भक्ति का उदय | Origin of Bhakti in Hindi

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भक्ति का उदय

भक्ति का उदय | Origin of Bhakti in Hindi
 

भक्ति का उदय  (Origin of Bhakti in Hindi)

भक्ति की प्रवृत्तिपद्धति का सम्बन्ध सिर्फ भागवत् धर्म और भक्ति आंदोलन से ही नहीं है। भक्ति का एक क्रमिक विकास होता है। वैसे भक्ति के बीज वेदों में मिलते हैं। विभिन्न प्राकृतिक उपादनों का दैवीकरणसुख-शांति समृद्धि की कामना से उनकी स्तुति वैदिक ऋचाओं की मूल विशेषता है। ईश्वर की कल्पनाआत्म निवेदनशरणागत की भावनादैन्य भावश्रद्धा का भाव आदि जो भक्ति की मूलभूत विशेषताएं हैं- ये बातें हमें वैदिक ऋचाओं में भी मिलती हैं। परमात्मा की माता-पिताबंधु सखा के रूप में अर्चना की गई है - 'प्रभु ! तुम्हीं हमारे पिता होतुम्हीं हमारी माता हो। हे अनंतज्ञानी ! आपसे ही हम आनंद प्राप्ति की अकांक्षा करते है- 

 

त्व हि नों पिता वसोत्वं माता शतक्रतो वभूविथ। अद्या ते सुम्नमीमहे (ऋग्वेद 8/98/11)पूरी तन्मयता और सर्वस्व सर्मपण की भावना को प्रकट करते हुए ऋग्वेद का ऋषि कहता है- 'प्रभो ये हैं तेरे उपासकतेरे भक्त । ये प्रत्येक स्तवन मेंतेरे कीर्तन-गान में ऐसे तन्मय होकर बैठते हैंजैसे मधुमक्षिकाएँ मधु को चारों ओर से घेर कर बैठ जाती हैं। तेरे अंदर बस जाने की कामना रखने वाले तेरे ये स्तोता अपनी समस्त कामनाओं को तुझे सौंपकर वैसे हीनिश्चिंत हो जाते हैंजैसे कोई व्यक्ति रथ में निश्चिंत होकर बैठ जाता है। '

 

इमें हि ब्रह्मकृतः सुते सचा मधो न मक्ष आसते । 

इन्द्रे कामं जरितारो वसूयवो रथे न पादमा दधुः । (ऋ. 7/32/2)

 

वेदों में ईश्वर की सर्वसमर्थताउसकी महिमा का बखानउसके प्रति श्रद्धा निवेदित किया गया हैं

 

भूतं भव्यं च सर्व श्राधितिष्ठति 

स्वर्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः (अथर्ववेद-10 /8 / 1)

 

अर्थात् भूत भविष्य और वर्तमान का जो स्वामी हैजो समस्त विश्व में व्याप्त हैं तथा जो निर्विकार आनद प्रदान करने वाला हैउस ईश्वर को मेरा प्रणाम ।उपनिषदों में तत्व-चिंतन की प्रधानता है- किंतु कहीं-कहीं पर भक्ति विषयक बातें भी मिलती है। ऐतरेयश्वेताश्वतरोपनिषद में भक्ति को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया हैंकठोपनिषद में कहा गया है- 'यह आत्मा उत्कष्ट शास्त्रीय व्याख्यान के द्वारा उपलब्ध नहीं किया जातामेघा के द्वारा प्राप्तनहीं होताबहुत पांडित्य के द्वारा भी नहीं प्राप्त होता । यह जिसको वरण करता हैउसी को प्राप्त होता है। जिसके सामने आत्मा अपने स्वरूप को व्यक्त करता है। ""

 

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्योन मेधया न बहुना श्रुतेन 

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष विवृणुते तनूस्वाम।।'

 

यहाँ प्रभुकृपा का वर्णन हैजो कि भक्ति का आधार है। भगवत्कृपा से ही भक्ति की प्राप्ति होती और भक्ति से ईश्वर की प्राप्ति । भक्ति चिंतन में ईश्वर ही परमतत्वजगत निर्माताजगत नियंतासृष्टि विनाशक हैउसी के द्वारा सृष्टि का सृजन होता है और उसी में सृष्टि विलीन हो जाती है। छांदोग्य उपनिषद में कहा गया है 'सर्व खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शांत उपासीत । अर्थात् 'जगत की सभी वस्तुएं ब्रह्म हैंक्योंकि सभी ब्रह्म से ही उत्पन्न होती हैंब्रह्म ही अवस्थान करती है तथा ब्रह्म में ही विलीन हो जाती है। इस प्रकार चिंतन करते हुए मन को शांत रखकर उपासना करनी चाहिए।छांदोग्य उपनिषद में ही भक्ति को सबसे उत्कृष्ट और सर्वोत्तम रस कहा गया है- 'स एवं रसानां रसतमः परम परार्धे ।

 

उपनिषदों के बाद भक्ति की प्रबल धारा भागवत धर्म के रूप में प्रकट हुई। भागवत धर्म के प्रवर्तन के साथ ही अवतारवाद की अवधारणा का जन्म हुआ बहुदेवोपासना और लीलागान का प्रचलन हुआ। इसमें ईश्वर को ज्ञानबलऐश्वर्यवीर्यशक्ति और तेज -इन 6 गुणों से युक् माना गयाजिनके द्वारा वह सृष्टि का निर्माणभरण-पोषण और संहार करता है। अवतारवाद एवं भक्ति का पुराणों में विस्तृत वर्णन है। इनमें भागवत पुराण मुख्य है। दक्षिण के आलवार नयनार भक्तों ने भक्तितत्व का प्रचार प्रसार कियाआठवीं सदी में शंकराचार्य के अद्वैत एवं मायावाद के कारण भक्ति का प्रवाह थोड़ा अवरूद्ध होता है। किंतु कालांतर में रामानुजाचार्यनिम्बाकाचार्यविष्णुस्वामीमध्वाचार्यवल्लभाचार्य ने राम-कृष्ण की भक्ति को लोकप्रिय ही नहीं बनाया उसे एक सैद्धांतिक आधार प्रदान कर शास्त्रीय गरिमा भी दी।

 

इस प्रकार हम देखते है कि भक्ति का तत्व वेद उपनिषद महाभारतपुराण आदि से होते हुए सतत् प्रवाहमान रहानिरंतर विकसित होता रहा। भक्ति आंदोलन ने उसे व्यापक और लोकप्रिय बना दिया। अब आप भक्ति के उदय को समझ गए होंगेवैष्णव आचार्यों द्वारा प्रतिपादित भक्ति विषयक सिद्धांतों एवं भक्ति आंदोलन की आगे चर्चा की जाएगी।

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