के माप द्वारा ज्ञात होता है।

 

लिंडक्यूस्ट (1950) के अनुसार, "विचलनशीलता ( variability) वह सीमा है, जिसमें प्राप्तांक अपने मध्यमान के ऊपर और नीचे की ओर फैले या बिखरे होते हैं ।"

 

गैरेट (1973) के अनुसार, " विचलनशीलता (Variability) का अर्थ प्राप्तांको के वितरण या फैलाव से है, यह फैलाव प्राप्तांको की केन्द्रीय प्रवृत्ति के चारो ओर होता है।"

 

अतः उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि किसी अंक सामग्री का विचलन अंक उस अंक सामग्री के मध्यमान के दोनो ओर उसके विभिन्न अंको के विचलन या फैलाव को प्रदर्शित करता है विचलन मानों की सहायता से विभिन्न समूहों की सजातीय (Homogeneity) तथा विषम जातीयता (Hetrogeneity) ज्ञात की जाती है एक समूह का विचलन मान जितना कम होता है समूह उतना ही अधिक सजातीय होता है और विचलन मान जितना अधिक होता है समूह उतना ही अधिक विषम जातीय होता है।

 

विचलनशीलता की मापों के प्रकार 

विचलनशीलता को ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित चार विधियाँ या माप (Measures) अधिक प्रचलित है प्रायः इन्हीं मापों का प्रयोग मनोविज्ञान और शिक्षा में अधिक होता है-

 

(1) प्रसार (Range) 

(2) चर्तुथांश विचलन (Quartile Deviation or Q 

(3) मध्यमान विचलन (Mean Deviation or M.D.) 

(4) मानक विचलन (Standard Deviation or S.D.)

Post a Comment

0 Comments
Post a Comment (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !
To Top