नाथ साहित्य विषय और सिद्धांत |नाथ साहित्य की देन | Natha Sahitya Vishay Sidhant

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नाथ साहित्य विषय और सिद्धांत , नाथ साहित्य की देन 

नाथ साहित्य विषय और सिद्धांत |नाथ साहित्य की देन | Natha Sahitya Vishay Sidhant


 नाथ  साहित्य

नाथ सम्प्रदाय का विकास वज्रयान की सहज साधना नाथ सम्प्रदाय के रूप में पल्लवित हुई । जीवन को कर्मकाण्ड के जाल से मुक्त कर सहज रूप की ओर ले जाने का श्रेय नाथों को ही जाता है। इस प्रकार नाथ सम्प्रदाय को सिद्धों का विकसित तथा शक्तिशाली रूप कहना चाहिए। सिद्धों की विचारधारा को लेकर इस सम्प्रदाय ने उसमें नवीन विचारों की प्राण-प्रतिष्ठा की। उन्होंने निरीश्वरवादी शून्य को ईश्वरवादी शून्य बना दिया। नाथ सम्प्रदाय वज्रयान की परम्परा में शैवमत की क्रोड में पला । 14वीं सदी तक इस सम्प्रदाय के साहित्य ने साहित्य और धर्म का शासन किया। इस प्रकार नाथ युग सिद्ध युग और संतों के बीच की कड़ी माना जा सकता है। कुछ विद्वानों का विश्वास है कि नाथ सम्प्रदाय का विकास पूर्ण स्वतंत्र रूप से हुआ-"यदि नाथ लोग सिद्धों के दिखाये हुए मार्ग को अपना साधन चुन लेते तो उनको कोई भी महत्त्व न मिलता। "- (पूर्ण गिरि स्वामी ) किन्तु यह मत भ्रांतिपूर्ण है। संत लोगों ने भी तो नाथ लोगों के दिखाये हुए मार्ग को चुना तो क्या उनको महत्त्व नहीं मिलावास्तविक बात तो यह है कि सिद्धों ने जिस पथ की ओर संकेत किया था संतों ने उसे राजमार्ग बनायापुरानी विचारधारा में नवीन पद्धति का समावेश किया। प्रत्येक धार्मिक विचारधारा का इतिहास इस बात का साक्षी है कि युग की परिस्थितियों के अनुकूल उसमें संशोधनपरिवर्तन और परिवर्द्धन हुआ। बौद्ध धर्म और राग - साहित्य इस बात के साक्षी हैं। बौद्ध धर्म महायान से वज्रयानवज्रयान से सहजयान और सहजयान से नाथ सम्प्रदाय के रूप में विकसित हुआ।

 

➽ नाथ सम्प्रदाय पर कौल सम्प्रदाय का भी कुछ प्रभाव पड़ा है। कौलों की अष्टांग योग की भावना को नाथों ने साधना के रूप में अपनाया। साथ-साथ नाथपंथी संतों ने कौलों की व्याभिचार प्रवृत्ति का तीव्रतम विरोध किया है। अष्टांग योग की साधना वज्रयान में भी रही है। हांयह दूसरी बात है कि उक्त साधना सीधे रूप से नाथों के यहाँ उनसे न आई हो। या यह भी संभव है कि इन नाथों ने वज्रयानियों के इस योग को भी अपना लिया हो।

 

नाथ  साहित्य विषय और सिद्धांत

➽ नाथपंथ की दार्शनिक सैद्धान्तिक रूप से शैवमत के अंतर्गत है और व्यावहारिकता की दृष्टि से हठयोग से संबंध रखती है। नाथ पंथ की ईश्वर संबंधी भावना शून्यवाद में है और यह वज्रयान से ली गई है। कबीर ने इसी शून्य को सहजसुन्नसहस्रदल कमल आदि नामों से पुकारा है। यह शून्य क्रमानुसार अलख निरंजन होकर नाथ सम्प्रदाय में आया। नाथों ने निवृत्ति मार्ग पर विशेष बल दिया। इनके अनुसार वैराग्य से शब्दस्पर्श आदि से मुक्ति संभव है। वैराग्य गुरु द्वारा संभव है अतः इनमें गुरुमन्त्र या गुरुदीक्षा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। ये लोग शिष्य की अत्यंत कठोर परीक्षा लिया करते थे अतः इनका सम्प्रदाय व्यापक रूप न ले सका। इसमें प्रचार की अपेक्षा मर्यादा रक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया। उन्होंने कुछ आध्यात्मिक संकेत रहस्यात्मक शैली मेंउलटबांसियों में विचित्र रूपकों में किये जो साधारण जनता की समझ से बाहर थेउन्हें वे ही समझ सकते थे जो कि इस मत में दीक्षित होते थे। इस सम्प्रदाय में इन्द्रियनिग्रह पर विशेष बल दिया गया । इन्द्रियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण नारी हैअतः नारी से दूर रहने की भरसक शिक्षा दी गई है। संभव है कि गोरखनाथ ने बौद्ध विहारों में भिक्षुणियों के प्रवेश का परिणाम और उनका चारित्रिक पतन देखा हो तथा कौल पद्धति या वज्रयान के वाममार्ग में भैरवी और योगिनी रूप नारियों की ऐन्द्रिक उपासना में धर्म को विकृत होते देखा हो। गोरख ने अपने शिष्यों को नारी से सदा दूर रहने का आदेश दिया। कबीर में नारी विरोध का जो स्वर मिलता हैउसे भी इसी प्रतिक्रिया का परिणाम समझना चाहिए । इन्द्रिय निग्रह के बाद प्राण-साधना तथा इसके पश्चात् मनःसाधना पर अधिक बल दिया। मनः साधना से तात्पर्य है मन को संसार से खींचकर अन्तःकरण की ओर उन्मुख कर देना। मन की जो स्वाभाविक गति बाह्य जगत की ओर है उसे पलटकर अंतर जगत की ओर करना ही मन की साधना की कसौटी है। यही उलटने की क्रिया उलटबासियों का आधार है। इसमें अनेक क्रियाओं का भी उल्लेख है । उदाहरणार्थनाड़ी साधनकुंडलिनीइंगलापिंगलासुषुम्ना आदि का वर्णन है। ब्रह्मरन्ध्रषट्चक्रसुरत योग और अनहद नाद आदि का भी इनके यहां उल्लेख है। इन्होंने शिव और शक्ति को आदि तत्व माना है। इन्होंने पाखण्ड का खुलकर खण्डन किया है।


➽ नाथा सम्प्रदाय राजनीतिक गतिविधियों के प्रति भी तटस्थ नहीं था। गोरखनाथ के किसी शिष्य ने काफिर बोध में मुसलमानों के अत्याचारों का विरोध करते हुए कहा है 

हिन्दू मुसलमान खुदाई के बन्दे 

हम जोगी न कोई किसे के छन्दे । 


➽  नाथपंथ वालों ने अपने सिद्धांतों की मीमांसा जन भाषा के आश्रय से साखियों और पदों में की। नीतिआचारसंयम और योगादि इनके साहित्य के प्रधान विषय हैं। 

➽  नाथ योगियों की अनेक परम्पराएँ प्रसिद्ध हैं। चौरासी सिद्धों के समान नवनाथ भी प्रसिद्ध हैं जिनमें शिव ही आदि नाथ हैं और मत्स्येन्द्र नाथ (मछेन्द्र) जालन्धर नाथगोरखनाथ मुख्य हैं। इस सम्प्रदाय के प्रत्येक जोगी के नाम के अंत में नाथ शब्द जुड़ा हुआ है। इन नाथों की चौरासी सिद्धों में भी गणना की जाती है। संभव है ये पहले किसी सिद्ध सम्प्रदाय में रहे हों और उनसे अलग होकर इस पंथ के अनुयायी बने हों। 

➽  प्रायः इतिहास लेखकों की यह मान्यता है कि शंकराचार्य के बाद दसवीं सदी में आविर्भूत गुरु गोरखनाथ ने धर्मसंस्कृति और सामाजिक क्षेत्रों में आमूलचूल क्रान्ति का स्वर बुलन्द किया और उसका श्रेय नि:संदेह गोरखनाथ के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को जाता है। इनके व्यक्तित्व और कृतित्व को तीन स्तरों पर सहज में आंका जा सकता है। वे तीन स्तर हैं- शिव-शक्ति की उपासनाहठयोग ( नाथयोग) की कृच्छ साधना-अष्टांग योग के अन्तर्गत आसनमुद्राओं तथा प्राणायाम की कठोर साधनासामाजिक चेतना के जागरण के आंदोलन में निरर्थक रूढ़ियोंजीर्ण-शीर्ण परंपराओं एवं बाह्य आडंबरों व पौरोहित्यवाद के प्रति उग्र विरोधमानवीय गुणों की सच्चे अर्थों में प्रतिष्ठा तथा सामाजिक न्याय के प्रति निष्ठापूर्वक प्रतिबद्धता उनमें प्रत्यक्षतः देखी जा सकती है। उनके सामाजिक न्यायदलित व पीड़ित वर्ग के उत्थान की लालसा में कहीं भी छल-कपट एवं दंभ का स्थान नहीं था जैसा कि आज के सामाजिक न्याय के ध्वजाधारीछद्मवेशीदभी निहित स्वार्थी कतिपय राजनीतिज्ञों के नारों में मात्र दिखावा और पर - प्रवंचना की विकृत भावनाएँ दिखाई देती हैं। आज के सामाजिक न्याय का मुखौटा लगायेस्वार्थपरायण नौटंकियावादि तथाकथित राजनीतिज्ञों ने सामाजिक समरसता की जगह सामाजिक द्वंद्व व कलह और वैषम्यवर्गवादजातिवाद एवं पारस्परिक घृणावाद को उभारा हैजो सामाजिक न्याय की मूलभावना के बिलकुल प्रतिकूल पड़ता हैं। सामाजिक समरसता के स्थान पर घृणी के प्रचार के दूरगामी परिणाम अत्यन्त भयावह हो सकते हैं। सामाजिक न्याय के लिए आत्म - उत्सर्गसाधनात्याग व तेन त्यक्तेन भुंजीथा की प्रेरक भावना अत्यावश्यक है। सामाजिक न्याय के नाम पर पर-प्रवंचकदंभपरायण लोगों को आगे आनेवाली पीढ़ियां और इतिहास कभी क्षमा नहीं करेगा। अस्तु! कदाचित कबीर और नानक देव जैसे क्रान्तिकारी व्यक्तित्वों पर गुरु गोरखनाथ एवं नाथ संप्रदाय के सामाजिक क्रान्तिकारी आन्दोलन का अनिवार्यतः प्रभाव पड़ा होगा।

 

नाथ साहित्य की देन 

"गोरखनाथ ने नाथ सम्प्रदाय को जिस आंदोलन का रूप दिया वह भारतीय मनोवृत्ति के सर्वथा अनुकूल सिद्ध हुआ है। उसमें जहाँ एक और ईश्वरवाद की निश्चित धारणा उपस्थित की गई वहाँ दूसरी ओर विकृत करने वाली समस्त परम्परागत रूढ़ियों पर भी आघात किया। जीवन को अधिक से अधिक संयम और सदाचार के अनुशासन में रखकर आध्यात्मिक अनुभूतियों के लिए सहज मार्ग की व्यवस्था करने का शक्तिशाली प्रयोग गोरख ने किया।" -डॉ. रामकुमार

 

“ इसने परवर्ती संतों के लिए श्रद्धाचरण प्रधान धर्म की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। जिन संत साधकों की 44 रचनाओं से हिन्दी साहित्य गौरवान्वित हैउन्हें बहुत कुछ बनी बनाई भूमि मिली थी।" - (आचार्य हजारी प्रसाद ) । आगे चलकर द्विवेदी जी लिखते हैं- "इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसका रूखापन और गृहस्थ के प्रति अनादर भाव है। इसी ने इस साहित्य को नीरसलोक विद्वष्ट और क्षयिष्णु बना दिया था। फिर भी यह दृढ़ कंठ स्वर उत्तरी भारत में मार्मिक वातावरण को शुद्ध और उदात्त बनाने में सहायक हुआ। इस दृढ़ स्वर ने यहाँ धार्मिक साधना में गदलश्रु भावुकता और ढुलमुलेपन को आने नहीं दिया। परवर्ती हिन्दी साहित्य में चारित्रिक दृढ़ताआचरण शुद्धि और मानसिक पवित्रता का जो स्वर सुनाई पड़ता है उसका श्रेय इस साहित्य को ही हैं। इसलिए इस पंथ के साहित्य से परवर्ती हिन्दी साहित्य का बहुत घनिष्ठ संबंध है।

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