हिन्दी साहित्य का काल विभाजन |Time division of Hindi literature

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हिन्दी साहित्य का काल विभाजन

हिन्दी साहित्य का काल विभाजन |Time division of Hindi literature


हिन्दी साहित्य का काल विभाजन

 

हिंदी - साहित्य का काल विभाजन तथा नामकरण सामान्यतः इस प्रकार किया जा सकता है-

 

आदिकाल - 

सातवीं सदी के मध्य से चौदहवीं सदी के मध्य तक। रीतिकाल - सत्रहवीं सदी के मध्य से उन्नीसवीं सदी के मध्य तक। 

भक्तिकाल - 

चौदहवीं सदी के मध्य से सत्रहवीं सदी के मध्य तक । 

आधुनिक काल - 

उन्नीसवीं सदी के मध्य से अब तक 

(1) पुनर्जागरण काल (भारतेंदु काल ) -1857-1900

(2) जागरण-सुधार काल ( द्विवेदी-काल ) -1900-1918

(3) छायावाद काल -1918-1938 ई.

(4) छायावादोत्तर - काल 

  • क) प्रगति प्रयोग-काल 1938-1953 
  • (ख) नवलेखन - काल 1953 ई. से अब तक


➽ आचार्य शुक्ल एक समर्थ समीक्षक व इतिहासकार थे। इतिहास लेखन काल मेंउनके समक्ष काफी परिसीमाएँ थीं- उनके सामने आज जैसी विशाल गवेषणात्मक राशि का अभाव था। इसके अतिरिक्त उस काल की बहुत प्रक्षेपात्मक अप्रामाणिक सामग्री थी जो आज तक भी संदिग्ध और प्रश्नचिह्नों से घिरी हुई है। आचार्य शुक्ल तत्कालीन विविध संप्रदायों के धार्मिक व उपदेशात्मक साहित्य को सृजनात्मक साहित्य की परिधि से बाहर रखने के आग्रह पर अड़े रहे. हालाँकि प्रस्तुत साहित्य में साहित्यिक रचनात्मकता की भी पर्याप्त मात्रा थी। इस विशाल साहित्य को अलग-अलग कर देने पर आचार्य जी के सामने नामकरण के अवसर पर केवल वीरगाथात्मक साहित्य बचा थाजिसकी बहुत सी रचनाएँ संदिग्ध और अप्रामाणिक थीं। परिणामतः शुक्ल जी को द्विविधा की स्थिति का सामना करना पड़ा तथा प्रस्तुत काल का दोहरण नामकरण कर दिया - वीरगाथा काल या आदिकाल हमारा अनुमान है कि आचार्य शुक्ल ने वीरगाथाओं के शौर्य और वीररसात्मकता का तो नामकरण के काल में ध्यान रखा होगाकिंतु इस तथाकथित शिवेलरी की तो परिकल्पना भी नहीं की होगी। इसके अतिरिक्त बीसलदेव रासोसंदेश रासक तथा फामू रासो आदि रासोनामधारी ग्रंथों में शिवेलरी की छाया तक भी दिखाई नहीं पड़ती है। हम उक्त तथ्य को फिर दोहराना चाहते हैं कि आचार्य शुक्ल ने जिस अल्प सामग्री के आधार पर जिन दुष्कर परिस्थितियों में इतिहास लेखन का अत्यंत दायित्वपूर्ण कार्य संपन्न कियातदनुसार वह ठीक था। आचार्य शुक्ल की अपनी कतिपय परिसीमाएँ थीं। सर्वाधिक यह कि उनके काल में एक दोषरहित इतिहास ग्रंथ लिखने के लिए अपेक्षित पर्याप्त सामग्री प्रकाश में नहीं आई थीअतः उन्हें सीमित सामग्री से काम चलाना पड़ापरिणामत: उनके काल विभाजन के प्रयास का एकांगी रह जाना स्वाभाविक था ।

 

➽ आज की स्थितियाँ पर्याप्त भिन्न हैं। विगत के चार-पाँच दशकों से हिंदी जगत में पुष्कल अनुसंधान सामग्री आलोक में आई है और उस पर नवीन दृष्टिकोण से चिंतन-मनन हुआ हैजिसे ध्यान में रखते हुए आचार्य शुक्ल के प्रवृत्यात्मक काल विभाजन को सर्वथा निरापद और त्रुटि रहित नहीं कहा जा सकता है विशेषतः वीरगाथा काल के नामकरण को किसी काल में साहित्य की विभिन्न परंपराओं के अंतर्गत प्रणीत साहित्य को धर्मोपदेश-परकदार्शनिक अथवा सृजनात्मक साहित्येतर कहने मात्र से तत्कालीन विपुल साहित्य - राशि की महिमा को इतना व्याघात नहीं पहुँचता जितनी हानि उस काल में रचित समग्र साहित्य को पहुँचती है। भारतवर्ष में प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल के कुछ पूर्व तकसाहित्य सृजन की प्रक्रिया धर्माश्रयराजाश्रय और लोकाश्रय में चलती रही है। तथाकथित 'वीरगाथा - कालके नामकरण से धर्माश्रित एवं लोकाश्रित साहित्य की घोर उपेक्षा हो जाती है। नाथोंसिद्धों व जैनों के साहित्य को उपदेशात्मकधर्मपरकदार्शनिक सिद्धांतपरक कहने मात्र से उक्त काल की इस महती साहित्यिक समस्या का हल नहीं निकल सकता है। सबसे पहली बात तो यह है कि संप्रदायों के साहित्य में मात्र धर्मोपदेश दर्शन -शिक्षण अथवा सिद्धांतांकन के अतिरिक्त सृजनात्मकता का भी अपेक्षित मिश्रण है। इन्हें 'ब्रह्मसूत्रमनुस्मृतियाज्ञवल्क्य स्मृति जैसे शास्त्रपरकं ग्रंथों की कोटि में रखना महान् भूल होगी। वस्तुस्थिति तो यही है कि धर्मप्राण भारत देश में रचित साहित्य सदा धर्मानुप्रेरित रहा है। भारतीय जीवन के चारों पुरुषार्थ अनगिनत सदियों तक सर्वदा व्यापक धर्मानुप्राणित रहे हैं- भगवान् व्यासदेव के अनुसार

 

ऊर्ध-बाहुः वृणोमि एषः नहि कश्चित् शृणोति मे । 

धर्मादर्थः च कामः च किन्तु धर्मः न सेव्यते ॥

 

➽ मैं ऊर्ध्व-भुजपुनः पुनः उद्घोषित करता हूँ किंतु कोई मेरी बात सुनता ही नहीं। धर्मानुकूल आचरण से अर्थ संचय एवं धर्मानुप्रेरित कामानंद संपन्न होते हैं। फिर भी न जाने लोग धर्मानुसेवन क्यों नहीं करते अतः भ्रामक धर्मनिरपेक्षिता व सांप्रदायिकता की डिमडिमा पीटने वाले वितंडावादी कतिपय लोग धर्म व संप्रदाय जैसे निरीह शब्दों के सुनने मात्र से ही त्यौरियाँ चढ़ाने के आदी हो गये हैं। धर्म को उसकी व्यापक उपादेयता के परिप्रेक्ष्य में देखना हितकर होगा। अन्यथा हमें वाल्मीकिव्यासकालिदाससूरदासनानकतुलसीदास स्वामी हरिदासहितहरिवंश और मीराबाई आदि की अमूल्य साहित्यिक धरोहर से वंचित होना पड़ेगा।

 

➽ वैसे भी आजकल (सेक्युलेरिज्म) धर्मनिरपेक्षिता के नाम पर उसे बिंबायमान करने वाले तथा सांप्रदायिकता की सहज पारदर्शिता को प्रतिबिंबित करने वाले चश्मे काफी आसानी से उपलब्ध हो जाते हैंजिन्हें लगाकर कोई भी कट्टर जातिवादी दलों की दलदल में आकंठ मग्न घोर निहित स्वार्थी जन प्रतिनिधित्व के नाम पर उच्च स्वर से परदोषारोपण की कला में जन्म से ही दक्षसंसद भवन तक में निर्भीक भाव से सेक्यूलेरिज़्म (धर्मनिरपेक्षिता) की ऊँची से ऊँची दुहाई लगा सकता है।


वीरगाथा - काल

➽ (क) प्रो. आर. एस. चतुर्वेदी की आचार्य शुक्ल के प्रति अनन्य आस्था नितान्त प्रशस्य है किंतु काल- विभाजन के प्रकरण मेंविशेषतः 'वीरगाथा - कालके पक्ष - पोषणार्थ प्रस्तुत की गई विशिष्ट टिप्पणी उद्धरणीय है- " फिर आचार्य शुक्ल के नामकरण में वीर शब्द ही नहीं गाथा का भी विशिष्ट अर्थ है। गाथा के साथ शौर्य और शिवेलरी के तत्व जुड़े हुए हैंजहाँ वीर का प्रेरक भाव अनिवार्य रूप से श्रृंगार है। योंवीरगाथा में वीर और श्रृंगार एक युग्म के रूप में चित्रित होते हैं। धर्म और ऐहिकता फिर ऐहिकता में वीर और शृंगार का अंतर्भाव लगता है ईश्वर की परिकल्पना में मनुष्य को सिरजा जा रहा है-महान उदात्त वीर और तेजस्वी । " निश्चयतः यह एक सटीक टिप्पणी है और उसमें व्याख्येय शब्द हैं वीरगाथा के साथ शौर्य और शिवेलरी का संयोजनवीर और शृंगार रसों की एक युग्मता व पारस्परिक अंतर्भावईश्वरीय परिकल्पना में महान उदात्त वीर और तेजस्वी मनुष्य का सृजन । गाथाआख्यायिका कथा व गल्प आदि शब्द भारतीय काव्यशास्त्रीय ग्रंथों में बहुधा चर्चित हैं और आचार्य वर्ग ने इन शब्दों के पारस्परिक अर्थ भेद का मार्मिक विश्लेषण किया हैकिंतु उन्होंने गाथा शब्द को प्रो. चतुर्वेदी द्वारा संदर्भित अर्थ में स्वीकार नहीं किया है। हाल की गाथा सप्तशती (गाहा सप्तशती) में निरूपित विषयों की विविधता को देखते हुए गाथा - शब्द में संकेतित अर्थ का ध्वनन नहीं होता । वस्तुस्थिति यह है कि प्राकृत साहित्य में गाथा के स्थान पर गाहा शब्द के प्रयोग का प्रचलन रहा। इसी प्रकार अपभ्रंश साहित्य में दोहा व दुहा का प्रचलन रहा है। तब समझ में नहीं आता कि 'वीर गाथाशब्द का विशिष्ट अभिधेय या ध्वनित अर्थ क्या हैसंस्कृतप्राकृत व अपभ्रंश परंपरा में वीरचरितात्मक ग्रंथों में प्रायः कोई भी ऐसा ग्रंथ नहीं है जहाँ वीर और श्रृंगार रस परस्पर अंतर्भुक्त न हुए हों। शिवेलरी का शब्दकोशिक अर्थ है- शूरवीर के गुणवीरता आदि । प्राचीन साहित्य के चरितात्मक काव्यों में उक्त सभी कुछ सहज सुलभ है। मध्यकालीन ऐतिहासिक युग में भारतीय नरेशों को देवता के प्रतिनिधि के रूप में दिव्य गुणों से संपन्नमहिमामंडित व प्रतिष्ठित समझा जाता था - " महती हि एषः देवतारूपेण तिष्ठति" अतः चरितात्मक काव्यों के शौर्य संपन्न वीर नायकों में महत्ताउदात्ततावीरता और तेजस्विता आदि के ऐश्वर्य संपन्न गुणों का आरोप कोई अपरिकल्पनीय वस्तु नहीं है।

 

➽ इसके अतिरिक्त प्रकृति ने भारत को प्राकृतिक संपदा की दृष्टि से संपन्न बनाया है। गीता का कथन है-" यद् यद् विभूतियत् सत्त्वं तन्मय तेजोऽअंश समुद्भवम- विश्व का कोई भी विभूतिमय पदार्थ मेरे तैजस- अंश से संवलित है। अतः राजा की दैवी गुणों से संपन्नता की धारणा भारतीय समाज के लिए कोई परिचित वस्तु नहीं है। राजा को देवता के रूप में मानने की बात कोई अचरज की नहीं है। अतः प्रारंभिक काल में आश्रयदाता की देवता के रूप में परिकल्पनातत्कालीन परिवेश के अनुकूल है- “ महत्ती हि देवता एषा नररूपेण तिष्ठति"। शेष रही प्रो. चतुर्वेदी है। इस जी द्वारा 'गाथाशब्द के साथ शिवेलरी का संयोजनइस संदर्भ में तुलसी की यह पंक्ति द्रष्टव्य है-“स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुवीर गाथा" में शिवेलरी जैसा कोई भी विशिष्ट अर्थ सन्निहित नहीं है। वीरगाथा जैसे एकांगी नामकरण को स्वीकार कर लेने से उस काल मेंलोकाश्रय और धर्माश्रय में रचित साहित्य सर्वथा उपेक्षित रह जायेगा। अत्यधिक प्रक्षेपों से भरी हुई वीरगाथाओं का प्रामाणिक अस्तित्व अभी तक अनेक संशयों से घिरा हुआ काल के नामकरण के संदर्भ में प्रारंभिक काल अथवा आदिकाल के नाम के औचित्य की स्वीकृति से साहित्य का व्यापक हित संपन्न होगा।

 भक्तिकाल

➽ (ख) आचार्य शुक्ल ने पूर्व मध्यकाल को भक्तिकाल की संज्ञा से अभिहित किया है जो कि एक ही प्रवृत्ति को सूचित करता है जबकि उस काल में भक्ति धारा के साथ-साथ साहित्य की अन्य धाराएँ भी पर्याप्त सक्रिय रहीं। शुक्ल जी ने भक्तिकाल की केवल चार काव्य परम्पराओं-निर्गुण ज्ञानाश्रयीनिर्गुण प्रेमाश्रयीकृष्णभक्ति और रामभक्ति संबंधी काव्य परंपराओं का उल्लेख किया है किंतु इनके अतिरिक्त उक्त काल में काव्य की अन्य अनेक परंपराएँ चलती रहीं। समूचे मध्यकाल अर्थात् पूर्व मध्य तथा उत्तर मध्यकाल में प्रारंभिक काल के समान धर्मराज्य तथा लोकाश्रयों में साहित्य सृजन बराबर चलता रहाअतः पूर्व मध्यकाल तथा उत्तर मध्यकाल को परस्पर सर्वथा विभिन्न समझना भ्रम होगा। 


➽ डॉ. गणपति चंद्र गुप्त ने मध्यकालीन हिंदी साहित्य की काव्य परंपराओं का उल्लेख इस प्रकार किया है

 

1. धर्माश्रय में- (क) संत काव्य परंपरा, (ख) पौराणिक गीति परंपरा, (ग) पौराणिक प्रबंध काव्य परंपरा, (घ) रसिक भक्ति काव्य परम्परा ।

2. राज्याश्रय में- (क) मैथिली गीति परंपरा, (ख) ऐतिहासिक रास काव्य परंपरा, (ग) ऐतिहासिक चरित काव्य परंपरा, (घ) ऐतिहासिक मुक्तक परंपरा, (ङ) शास्त्रीय मुक्तक परंपरा ।

 

3. लोकाश्रय में- (क) रोमांटिक कथाकाव्य परंपरा, (ख) स्वच्छंद प्रेमकाव्य परंपरा । इससे स्पष्ट है कि आधुनिक अनुसंधानों के द्वारा पर्याप्त नवीन सामग्री के आलोक में आ जाने पर पूर्व मध्यकाल को भक्तिकाल के नाम से सूचित करना उसके एकांगीपन का द्योतक है।

 

रीतिकाल शृंगार काल

➽ (ग) आचार्य शुक्ल ने उत्तर मध्यकाल को रीतिकाल तथा अन्य कतिपय इतिहास लेखकों ने इसे शृंगार काल तथा कला काल और अलंकृत काल के नामों से अभिहित किया। हम पहले लिख चुके हैं कि पूर्व मध्यकाल में प्रवाहित काव्य परंपराएँ उत्तर मध्यकाल में भी निरविच्छिन्न गति से चलती रही हैंअतः तथाकथित रीति पद्धति की प्रमुखता के आधार पर उक्त काल को रीतिकाल की संज्ञा से अभिहित करना न्यायसंगत नहीं है। यही दशा शृंगार काल और कला काल आदि के नामों की हैं। नि:संदेह रीति के माध्यम से नायक-नायिकाओं का रसिकता प्रधान श्रृंगार निरूपण इस काल में हुआ है। किंतु इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि उस समय काव्य की अन्य परंपराएँ सर्वथा विलुप्त हो गई थीं। रीति पद्धति की प्रमुखता की स्वीकृति का कारण कदाचित् यह रहा है कि रीति कविता बहुधा अवधबुंदेलखंड और राजस्थान के राजदरबारों में पलीअतः उसमें रीति-रचनाशृंगारिकता एवं अलंकरण की प्रवृत्तियों की प्रमुखता है। किंतु इसके विपरीत आधुनिक अनुसंधानों द्वारा कई महत्त्वपूर्ण नवीन तथ्य प्रकाश में आये हैं। उक्त काल में साहित्य की रचना केवल राजाश्रय में ही नहीं हुई बल्कि धर्माश्रय और लोकाश्रयों में भी प्रभूत साहित्य का प्रणयन हुआ जिसे किसी भी दशा में रीति पद्धति पर रचे साहित्य में गौण नहीं कहा जा सकता है। कुछ वर्ष पूर्व गुजरातराजस्थानहरियाणापंजाबमहाराष्ट्रमध्य प्रदेशउत्तर प्रदेश तथा मिथिला जनपद में सैकड़ों भक्त संत काफी सूफी तथा जैन कवियों की असंख्य शुद्ध भक्ति भाव से संबलित रचनाओं का पता चला है जिनके आधार पर निःसंकोच रूप से कहा जा सकता है कि उक्त काल में उपलब्ध भक्ति काव्य परिमाण और साहित्यिक उत्कृष्टता की दृष्टि से यदि रीति पद्धति पर रचे साहित्य से बढ़कर नहीं है तो कम भी नहीं है। इसके अतिरिक्त उत्तर मध्य काल में राज्याश्रय में प्रणीत साहित्य में जहाँ श्रृंगार रस का चित्रण प्रधान विषय बना रहावहाँ वीर रस का निरूपण भी उससे गौण नहीं था। डॉ. टीकम सिंह तोमर ने अपने शोध प्रबंध में 1700 से 1900 में रचित 90 वीर काव्यों की सूची प्रस्तुत की। डॉ. जय भगवान गोयल ने पंजाब और हरियाणा में प्राप्त गुरुमुखी लिपि में निबद्ध 25 वीर काव्यों की सूचना दी है। इसके अतिरिक्त उक्त काल में रासोरायस अथवा रास नामधारी ग्रंथों तथा बातबेल अथवा वचनिका नामधारी रचनाओं का पता चला हैजिनमें वीर रस का अतीव कलात्मक चित्रण उपलब्ध होता है। उपरिचर्चित वीर काव्यों में तत्कालीन राजनीतिक चेतना तथा युग-बोध पर्याप्त मात्रा में है। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि इस काल में काव्य की किसी एक प्रवृत्ति की प्रधानता नहीं रही है प्रत्युत कई सशक्त धाराएँ समानान्तर रूप से समान वेग से चलती रही हैंअतः विवेचित काल को उत्तर मध्य काल के नाम से अभिहित करना उचित प्रतीत होता है। डॉ. जय भगवान गोयल के शब्दों में, “ क्षेत्र विस्तारसृजन की व्यापक आधार भूमिनई सामग्री एवं नई कवि दृष्टि इस काल के साहित्य के पुनर्मूल्यांकन का पर्याप्त औचित्य प्रस्तुत करती है। "

 

➽ (घ) परंपरागत दृष्टिकोण के अनुसार प्रायः आधुनिक काल के साहित्य को विभिन्न युगों- भारतेंदु युगद्विवेदी युगछायावाद युगप्रगतिवाद युगप्रयोगवाद युग तथा प्रयोगोत्तर युग में विभक्त कर दिया जाता है जो कि असंगत है। उपर्युक्त वर्गीकरण से युग विशेष की कविता का ही बोध संभव है जबकि तत्कालीन विपुल गद्य साहित्य उपेक्षित रह जाता है। वस्तुस्थिति इसके विपरीत है। आधुनिक काल के साहित्य पर विहंगम दृष्टि डालने से यह स्पष्ट हो जाता है। कि उक्त काल गद्य के लिए जितना अनुकूल है उतना कविता के लिए नहीं । अस्तु! आधुनिक काल की साहित्य सामग्री को कालखंडों की अपेक्षा उसे साहित्य रूपों और काव्य परंपराओं में विभक्त करके उसका अध्ययन करना अधिक श्रेयस्कर है। उदाहरणार्थ आधुनिक काल के साहित्य को निम्नस्थ काव्य परंपराओं में विभक्त किया जा सकता है- (1) स्वच्छंदतावादी काव्य परंपरा (छायावादी), (2) समाजपरक यथार्थवादी काव्य परंपरा (प्रगतिवादी), (3) व्यक्तिपरक यथार्थवादी काव्य परंपरा ( प्रयोगवादी) आदि।

 

इस प्रकार हम हिंदी साहित्य का काल विभाजन निम्नलिखित रूप में कर सकते हैं-

 

1. प्रारंभिक काल (आदिकाल) वि. 1241-1375 

2. पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल ) वि. 1375-1700 

3. उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल ) वि. 1700-1900 

4. आधुनिक काल  वि. 1900 से अद्यावधि

 

➽  ऊपर हमने आचार्य शुक्ल के काल विभाजन के औचित्य की समीक्षा की है. हालाँकि शुक्ल जी के पश्चात् अनेक इतिहास ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं जिनमें प्राय: काल विभाजन की दिशा में शुक्ल जी का अनुकरण किया गया है। इस दिशा में डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त का प्रयास नितांत अभिनन्दनीय है। उन्होंने अपने महत्त्वपूर्ण ग्रंथ 'हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहासमें पर्याप्त छानबीन और गहन अध्ययन के फलस्वरूप एक नवीन दृष्टिकोण से हिंदी साहित्य के काल विभाजन को सुपुष्ट वैज्ञानिक आधार पर खड़ा किया है।

 

➽  इस विषय में ज्ञातव्य है कि उपर्युक्त विवेचन का तात्पर्य आचार्य शुक्ल जैसे कृति विद्वान के प्रति अवज्ञा के भाव का प्रदर्शन करना नहीं है किंतु नवीन तथ्यों के आलोक में अपना विनम्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है। यदि आचार्य शुक्ल के सामने आज तक के अनुसंधानों से प्राप्त नवीन विपुल सामग्री होती तो निश्चयतः उनके काल-विभाजन का रूप कुछ और होता। आचार्य शुक्ल द्वारा साहित्यिक इतिहास-लेखन का प्रयास एक ऐसी नींव का पत्थर है जिसके बिना हिंदी साहित्य के इतिहास के भव्य महल का निर्माण अकल्पनीय है।

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