अमीर खुसरो जीवन-वृत्त (परिचय) ग्रन्थ- साहित्यिक देन | Aamir Khusro Biography in Hindi

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अमीर खुसरो जीवन-वृत्त (परिचय) (Aamir Khusro Biography in Hindi)

अमीर खुसरो जीवन-वृत्त (परिचय)  ग्रन्थ- साहित्यिक देन | Aamir Khusro Biography in Hindi


 

अमीर खुसरो जीवन-वृत्त (परिचय) 

अमीर खुसरो इनका उपनाम हैइनका असली नाम अब्दुल हसन था। इनका जन्म सन् 1312 में पटियाली जिला एटा में हुआ। इन्होंने अपनी आँखों से गुलाम वंश का पतनखिलजी वंश का उत्थान तथा तुगलक वंश का आरंभ देखा। इनके सामने ही दिल्ली के शासन पर ग्यारह सुल्तान बैठे जिनमें से सात की इन्होंने सेवा की। आप बड़े ही प्रसन्नचित्तमिलनसार तथा उदार थे। इन्हें जो कुछ धन प्राप्त होता था उसे बांट देते थे। इनमें सांप्रदायिक कट्टरता किसी भी प्रकार नहीं थी। डॉ. ईश्वरीप्रसाद इनके संबंध में लिखते हैं- "ये कवियोद्धा और क्रियाशील मनुष्य थे।" इनके ग्रन्थों के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि इनके एक लड़की और तीन पुत्र थे। जब सं. 1324 में इनके गुरु निजामुद्दीन औलिया की मृत्यु हुई तो ये उस समय गयासुद्दीन तुगलक के साथ बंगाल में थे। मृत्यु का समाचार सुनते ही शीघ्र दिल्ली पहुँचे और औलिया की कब्र के निकट निम्नांकित दोहा पढ़कर बेहोश होकर गिर पड़े-

 

गोरी सोवे सेज परमुखर पर डारे केस । 

चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस ॥

 

अंत में कुछ दिनों में इनकी भी उसी वर्ष मृत्यु हो गई। ये अपने गुरु के कब्र की नीचे गाड़ दिए गए। सन् 1605 ई. में ताहिरा बेरा नामक अमीर ने वहाँ पर मकबरा बनवा दिया। 


अमीर खुसरो ग्रन्थ- 

अमीर खुसरो अरबीफारसीतुर्की और हिंदी के विद्वान थे तथा इन्हें संस्कृत का भी थोड़ा-बहुत ज्ञान था। इन्होंने कविता की 99 पुस्तकें लिखीं जिनमें कई लाख शेर थे। पर अब इनके केवल 20-22 ग्रन्थ प्राप्य हैं। इन ग्रन्थों में किस्सा चाह दरवेश और खालिक बारी विशेष उल्लेखनीय हैं। इनका तुर्की- अरबी-फारसी और हिंदी का पर्यायकोश नामक ग्रन्थ बहुत प्रसिद्ध है। इन्होंने फारसी से कहीं अधिक हिंदी भाषा में लिखा है। इनके साहित्य में भी समय-समय पर प्रक्षेपों का समावेश होता रहा है। इनकी कुछ पहेलियाँमुकरियाँ और फुटकर गीत उपलब्ध होते हैं जिनसे इनकी विनोदी प्रकृति का भली-भाँति परिचय मिल जाता है। उदाहरणार्थ-

 

पहेली-

 एक थाल मोती से भरा सबके सिर पर औंधा धरा । 

चारों ओर वह थाली फिरेमोती उससे एक न गिरे। (आकाश)

 

दो 

सुखने-पान सड़ा क्योंघोड़ा अड़ा क्यों? (फेरा न था ) 

ढकोसला - 

खीर पकाई जतन से चर्खा दिया चला। 

आया कुत्ता खा गया बैठी तू ढोल बजा ।। 


इनकी मिली-जुली भाषा की ग़ज़ल का नमूना देखिए-जिसे मुकेश और सुधा मल्होत्रा ने अपने सुरीले सुर में प्रस्तुत किया है।

 

हाल मिस की मकुन तगाफुल दुराय नैना बनाय बतियाँ। 

किताबें हिज़ाँ नदारम जमाँ न लेहु काहे लगाय छतियाँ ।।

 

अमीर खुसरो की साहित्यिक देन - 

➽ अमीर खुसरो ने साहित्य के लिए एक नवीन मार्ग का अन्वेषण किया और वह था जीवन को संग्राम और आत्मानुशासन की सुदृढ़ और कठोर श्रृंखला से मुक्त करके आनन्द और विनोद के स्वच्छंद वायुमंडल में विहार करने की स्वतंत्रता देना। यही खुसरो की मौलिक विशेषता है। इनके साहित्य में हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रथम प्रयत्न है तथा उसमें भाषा संबंधी एकता का आदर्श भी उपस्थित किया गया है। आचार्य श्यामसुंदरदास का कहना है कि खुसरो के पूर्ववर्ती साहित्य में राजकीय मनोवृति है उसे जन-साहित्य नहीं कहा जा सकता किन्तु हम इनकी कविता में युग प्रवर्तक का आभास पाते हैं। इनके साहित्य से भाषाशास्त्र में प्रचलित एक मजेदार भ्रम का निवारण हो जाता हैवह यह कि हिंदी का जन्म उर्दू से नहीं हुआ बल्कि उर्दू तो हिंदी की एक शैली मात्र हैअतः इनके साहित्य का भाषा - विज्ञान की दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्व है। तत्कालीन सुल्तानों का इतिहास भी इनके साहित्य में सुरक्षित है। उनका फारसी भाषा में निबद्ध मसनवी खिजनामा इस दिशा में अत्यंत विश्वसनीय तथा महत्त्वपूर्ण है। खुसरो ने अपने समय की उन ऐतिहासिक घटनाओं का समावेश किया हैजो कि अन्य समसामयिक इतिहास ग्रन्थों में नहीं मिलती हैं। उनके ग्रन्थों के ऐतिहासिक हवाले अपेक्षाकृत अधिक विश्वसनीय हैं क्योंकि वे केवल समसामयिक ही नहीं थेबल्कि उन घटनाओं के स्वरूप निर्माण में उनका निजी योग भी है। उन्होंने केवल ऐतिहासिक घटनाओं का परंपरागत ब्यौरा मात्र ही प्रस्तुत नहीं किया है बल्कि तत्कालीन सांस्कृतिक परिस्थितियों का भी सजीव अंकन किया है।

 

➽ खुसरो प्रसिद्ध गवैये भी थे। ध्रुवपद के स्थान पर कौल या कव्वाली (काव्यावलि) बनाकर इन्होंने बहुत से नये राग निकाले थेजो अब तक प्रचलित हैं। कहा जाता है कि बीन को घटाकर इन्होंने सितार बनाया था। संगीतज्ञ होने के नाते इनके साहित्य में संगीतात्मकता की मात्रा भी दृष्टिगोचर होती है। इनमें उक्ति वैचित्र्य की प्रधानता है। आचार्य शुक्ल इनके साहित्य तथा भाषा के संबंध में लिखते हैं- "खुसरो के समय में बोलचाल की स्वाभाविक भाषा घिसकर बहुत कुछ उसी रूप में आ गई थी जिस रूप में खुसरो में मिलती है। कबीर की अपेक्षा खुसरो का ध्यान बोलचाल की भाषा की ओर अधिक रहा है। खुसरो का लक्ष्य जनता का मनोरंजन थापर कबीर धर्मोपदेशक थेअतः बानी पोथियों की भाषा का सहारा कुछ-न-कुछ खुसरो की अपेक्षा अधिक लिये हुए है।" डॉ. रामकुमार वर्मा इनके काव्य का विवेचन करते हुए लिखते हैं-" उसमें न तो हृदय की परिस्थितियों का चित्रण है और न कोई संदेश ही। वह केवल मनोरंजन की सामग्री है। जीवन की गंभीरता से ऊबकर कोई भी व्यक्ति उससे विनोद पा सकता है। पहेलियोंमुकरियों और सुखनों के द्वारा उन्होंने कौतूहल और विनोद की सृष्टि की है। कहीं-कहीं तो उस विनोद में अश्लीलता भी आ गई है। उन्होंने दरबारी वातावरण में रहकर चलती हुई बोली से हास्य की सृष्टि करते हुए हमारे हृदय को प्रसन्न करने की चेष्टा की है। खुसरो की कविता का उद्देश्य यहीं समाप्त हो जाता है। " आगे चलकर डॉ. वर्मा इनके संबंध में लिखते हैं-" चारणकालीन रक्तरंजित इतिहास में जब पश्चिम के चारणों की डिंगल कविता उद्धृत स्वरों में गूंज रही थी और उसकी प्रतिध्वनि और भी उग्र थीपूर्व में गोरखनाथ की गंभीर धार्मिक प्रवृत्ति आत्मशासन की शिक्षा दे रही थीउस काल में अमीर खुसरो की विनोदपूर्ण प्रकृति हिंदी साहित्य के इतिहास की एक महान् निधि हैं। मनोरंजन और रसिकता का अवतार यह कवि अमीर खुसरो अपनी मौलिकता के कारण सदैव स्मरणीय रहेगा। "

 

➽ मनोरंजन के खजाने से मालामाल सूफियों में अग्रणी कवि अमीर खुसरो ने अपनी सहज मनोवृत्ति के कारण जनसामान्य को उन्मुक्त हृदय से मालामाल कर दिया। अरबीफारसीतुर्कीब्रजभाषा और हिंदी में खड़ी बोली के सर्वप्रथम सफल प्रयोक्ता अमीर खुसरो द्वारा अनेक भाषाओं के सुखद मिश्रण को भाषा विज्ञानी भाषा संकर की संज्ञा देना चाहेंगे किन्तु इनके द्वारा प्रणीत ग़ज़लों (गायक व गायिका स्व. मुकेश व मधुर स्वर-संपन्न सुधा मल्होत्रा) के शृंगारात्मक ताने-बाने में फारसी और ब्रजभाषा के मणिकांचन योग से निश्चय से एक ऐतिहासिक तथ्य ध्वनित होता है कि भारत जैसे भाषा - बहुल देश में प्रकृति द्वारा अनेकविध भौगोलिक वातावरण में पुष्ट भाषाएँ भी सौहार्द्र और समरसता को सहेजकर सर्वदा सौंदर्य विद्यायिनी हो सकती हैं।

 

➽ खुसरो सर्वतोमुखी प्रतिभाशाली कवि एवं साहित्य और संगीत के क्षेत्रों में एक सर्वथा समर्थ आविष्कर्ता थे। विचित्र वीणा से सितारमृदंगम से तबला के सुधी स्रष्टा तथा परम संगीतज्ञ की अमर रचना- " मैं पग में घुंघरू बांधमिलन चली पिया को कि घुंघरू टूट गये। कव्वालियों (काव्य अवलियों) के प्रणेता एवं आशु कवित्व के महनीय गुणों से संपन्न सुखरो का महिमाशाली व्यक्तित्व और कृतित्व हिंदी साहित्य में सदा अविस्मरणीय रहेंगे। " उनकी एक चुलबुल मुर्की या मुकरी का नमूना द्रष्टव्य है

 

वह आये तो शादी होयउस बिन दूजा और न कोय। 

मीठे लागे वाके बोलक्यों सखि साजन न सखी ढोल ।।

 

उनकी कृति खलक बारी (शब्दकोश) तुर्कीअरबीफारसी और हिंदी भाषाओं का पर्यायवाची कोश भाषा विज्ञान के तुलनात्मक क्षेत्र में एक विशिष्ट योगदान के रूप में उल्लेखनीय रहेगा।

 

 खुसरो के व्यक्तित्व और कृतित्व से एक बड़ा मजेदार तथ्य उजागर हो जाता है कि हिंदी की प्रकृति व स्वभाव आरंभ से ही सांप्रदायिकता की भावना से सर्वथा मुक्त रहे हैं और सामाजिक संस्कृति का यही तकाजा था। यद्यपि खुसरो का राजदरबारों से संबद्ध साहित्य फारसी भाषा में प्रणीत हुआ हैजहाँ कवि ने हिन्दू-मुसलमानों के संप्रदायों के साक्षात् द्वन्द्व व कलह का वर्णन किया हैवहाँ भी दोनों जातियों के वीर योद्धाओं का संग्राम चित्रित हुआ है। उसमें किसी जाति अथवा संप्रदाय के प्रति वैमनस्यघृणा या द्वेष को भड़काने का प्रयास लक्षित नहीं होता है।

 

 जयचन्द प्रकाश तथा जसमयंक जसचन्द्रिका- 

➽ ये दोनों रचनाएँ अभी तक प्राप्त नहीं हुई हैं। इनकी चर्चा केवल 'राठौड़ा री ख्यातमें मिलती है। प्रथम रचना के लेखक केदार नामक कवि बताए जाते हैं। इस महाकाव्य में महाराज जयचन्द के पराक्रम और प्रताप का वर्णन था। जसमयंक जसचन्द्रिका के लेखक मधुकर कवि बताए जाते हैं। दोनों ग्रन्थों की विषयवस्तु मिलती-जुलती है। सुना जाता है कि दयालदास ने इन्हीं रचनाओं के आधार पर कन्नौज का वृत्तान्त लिखा था। अतः किसी समय में इन ग्रन्थों का अस्तित्व अवश्य था ।

 बसंत विलास


 बसंत विलास का रचयिता अभी तक अज्ञात है। डॉ. माताप्रसाद गुप्त ने अनेक प्रमाणों के आधार पर इस रचना का समय ईसा की तेरहवीं सदी निर्धारित किया है। यद्यपि इसमें चौरासी दोहे हैं किन्तु उनमें कामिनियों के प्रेमी जीवन पर बसंत और उसके मादक प्रभाव का चित्रण किया गया है। इस ग्रन्थ में स्त्री-पुरुष और प्रकृति तीनों में प्रवाहमान अजस्त्र मदोन्मत्तता का जैसा स्वरूप मिलता है वैसा रीतिकालीन श्रृंगारी कवि में भी नहीं मिलता है। इसमें कालिदास के ऋतु संहार तथा हाल की गाथा सतसई की परंपरा को निभाया गया है और राउलबेल की श्रृंगार परंपरा को चरम सीमा पर पहुँचा दिया गया है। उदाहरणार्थ

 

इणि परि कोइलि कूजड़ पूजइँ युवति मजोर ।। 

विधुर वियोगिनि धूजई कूजई मयण किसोर ||

 

एक ओर हृदय को सालता हुआ कोयल का कूजन और दूसरी ओर पति संयुक्ताओं का विलासमय कामपूजन वियोगिनी विधुर प्रेमदाओं को कंपायमान कर देते हैं और वे मनोज की मधुर अनुभूति करने लगती हैं। भक्ति और रीतिकालीन श्रृंगारी प्रवृत्ति के अध्ययन के लिए यह रचना अतीव उपयोगी है। हिंदी भाषा के क्रमिक विकास की दृष्टि से भी यह रचना उपादेय है।

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