व्यक्ति, समाज और शिक्षा | व्यक्तित्व का स्वरूप| Individual, Society and Education

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व्यक्ति, समाज और शिक्षा

व्यक्ति, समाज और शिक्षा | व्यक्तित्व का स्वरूप| Individual, Society and Education


 

व्यक्तिसमाज और शिक्षा

  • पचास-साठ वर्ष पूर्व स्कूलों में तीन वर्ष तक 'हमारे पूर्वज' नाम का एक पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता था । देश नया नया स्वतन्त्र हुआ था । पाठ्यक्रम का उद्देश्य था कि आने वाली पीढ़ी के चरित्र निर्माण की बुनियाद डाली जाय । पचास वर्ष के बाद दृश्य है कि पिछले कई वर्षों से हम प्रयासरत हैं कि उच्च और तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रमों में 'मूल्यपरक शिक्षा' या value education का अनिवार्य रूप से समावेश हो सके।

 

  • हमारी चिन्ता स्पष्ट है कि हम डॉक्टर और इन्जीनियर तो थोक के भाव से पैदा किए जा रहे हैं, मगर वर्तमान पीढ़ी में मूल्यों का अभाव बढ़ता ही जा रहा है।

 

  • आये दिन अखबार में छपता है कि बाबू - अफसर- नेताओं के यहाँ छापे पड़ रहें हैं और अकूत धन-सम्पदा पकड़ी जा रही है। समाज की ऐसी स्थिति वास्तव में चिन्ताजनक है। प्रश्न उठता है कि व्यक्ति भ्रष्ट हो गया है, या व्यवस्था और समाज, या तीनों । गौर से देखने पर पता चलता है कि तीनों अभिन्न रूप से एक ही हैं, अलग अलग नहीं । व्यक्ति से ही समाज बनता है, तथा व्यक्ति और समाज ही मिलकर व्यवस्था का निर्माण करते हैं। देखें तो तीनों के मूल में व्यक्ति ही है। इसलिए सुधार लाना है तो सुधार की प्रक्रिया व्यक्ति से ही प्रारम्भ करनी होगी। वैसे भी हम दूसरों को कभी भी नहीं सुधार सकते, हाँ स्वयं में परिवर्तन लाने का सार्थक प्रयास अवश्य कर सकते हैं।

 

  • जर्मन दार्शनिक फिश्ट ने समझाया कि बिना सही शिक्षा के व्यक्ति में सही संस्कार नहीं पड़ सकते, और बिना सही संस्कारों के वह अपनी शुद्ध अन्तश्चेतना की आवाज नहीं सुन सकता | पाश्चात्य विचारकों ने यह भी बार बार कहा है कि व्यक्ति के पापमार्गी होने के पीछे एक ही कारण है विवेक और ज्ञान की कमी। सृष्टि का कोई भी घटक या सृष्टि अपनी सम्पूर्णता में मूलतः पापाचारी नहीं है। मूल्यों का ह्रास व्यक्ति और समाज की रुग्णावस्था है। और रोगी को औषधि चाहिए। आपने पढ़ा कि ज्ञान और शिक्षा ही वह औषधि है। इसीलिए भारत सरकार निरन्तर मूल्यपरक शिक्षा पर जोर दे रही है।

 

व्यक्तित्व का स्वरूप

 

  • आपने पढ़ा कि व्यक्ति वही करता है जो उसे सही लगता है, और 'सही' का निर्णय वह अपनी समझ के अनुसार करता है। उसकी यह समझ, जिसे हम विवेक भी कह सकते हैं, उसके ज्ञान, उसके बोध के अनुरूप होती है। यह ज्ञान और बोध ही किसी व्यक्ति को औरों से भिन्न बनाता है। यही उसकी पहचान है। यही उसके व्यक्तित्व का आधार है। कहा गया है कि ज्ञान- ज्ञानी - ज्ञेय अभिन्न रूप से एक हैं। मेरा उतना ही विस्तार है जितना मेरा ज्ञान है। छोटा ज्ञान- छोटा आदमीय बड़ा ज्ञान- बड़ा आदमी; महत् का ज्ञान हो जाय, तो फिर आदमी नहीं महात्मा ब्रह्म का ज्ञान हो तो मैं ब्रह्म हूँ, शिव का ज्ञान हो तो मैं शिव हूँ। फिश्ट इसीलिए कहते हैं कि निरन्तर ज्ञान का विस्तार ही मेरा कर्तव्य है।

 

  • उपनिषद् कहता है, 'मनः प्राण शरीर नेता' मनुष्य मन, प्राण और शरीर की तीन भूमियों पर एक साथ वास करता है। मन शब्द अंग्रेजी के 'माइन्ड' का समानार्थी है। मन से मनुष्य बना है, और माइन्ड से मैन। मन नेता है, पथ प्रदर्शक है। प्राण और शरीर उसके अनुयायी हैं। इसलिए प्राण और शरीर के दोष मूलतः मन के दोष हैं। इच्छा और संकल्प प्राणिक हैं। उनकी कालिमा, उनके दोष मन के अन्धकार के कारण हैं। इसीलिए पाश्चात्य दृष्टि बार बार कहती है कि मनुष्य के अशुभ कर्म, उसके पापाचार उसकी त्रुटिपूर्ण संकल्पशक्ति (defective Will) के कारण हैं।

 

  • व्यक्तित्व के विकास को समझने के लिए जीवन के विकास क्रम को देखना होगा। सबसे पहले आधार रूप में शरीर है। जन्म के समय मनुष्य में प्राणिक शक्ति न्यूनतम है। बाल्यावस्था में उसे केवल भूख-प्यास का बोध रहता है। इससे मिलती जुलती या इससे थोड़ा सा आगे की अवस्था अधिकांश जानवरों की है। उन्हें भूख-प्यास, मैथुन, भय और आत्मरक्षा का बोध है। मनुष्य में मन के विस्तार के साथ उसके प्राणिक जगत का विस्तार होता है। बच्चा बड़ा होता है तो उसमें वस्त्र और भोजन आदि के चयन की क्षमता विकसित होती है। उसे लाल कपड़ा पसन्द आता है, जलेबी अच्छी लगती है। थोड़ा और बड़ा होने पर धन की, पद-प्रतिष्ठा की, अच्छे जीवनसाथी की इच्छा होती है। परन्तु अब भी यह सारा का सारा विकास प्राणिक है। प्राण का संसार बड़ा हो रहा है। वह अब एक विशिष्ट जानवर हो गया है । परन्तु उसे अभी मनुष्य बनना शेष है।

 

  • 'साहित्यसंगीतकला विहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः' । साहित्य, संगीत, कला की यात्रा मन के विकास की यात्रा है, मनुष्य बनने की यात्रा है। साहित्य पुस्तकों का, विचारों का, ज्ञान का संसार है। इसमें प्रवेश के साथ ही बुद्धि और विवेक का विकास प्रारम्भ होता है; सत् और असत्, शुभ और अशुभ का भेद करने की दृष्टि खुलती है। प्रारम्भ में व्यक्ति मोहमयी माया की अविद्या के संसार का ज्ञान प्राप्त करता है, ताकि जीवनयापन सम्भव हो सके यथा, वाणिज्य, अर्थ, राजनीति, समाजादि शास्त्र । यह - साइंस, टेक्नॉलजी, राजा और पूँजीपतियों के भौतिक जगत पर आधिपत्य का संसार है। कठोपनिषद् का मन्त्र है 'न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः वित्त से मनुष्य का तर्पण नहीं हो सकता; उसके लिए गंगाजल चाहिए, गौदान चाहिए। वैदिक साहित्य में गौ का अर्थ ज्ञान की रश्मि है। इसलिए इसके आगे की यात्रा मनुष्य के श्रेष्ठत्व की अविद्या से सर्वथा भिन्न विद्या की यात्रा है मनीषी, विचारक, कवि और ऋषिमार्गी यात्रा । प्लेटो मानते हैं कि भौतिक जगत से परे शाश्वत, सुन्दर, दिव्य ज्ञान के ध्यान की प्राप्ति मनुष्य के लिए उसकी श्रेष्ठतम उपलब्धि है। इसके आगे कुछ शेष नहीं है। बुद्ध और ईसा मानवता का शिखर हैं, न कि सिकन्दर ।

 

रूपान्तरण की संकल्पना

 

  • कैटरपिलर से तितली बन जाना रूपान्तरण है। बिना पूँछ और सींग वाले पशु से मनुष्य बन जाना रूपान्तरण है। रत्नाकर डाकू का कवि वाल्मीकि बन जाना रूपान्तरण है। परन्तु यह रूपान्तरण है क्या, और घटित कैसे होता है? अगले खण्ड में आप श्री अरविन्द के बारे में पढ़ेंगे। श्री अरविन्द की तपस्या सम्पूर्ण सृष्टि के रुपान्तरण के लिए थी, तथा मानव जगत के रूपान्तरण के विषय में उन्होंने अत्यन्त विस्तार से लिखा है।

 

  • परन्तु इस इकाई में यहाँ हमारा प्रयोजन उस व्यावहारिक जगत के बदलाव से है जहाँ दिन-ब-दिन खून-खराबा, हत्या - बलात्कार, चोरी-डकैती, छल-प्रपञ्च और भ्रष्टाचार की घटनाएं बढ़ती ही जा रहीं हैं। हमारा प्रयोजन उस विश्व से है जो दो बार विश्वयुद्ध लड़ चुका है, और आज उसके सामरिक आयोजनों से लगता है कि जैसे तीसरे विश्वयुद्ध की तैयारी चल रही हो। इस रोजमर्रा की जिन्दगी में क्या किसी परिवर्तन की सम्भावना है?

 

1 व्यक्तित्व संरचना का वर्तमान

 

  • रुपान्तरण बिन्दु क से बिन्दु ख तक, वर्तमान से भविष्य तक वास्तविक से आदर्श तक की यात्रा है। परिवर्तन जो है उसी का संशोधित संस्करण है, सॉफ्टवेयर अपडेट है। सरकारी नियमों में बदलाव, नये प्रधानमन्त्री या मुख्यमन्त्री द्वारा व्यवस्था में बदलाव, तथाकथित श्वेत क्रान्ति, हरित क्रान्ति, या लाल-पीली क्रान्ति परिवर्तन की श्रेणी में आते हैं। रूपान्तरण में किसी व्यवस्था का जो मूल है, जड़ है, उसे - यह सभी सम्पूर्ण रूप में विनष्ट कर दिया जाता है, और उसकी जगह नये तत्व का प्रत्यारोपण होता है। किसी इमारत को उसकी बुनियाद से उखाड़ कर उसकी जगह नयी इमारत का निर्माण रूपान्तरण है।

 

  • यह बिन्दु क क्या है जहाँ से हमें शुरुआत करनी है? यह कैसा वर्तमान है जिससे हम सर्वथा मुक्त होना चाहते हैं? यह कौन सी इमारत है जिसे नेस्तनाबूद करना आवश्यक हो गया है? शॉपनहावर ने किसी अन्य प्रसंग में संसार की दुष्टता (wickedness) पर चिन्तन-मनन करने का सुझाव दिया है। हमने देखा कि मूल्य ह्रास के कारण व्यक्ति और समाज दोनों ही रुग्ण हो चुके हैं। हमने यह भी समझ लिया है कि चूँकि व्यक्ति सामाजिक संरचना की मूल इकाई है, इसलिए प्रमुख रूप से हमें व्यक्ति के ही मूल्य ह्रास पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

 

  • जब हम अपने जैसे सामान्य व्यक्ति की वर्तमान संरचना को देखते हैं, तो पाते हैं कि वह अनेक प्रकार से तमाम समस्याओं और अवगुणों से घिरा है। हम शारीरिक, प्राणिक और मानसिक हर तरफ से दुर्बल हैं। अनगिनत बीमारियाँ, दवाइयाँ, अस्पताल तथा इस बीमार शरीर की असीमित चिन्ता, और इन सब के मूल में मृत्यु के भय ने हमारी सुख-शान्ति, धन, समय, सब कुछ छीन लिया है। क्या हमेशा से ऐसा ही रहा है, या मूल्यों से विपन्न हमारे कालखण्ड की यह विशेष देन है, जिसमें लालची अस्पतालों और दवा - उद्योग का विशेष योगदान है? अन्य जीव-जन्तु भी अवश्य बीमार पड़ते हैं, मगर इतना तो नहीं जितना आज का मनुष्य । प्राकृतिक आपदाओं से भी शरीर को खतरा रहता है, मगर उतना नहीं जितना जल-थल - वायु की मार्ग दुर्घटनाओं या आये दिन के बम विस्फोट या गोली बारूद से। प्रकृति से अधिक मानव सभ्यता ही खतरनाक हो गयी है। प्राणिक दुर्बलता है कि हम चाहते कुछ हैं, पाते कुछ और ही हैं। जो पाना चाहते हैं, उसे प्राप्त करने की क्षमता नहीं है। मानसिक दुर्बलता इतनी कि यही नहीं मालूम कि बी.ए. के बाद कौन सी पढ़ाई की जाय। कोई भी समस्या आती है तो या तो पिताजी से पूछिए या भाईसाहब से, अन्यथा प्रोफेशनल परामर्शदाताओं, मनोवैज्ञानिकों, बाबा, ओझा या ज्योतिषियों के चक्कर लगाइए। शायद कहीं से सुराग मिल जाय कि बी. ए. के बाद क्या करना चाहिए।

 

  • यह तो शरीर, प्राण और मन की नैसर्गिक दुर्बलता रही, ऊपर से अनगिनत अवगुण, दुर्गुण और चारित्रिक दोष चोरी करना, झूठ बोलना, चुगली और चमचागीरी करना,ईर्ष्या, कपट, लालच, क्रोध और न जाने क्या क्या । पूर्ववर्ती इकाई में तो पितामह भीष्म ने तेरह प्रमुख दोषों की गणना की थी, मगर यहाँ तो कौरवों की तरह यह सैकड़ा की संख्या में दिखते हैं। महात्मा मूसा ने भी इनमें से कइयों से बचने के लिए आगाह किया था, मगर बच कौन पाता है? मूसा के चेले अगर बच पाते तो आज उनके समाज की वह हालत नहीं होती जो है ।

 

  • शायद युधिष्ठिर और कृष्ण से ज्यादा बुद्धिमान दुर्योधन था। ठीक ही तो कहा था उसने – 'जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः । जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः ।' ऐसा नहीं कि धर्म तथा अधर्म क्या है यह मैं नहीं जानता। परन्तु ऐसा होने पर भी धर्म के मार्ग पर चलना मेरी प्रवृत्ति नहीं बन पायी और न ही अधर्म के मार्ग से मैं निवृत्त हो सका। ऐसी परिस्थितियों में बजाय भीष्म और युधिष्ठिर के मैं अपने को दुर्योधन के अधिक निकट पाता हूँ। क्या मेरे उद्धार का कोई मार्ग नहीं है ?

 

2 व्यक्तित्व के आदर्श रूपान्तरण का मार्ग

 

  • सातवीं इकाई में हमने पढ़ा कि धर्मकाया दस गुणों से मिलकर बनी है। ये दस - यश, सत्य, दम, शौच, सरलता, लज्जा, अचञ्चलता, दान, तप और ब्रह्मचर्य । गुण हैं इन्हीं गुणों में धर्मप्राप्ति का मार्ग भी निहित है। पाश्चात्य दर्शन की विवेचना है कि ज्ञान ही मनुष्य के लिए परमोच्च शुभ कर्म है; इसी में उसकी मुक्ति है, इसी में परम आनन्द है। मनुष्य अपने मूल रूप में शिव है, कल्याणकारी है; क्योंकि परमसत्ता मूल रूप में कल्याणकारी है, और व्यक्ति उसी परमसत्ता का अंश है। घोर तामसिक अज्ञान के कारण ही वह अपने को दुर्योधन मान बैठा है। अज्ञान का अँधेरा दूर होते ही दुर्योधन की सत्ता समाप्त हो जाती है, और धर्मपुत्र के रूप में व्यक्ति को अपने सच्चे स्वरूप का बोध प्रकट होता है। अरस्तू सहित अधिकांश पाश्चात्य विचारकों का मत है कि आत्मबोध ही व्यक्ति की श्रेष्ठतम परिणति है। अक्वाइनस कहते हैं कि परमसत्ता का बोध होते ही आप परमसत्ता के स्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं - "They are most like God who know God as God knows himself' | 

 

  • रूपान्तर को व्याख्यायित करते समय आपने देखा कि किसी सत्ता या व्यवस्था के केन्द्र में जो आधार है हमें उसे बदलना होगा। हमारे वर्तमान व्यक्तित्व के केन्द्र में 'मैं' है, जिसे अहंकार, ईगो या सेल्फ ( ego, self) के नाम से भी जाना जाता है। इसकी उत्पत्ति के विषय में हमें बाइबल में एक बड़ी रोचक कथा मिलती है। ऐडम और ईव, जिन्हें आदम और हव्वा भी कहते हैं, स्वर्ग में ईश्वर के बनाये हुए बागीचे ईडन में पूरी स्वतन्त्रता से सुख, शान्ति और आनन्द के साथ रह रहे थे। बस उस बागीचे में एक फल था जिसे खाने के लिए उन्हें मना किया गया था। यहाँ पर कथा में खलनायक शैतान का प्रवेश होता है। शैतान ने बार बार ऐडम को बहला फुसला कर समझाने की कोशिश की कि इस फल को एक बार अवश्य चखना चाहिए। मगर ऐडम दृढ़ बना रहा कि जब परमपिता प्रभु ने ऐसा करने से मना किया है, तो ऐसा नहीं हो सकता - वह फल नहीं चखेगा। शैतान की दाल जब ऐडम के पास नहीं गली, तो वह ईव के पास पहुँचा। ईव को फुसलाने में अधिक समय नहीं लगा। अब ईव ऐडम के सिर पर सवार हो गयीं कि 'कुछ भी हो, यह फल तोड़ कर लाओ, हमें इसे चखना ही है। ऐडम ने लाख समझाने की कोशिश की लेकिन ईव टस से मस नहीं हुयीं। बेचारे ऐडम के पास चारा भी क्या था । वह फल तोड़ कर लाया और दोनों ने उसे मिलकर चखा । वह ज्ञान का फल (fruit of knowledge ) था । फल चखने के बाद उन दोनों को पहला बोध हुआ कि वे पुरुष और स्त्री हैं और नग्नावस्था में हैं। तभी परमप्रभु टहलते हुए आए और देखा कि ऐडम का कहीं अतापता नहीं है। आवाज देने पर ऐडम ने दूर से जवाब दिया 'प्रभु मैं नंगा हूँ, इसलिए झाड़ी के पीछे छुपा हूँ। इस अवज्ञा के दण्ड स्वरूप ईश्वर ने दोनों को स्वर्ग से निष्कासित कर धरती पर भेज दिया। इसके बाद दोनों ने बच्चे पैदा किए, और उनकी सन्ततियों को आज तक उस पहले पाप (Original Sin) का दण्ड भुगतना पड़ता है।

 

  • इस भेद बुद्धि मैं पुरुष हूँ, मैं स्त्री हूँ में 'मैं' की उत्पत्ति है। जितनी बार - हम स्वयं को परिभाषित करने का प्रयास करते हैं मैं गोरा हूँ, मैं काला हूँ, मैं बुद्धिमान हूँ, मैं मूर्ख हूँ, मैं हिन्दू हूँ, मैं इसाई हूँ, मैं भारतीय हूँ, मैं नेपाली हूँ, आदि आदि उतनी बार हम अपने चारों ओर अपने कारागार की दीवाल पर एक नई ईंट रख देते हैं। फिर एक समय आता है जब इस कारागार में हमारा दम घुटने लगता है, और हम मुक्ति के लिए चिल्लाना शुरू करते हैं। भारतीय परम्परा में इस भेद- बुद्धि को अविद्या कहा गया है, और अहंकार को धृतराष्ट्र की संज्ञा दी गयी है। धृतराष्ट्र ने राष्ट्र को धृत कर, छीन कर उस पर अनीतिपूर्वक अवैध कब्जा कर रखा है। गीता का प्रारम्भ होता है ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे..' जो धर्म का क्षेत्र था, वह कुरु, यानि इच्छाओं का क्षेत्र हो - गया है। जिस धर्मक्षेत्र अन्तश्चेतना पर आत्मा का शासन होना चाहिए था, वहाँ दृष्टिहीन अज्ञानी धृतराष्ट्र बैठ गया है।

 

  • आपने देखा कि स्वयं पितामह भीष्म ने कहा कि सभी तेरह के तेरह चारित्रिक दोष धृतराष्ट्र के पुत्रों में उपस्थित हैं। रूपान्तरण सिद्ध करने के लिए धृतराष्ट्र को गद्दी से हटा कर वहाँ आत्मा का धर्म का शासन पुनस्थापित करना होगा। मार्ग बहुत सीधा है; कहीं से भी घुमावदार या उलझा हुआ नहीं है । परन्तु कठिन अवश्य है 'क्षुरस्य - धारा निशिता दुरत्यया दुर्गंपथस्तत्कवयो वदन्ति ।' इतना मुश्किल रास्ता, कि जैसे तलवार पर चलना हो सावधानी हटी, और दुर्घटना घटी। एक प्राचीन ग्रन्थ में गुरू शिष्य को - आगाह करता है कि इस मार्ग में तीन प्रमुख संकट हैं पक्षाघात, विक्षिप्तता एवं मृत्यु । आपने क्या समझा, कि मुकदमा दायर करने से या हुर्र कहने से धृतराष्ट्र गद्दी छोड़ कर भाग जायेगा ?

 

  • कुछ पहले हमने शारीरिक, प्राणिक और मानसिक दुर्बलता की बात की थी । इसके पीछे भी यही कारण है। सारी शक्ति आत्मा की है। महाशक्ति प्रभु की संगिनी हैं। आत्मबल ही एकमात्र बल है । परन्तु हम तो धृतराष्ट्र पुत्र हो चुके हैं, शक्ति की स्रोत आत्मा से हमारा विच्छेद हो चुका है । हमारी दुर्बलता का यही मूल कारण है । 

  • लेकिन यदि हमने रूपान्तरण की ठान ली है, तो यह भी जान लें कि किस किस तरह से धृतराष्ट्र को घेरा जा सकता है। भारतीय और पाश्चात्य परम्परा का अध्ययन करने से पता चलता है कि मुख्य रूप से दो या तीन रास्ते हैं। आइए, इन्हें कुछ विस्तार से समझते हैं।

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