सबीज समाधि क्या होती है |सबीज समाधि के छः भेद | Sabeej Samadhi Kya Hai Iske Prakar

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सबीज समाधि क्या होती है , सबीज समाधि के छः भेद

सबीज समाधि क्या होती है |सबीज समाधि के छः भेद | Sabeej Samadhi Kya Hai Iske Prakar


सबीज समाधि

पूर्वोक्त वर्णित समापत्तियों के पूर्ण हो जाने पर अर्थात निर्विचारा समापत्ति के पूर्ण हो जाने पर चित्त जिस स्थिति में पहुंचता है वह 'सबीज समाधिहै। दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कह सकते है कि समापत्तियों की प्रक्रियाओं का अन्तिम परिणाम सबीज समाधि की स्थिति में पहुॅचना हैअतः यह भी स्पष्ट हो जाता हैकि समापत्ति और समाधि एक नहीं है। इन दोनो का निकट संबंध है। समापत्ति चलती रहने वाली प्रक्रिया का नाम हैतत्पश्चात कुछ समय तक स्थिर रहने वाली चित्त की अवस्था आती है। जिसे सबीज समाधि नाम दिया गया है। यह भी स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि सबीज समाधि को छोड़ कर अन्य समाधियों के लिए इस प्रकार की कोई पूर्व समापत्तियाँ नहीं होती हैं। 

सूत्रकार महर्षि पतंजलि उक्त समापत्तियों को सबीजत्व प्रदान करते हुए कहा हैकि :

 

"ता एव सबीजः समाधिः ।। "

 

पूर्वोक्त चारों समापत्तियाँ ही सबीज समाधि कहलाती हैं।

 

  • बाह्य अनात्म वस्तु अर्थात कार्य सहित प्रकृति जो ग्राह्य ग्रहण और ग्रहीतृ रूप दृश्य वर्ग हैइसी का नाम बीज या आलम्बन (आश्रय) है। इसलिए इसको लेकर होने वाली समाधि का नाम सबीजसालम्बन तथा सम्प्रज्ञात समाधि है।

 

  • ये समापत्तियाँ सबीज समाधि कहलाती हैं क्योंकि सवितर्क और निर्वितर्क समापत्ति तो स्थूल ग्राह्य वस्तु के आलम्बन सहित होती है। सविचार तथा निर्विचार सूक्ष्म ग्राह्य वस्तु के बीज या आलम्बन सहित होती है।

 

सबीज समाधि के छः भेद

पूर्व में वर्णित आनन्दानुगत ग्रहणरूप और अस्मितानुगत ग्रहीतृरूप दोनों समाधियाँ निर्विचार समापत्ति के क्रम से उच्चतर और उच्चतम अवस्थाओं के रूप से निर्विचार समापत्ति के ही अन्तर्गत इस सूत्र में कर दी गई है। निर्विचार की इन दोनों उच्चतर और उच्चतम अवस्थाओं को पृथक-पृथक रूप से सम्मिलित करने से सबीज समाधि के छः भेद होते है:

 

1. सवितर्क समापत्ति :- 

  • स्थूल पदार्थों में शब्दअर्थ और ज्ञान के विकल्पों से युक्त भासने वाली चित्तवृत्ति ।

 

2. निर्वितर्क समापत्ति :- 

  • स्थूल पदार्थों में शब्द (नाम अर्थ (रूप) और ज्ञानके विकल्पों से रहित स्वरूप से शून्य जैसी केवल अर्थ मात्र से भासने वाली चित्तवृत्ति . 


3. सविचार समापत्ति :- 

  • सूक्ष्म विषयों में देश काल और निमित्त (धर्म) के विकल्पों से रहित केवल धर्मी मात्र से भासने वाली चित्तवृति.  

4. निर्विचार समापत्ति :- 

  • सूक्ष्म विषयों में देश काल और निमित्त (धर्म) के विकल्पों से रहित केवल धर्मी मात्र से भासने वाली चित्तवृति

 

5. निर्विचार की उच्चतर अवस्था आनन्दानुगत :-

  • सत्त्व प्रधान अहंकार की 'अहमस्मिसे भासने वाली चित्तवृत्ति ।

 

6. निर्विचार की उच्चतम अवस्था अस्मितानुगत :- 

  • बीज रूप अहंकार चेतन से प्रतिबिम्बित चित्त की 'अस्मिताअहंकार रहित 'अस्मिसे भासने वाली चित्तवृत्ति । अतः इनमें बीज रूप से किसी न किसी ध्येय पदार्थ को विषय करने वाली

 

  • चित्तवृत्ति का अस्तित्व सा बना रहता हैइसलिए ये सभी सबीज समाधि ही हैं। इनमें वृत्तियाँ बीज रूप में चित्त में विद्यमान रहती हैं। सबीज समाधि तक पहुँचने वाले साधक को कैवल्य लाभ नहीं मिलता क्योंकि चित्त में वृत्तियों के बीज रह जाने से समय पाकर वे पुनः नए जन्म ग्रहण का कारण बन सकती हैकिन्तु सबीज समाधि में पहुॅचे हुए साधक का पतन नही होता बल्कि बची हुई साधना अगले जन्म में शीघ्र ही पूरी कर लेता है। इसे भव प्रत्ययकहते है।

 

  • अतः सम्प्रज्ञात समाधि के अन्तिम स्तर तक बंधन का बीज प्रकृति संयोग बने रहने के कारण ही इसे सबीज समाधि माना है।

 

सबीज समाधि के अन्तर्गत आने वाली चारों प्रकार की समापत्तियों में निर्विचार समापत्ति की श्रेष्ठता महर्षि पतंजलि ने इस प्रकार प्रकाशित की है। 

यथा :

 "निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः ।। "

 

  • निर्विचार समापत्ति के और अधिक निर्मल हो जाने पर योगी को अध्यात्म प्रसाद प्राप्त होता है। अर्थात निर्विचार समापत्ति की विशारदता प्राप्त होने पर योगी को एक ही काल में सर्व पदार्थ विषयक यथार्थ ज्ञान उदय होता है।

 

  • जब रजोगुण एवं तमोगुण की अधिकता होती है तब चित्तगत सत्तवगुण तिरस्कृत हो जाता है। यही चित्त में अशुद्धि आवरण रूप मल है। योगी के अभ्यासवश सत्तवगुण के प्रबल होने पर जब यह मल दूर हो जाता है तब राजस-तामस वृत्तियों या विचारों से रहित शुद्ध सात्तिवक प्रकाश रूप अति स्वच्छ चित्त का स्थिर प्रवाह चालू होता है। यही समापत्ति की प्रवीणता कही जाती है। जब निर्विचार समापत्ति का यह वैशारद्य प्राप्त हो जाता है। तब योगी को परमाणु रूप भूत सूक्ष्म से आरम्भ कर प्रकृति पर्यन्त सर्व सूक्ष्म पदार्थों का क्रम के अनुरोध के बिना ही एक ही काल में साक्षात्कार रूप प्रज्ञालोक प्राप्त हो जाता है। वही प्रज्ञालोक अध्यात्म प्रसाद कहा जाता है।

 

इस प्रज्ञालोक का लाभ प्राप्त होने पर योगी शोक रहित हो जाता है। श्री व्यास जी महाराज ने इस अवस्था का वर्णन इस प्रकार किया है :-

 

प्रज्ञाप्रासादमारूह्याशोच्यः शोचतो जनान् । 

भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान् प्राज्ञोऽनुपश्यति ।।

 

  • शैलशिखारूढ़ पुरूष भूमिस्थित पुरूषों को जैसे छोटा देखता हैवैसे ही उक्त साक्षातकार युक्त योगी प्रज्ञाप्रसादरूप शैलशिखर पर आरूढ़ होकर स्वयं शोक रहित होता हुआ अपने से अन्य सब अज्ञानी पुरूषों को शोकयुक्त देखता है। अर्थात ज्ञान युक्त योगी उस ज्ञान के पराकाष्टा से अपने को सर्वोपरि जानता हुआ शोकयुक्त अज्ञानियों को तुच्छ समझता है।

 

अतः निर्विचार समापत्ति के अभ्यास से चित्त की स्थिति सर्वथा परिपक्व हो जाती है। इस स्थिति में किसी प्रकार का किंचिन्मात्र भी दोष नहीं रहता। इस स्थिति के समय योगी की बुद्धि अत्यन्त निर्मल हो जाती हैजिसका सार्थक नाम निम्न लिखित सूत्र में बतलाया गया है यथा : 

"ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ।।"

 

  • अध्यात्म प्रसाद के प्राप्त होने पर जो प्रज्ञा (समाधिजन्य बुद्धि) उत्पन्न होती है उसका नाम है ऋतम्भरा प्रज्ञा (सच्चाई को धारण करने वाली अविद्यादि से रहित बुद्धि) । इस अवस्था में योगी की बुद्धि वस्तु के सत्य (असली) स्वरूप को ग्रहण करने वाली होती हैं। संशय और भ्रम लेश मात्र भी नहीं रहता है।

 

महर्षि पतंजलि ने इस ऋतम्भरा प्रज्ञा की विशेषता का वर्णन करते हुए कहा हैकि -

"श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात ।। "

 

  • श्रवण और अनुमान से होने वाली बुद्धि की अपेक्षा इस बुद्धि का विषय भिन्न हैक्योंकि यह विशेष अर्थवाली है।

 

  • वेद शास्त्र और आप्त पुरुष के वचनों से वस्तु का सामान्य ज्ञान होता हैपूर्ण ज्ञान नही होता। इसी प्रकार अनुभव से भी साधारण ज्ञान ही होता हैकिन्तु ऋतम्भरा प्रज्ञा से वस्तु के स्वरूप का यथार्थ और पूर्ण (अङग-प्रत्यङ्गों सहित ) ज्ञान हो जाता है। अतः यह उन दोनों प्रकार की बुद्धियों से भिन्न और अत्यन्त श्रेष्ठ है।

 

महर्षि पतंजलि ने ऋतम्भराप्रज्ञा का फल निम्नलिखित सूत्र में प्रतिपादित किया है:

 "तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी।।"

 

  • उस ऋतम्भरा प्रज्ञा से उत्पन्न होने वाला संस्कार दूसरे व्युत्थान संस्कारों का प्रतिबन्धक अर्थात रोकने वाला होता है।

 

  • मनुष्य जिस किसी भी वस्तु का अनुभव करता है एवं क्रिया करता हैउन सबके संस्कार अन्तःकरण में इकट्ठे होते रहते है। इन्ही को योगसूत्र में कर्माशय के नाम से कहा है। ये ही मनुष्य को संसार चक्र में भटकाने वाले मुख्य कारण हैं। इनके नाश से ही मनुष्य मुक्तिलाभ कर सकता है। अतः उक्त बुद्धि का महत्व प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैकि इस बुद्धि के प्रकट होने पर जब मनुष्य को प्रकृति के यथार्थ रूप का भान हो जाता हैतब उसका प्रकृति में और उसके कार्यों में स्वभाव से ही वैराग्य हो जाता है। उस वैराग्य के संस्कार पूर्व इक्ट्ठे हुए सब प्रकार के राग-द्वेष मय संस्कारों का नाश कर डालते है। इससे योगी शीघ्र ही मुक्तावस्था के समीप पहुंच जाता है।

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