धृतराष्ट्र एवं दुर्योधन- मूल्यह्रास से रुग्ण, अधर्मी व्यक्तित्व का स्वरूप | Dhrat Rashtra Aur Duryodhan

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मूल्यह्रास से रुग्ण, अधर्मी व्यक्तित्व का स्वरूप - पिता-पुत्र धृतराष्ट्र एवं दुर्योधन

धृतराष्ट्र एवं दुर्योधन- मूल्यह्रास से रुग्ण, अधर्मी व्यक्तित्व का स्वरूप  | Dhrat Rashtra Aur Duryodhan
 

मूल्यह्रास से रुग्णअधर्मी व्यक्तित्व का स्वरूप - पिता-पुत्र धृतराष्ट्र एवं दुर्योधन

  • धृतराष्ट्र जन्म से अन्धे हैं, इसलिए राजगद्दी के अधिकारी नहीं हैं। गान्धारी से उनके विवाह की प्रक्रिया में कपट विद्यमान है। दृष्टिहीनता और राजा न बन पाने के कारण अपने अभागे होने का दंश वे प्रारम्भ से ही भोग रहे हैं। अत्यन्त मुश्किलों से जब सन्तान की प्राप्ति होती है, तो वे पुत्रमोह में इस तरह उलझ जाते हैं कि सन्तान के स्वर्णिम भविष्य के अतिरिक्त उन्हें कुछ और सूझता ही नहीं है। नाम धृतराष्ट्र है, यानि वह जिसने राष्ट्र पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया हो । ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन कुछ ऐसा, जैसे एक तो करेला दूजे नीमचढ़। पिताश्री अन्धे हैं, इसलिए उनसे मार्गदर्शन प्राप्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसे में मार्गदर्शन की जिम्मेदारी कुटिल मामा शकुनि पर आ पड़ती है। दुर्योधन को पिता की अवरुद्ध महत्वाकांक्षा और मामा की कुटिलता विरासता में मिली है।

 

  • पिता की मृत्यु के पश्चात जब जंगल से पाण्डु के बालपुत्र अपनी माँ कुन्ती के साथ हस्तिनापुर वापस लौटते हैं, उसी समय महात्मा व्यास महारानी सत्यवती को भविष्य का संकेत देते हुए कहते हैं माँ, अब सुख के दिन बीत गये। बड़ा भयंकर समय उपस्थित होने वाला है। उत्तरोत्तर बुरे दिन आ रहे हैं। पृथ्वी की जवानी चली गयी। अब ऐसा भयंकर समय आयेगा, जिसमें सब ओर छल-कपट और माया का बोलबाला होगा। संसार में अनेक प्रकार के दोष प्रकट होंगे और धर्मकर्म तथा सदाचार का लोप हो जायगा । ३ कौरवों का साम्राज्य समाप्त हो जायेगा, इसलिए अपने कुल का भयंकर संहार देखने के पहले ही आप सबकुछ त्याग कर तपोवन के लिए प्रस्थान करें ।

 

अतिक्रान्तसुखाः कालाः पर्युपस्थितदारुणाः ।

श्वः श्वः पापिष्ठदिवसाः पृथिवी गतयौवना।। 

बहुमायासमाकीर्णो नानादोषसमाकुलः । 

लुप्तधर्मक्रियाचारो घोरः कालो भविष्यति।।

 

महाभारत के इसी अध्याय (आदिपर्व १२७) में आगे बालक दुर्योधन के चरित्र का वर्णन है-

 

वह सदा धर्म से दूर रहता और पापकर्मों पर ही दृष्टि रखता था । मोह और ऐश्वर्य के लोभ से उसके मन में पापपूर्ण विचार भर गये थे ।

 

तस्य धर्मादपेतस्य पापानि परिपश्यतः । 

मोहादैश्वर्यलोभाच्च पापा मतिरजायत ।।

 

  • अध्याय के अन्त बालक दुर्योधन के प्रथम कृत्य की कथा मिलती है। भीम की हत्या करने के उद्देश्य से दुर्योधन ने पाण्डुपुत्रों को गंगातट पर विशेष रूप से निर्मित गृह में जलक्रीड़ा के लिए आमन्त्रित किया । वहाँ उसने भीम के भोजन में कालकूट नामक विष डलवा दिया। और फिर प्रेम का पाखण्ड करते हुए उसने अपने हाथों से भीम को भरपेट भोजन कराया। विष के प्रभाव से जब भीम बेहोशी की निद्रा में चले गये, तो उन्हें बाँधकर उसने नदी में बहा दिया। भीम की हत्या करने में तो वह सफल नहीं हुआ, लेकिन इस कथा में दुर्योधन का छलकपट, धूर्तता और पाप पूर्णतः परिलक्षित है। भ्रातृवध का घोर पाप दुर्योधन से औरंगजेब तक एक कालखण्ड के पतन का परिचायक है। 

 

  • दुर्योधन के पापों की शेष कथा आप सब ने सुन रखी है, या टीवी पर तो अवश्य देखी होगी जुए के खेल का प्रपंच, द्रौपदी का चीरहरण, कृष्ण की मध्यस्थता के बावजूद दुर्योधन का एक अंगुल भी जमीन पाण्डवों को देने से इन्कार, युद्ध और विशाल नरसंहार । धृतराष्ट्र और दुर्योधन की कथा यहाँ प्राक्कथन के रूप में दी गयी है ।

 

धृतराष्ट्र और दुर्योधन के व्यक्तित्व दोषों का स्वरूप क्या है,

  • अब हमें पुनः लौटना होगा यह देखने के लिए कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन के व्यक्तित्व के इन दोषों का स्वरूप क्या है, और उनकी उत्पत्ति कहाँ है। जिस प्रकार प्रकाश के क्षीण होने से अन्धकार की वृद्धि होती है, ठीक उसी प्रकार धर्म के क्षीण होने से अधर्म की वृद्धि होती है। अधर्म का स्वयं में कोई अस्तित्व नहीं है, वह केवल धर्म का अभाव है। यक्ष- युधिष्ठिर सम्वाद पुनः पुनः इस तथ्य की पुष्टि करता है। उदाहरण के लिए, युधिष्ठिर का कथन है कि धर्मविषयक मूढत्व या मूर्खता ही मोह का मूल है (मोहो हि धर्ममूढत्वम्) तथा धर्म की निष्क्रियता ही आलस्य (धर्मनिष्क्रियताऽऽलस्यम्) का कारण है. 

 

  • शरीर में जब अधर्म बढ़ता है, यानि हम शरीर का धर्म जैसे खेलना कूदना, दौड़ना भागना छोड़ कर हर समय कुर्सी पर बैठे रहते हैं, तो मधुमेह, रक्तचाप, हृदयरोग जैसे दोष जन्म लेते हैं। ठीक इसी तरह जब व्यक्ति या समाज में अधर्म की वृद्धि होती है, तो अनेक दोषों की उत्पत्ति होती है।

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