चित्त क्या है ? चित्त से तात्पर्य क्या है | चित्त का स्वरूप एवं चित्त भूमियॉ | Chitt Kya Hai

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चित्त क्या है ? चित्त से तात्पर्य क्या है

 

चित्त क्या है ? चित्त से तात्पर्य क्या है | चित्त का स्वरूप एवं चित्त भूमियॉ | Chitt Kya Hai

चित्त क्या है ? 

 

  • जैसा की शास्त्रों में कहा गया है। शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' अर्थात् प्रत्येक कार्य सम्पादित करने का माध्यम या साधन यह शरीर ही हैं। इस जीवात्मा को सुख व दुःख के भोग हेतु यह शरीर प्राप्त हुआ है, या सुख दुःख का भोग किया जा सकता है। इस शरीर के माध्यम से ही सम्भव है। इस शरीर में दो प्रकार के साधन है। जिन्हें बाहयःकरण व अन्तःकरण के नाम से जाना जाता है। बाहयःकरण के अन्तर्गत हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ आती है। अन्तःकरण के अन्तर्गत ज्ञानेन्द्रियो व कर्मेन्द्रियों का कार्य बाहर की ओर अर्थात् संसार की ओर होता हैं।
  • बाहय विषयो के साथ इन्द्रियों के सम्पर्क से अन्त में आत्मा या जीवात्मा को जिन साधनों से ज्ञान-अज्ञान, सुख-दुख की अनुभूति होती है, उन साधनों को अन्तःकरण के नाम से जाना जाता है। यही अन्तःकरण को चित्त के नाम से जाना जाता है।


  • ज्ञानानुभूति के साधन को चित्त कहा जाता हैं। महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में मन, बुद्धि, अहंकार इन तीनों के सम्मिलित रूप को चित्त कहा जाता हैं। 
  • चित्त शब्द की निरूक्ति 'चित्ति संज्ञाने' धातु से हुयी है। अर्थात् ज्ञानानुभूति का साधन चित्त कहलाता है। योग दर्शन में मन, बुद्धि व अहंकार इन तीनों के सम्मिलित रूप को चित्त कहा गया हैं। 
  • चित्त का स्वरूप विलक्षण है। यह आत्मा से भिन्न तत्व है। फिर भी आत्मा से पृथक करके इसको देखना अत्यन्त कठिन है। चित्त प्रकृति का सात्विक परिणाम है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है। सत्व की प्रधानता होने के कारण इसको प्रकृति का प्रथम परिणाम माना जाता है।

 

  • सांख्य और योग के मत में चित्त, चित, चैतन्य पुरूष व आत्मा ये सभी पर्यायवाचक शब्द है। चित्त अपने आप में अपरिणामी कूटस्थ और निष्क्रिय है। इसी चित्त अथवा पुरूष तत्व को भोग और मोक्ष देने के लिए इसके साथ प्रकृति का संयोग होता है।

 

प्रिय विद्यार्थियो यदि महर्षि पतंजलि के योगसूत्र पर गहन दृष्टिपात किया जाये तो ज्ञात होता है कि सम्पूर्ण योगसूत्र की आधारभूत अवधारणा चित्त ही है। योग साधना में अग्रसर करने वाले सभी साधन इसी चित्त की शुद्धि की ओर लेकर जाते हैं। योग के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए भी उन्होंने कहा है-


'योगश्चचित्तवृत्तिनिरोधः ।' पाo योo सू० / समाधिपाद / 2

 

अर्थात् 

  • "चित्त की समस्त वृत्तियों का निरोध ही योग है।" इसलिये पाठको, सहज ही जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि यह चित्त आखिर क्या है ? चित्त शुद्धि क्या है, और इसका शोधन किस प्रकार से किया जाता है ? चित्त के स्वरूप को समझ लेने पर हमें स्वतः ही योग का स्वरूप भी स्पष्ट होने लगता है।

 

जिज्ञासु विद्यार्थियों, यदि बहुत ही साधारण शब्दों में कहें तो चित्त अचेतन प्रकृति का वह प्रथम विकार है, जिसमें हमारे जन्म जमान्तर के संस्कार संचित होते है। इस तथ्य को कुछ इस प्रकार से समझ सकते हैं, कि हमारा जीवन एक यात्रा है, जिसमें हम बार-बार जन्म - मृत्यु रूप अनेक पड़ावो से गुजरते हैं। यह किसी एक व्यक्ति के जीवन का सच नहीं हैं, वरन् हममें से प्रत्येक के जीवन का सच है। हॉ जो मोक्ष प्राप्त आत्मायें है, वे इस दायरें से मुक्त हैं। अर्थात् वे जन्म मरण के बन्धन से छूट जाती है, किन्तु सामान्य व्यक्तियों के जीवन में जन्म मरण का यह चक निरन्तर कर्मानुसार चलता ही रहता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि हममें से प्रत्येक के जीवन के दो पड़ाव हैं एक जन्म और दूसरा मृत्यु सभी लोग अपने स्वभाव के अनुसार अपने जीवन में अनेको कार्य करते हैं, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है। इसी तथ्य को भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में भी कहा है-

 

"कर्मण्येव वा अधिकारस्ते । 

मा फलेषु कदाचन ।।"  श्रीमद्भगवद्गीता

 

अर्थात् -


"कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है। कर्मों के फल या परिणाम की प्राप्ति के में नहीं।

 

पाठकों आप में से प्रत्येक ने यह अनुभव किया होगा कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वभाव, आदतों, पसन्द - नापसन्दगियों, रूचियों इत्यादि के आधार पर एक दूसरे से अलग हैं। अर्थात् अपनी प्रकृति ( स्वभाव) के अनुसार हम अपने कर्मों का सम्पादन करते हैं। हमारे द्वारा जो भी कर्म किये जाते है, उनका एक सूक्ष्म प्रभाव हमारे चित्त में अंकित होता रहता है। जिसे संस्कार कहते है। इस प्रकार संस्कार का अर्थ है कर्मबीज और जिस स्थान - पर यह कर्मबीज एकत्रित होते हैं, उसे "चित्त" कहा जाता है। 


अब प्रश्न उपस्थित कैसे होता है व इस चित्त की उत्पत्ति कैसे होती है और इस का स्वरूप क्या है ? विद्यार्थियों इसके लिये हमें योगदर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति की जो प्रक्रिया बतायी गई है, थोड़ा उसको समझना होगा ।

 

  • योगदर्शन के अनुसार इस सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण प्रकृति एवं पुरूष के मिलने से हुआ है। सत्व, रजस्, एवं तमस् इन तीनों गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति कहा जाता है। तथा पुरुष से तात्पर्य आत्मा से है। जब तक पुरूष एवं प्रकृति एक दूसरे से अलग -अलग रहते हैं, तब तक किसी प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति की कोई प्रक्रिया नहीं चलती हैं और सत्, रज एवं तम तीनो गुण अपने में ही परिणीत होते रहते हैं अर्थात् सतोगुण, सतोगुण में, रजोगुण, रजोगुण में और तमोगुण, तमोगुण में परिवर्तित होता रहता हैं। प्रकृति के इन तीनों तत्वों के अपने अलग- अलग गुण धर्म है। सतोगुण, प्रकाश और सुख का प्रतीक है। रजोगुण प्रवृति ( प्रेरित करने का गुण) एवं दुःख का तथा तमोगुण अवरोध या जड़ता एवं मोह का प्रतीक है। 


  • जैसे ही प्रकृति एवं पुरूष का मिलन होता है तो प्रकृति की साम्यावस्था भंग हो जाती है। अर्थात तीनो गुणों में हलचल पैदा हो जाती है, और प्रकृति संयोग से सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। त्रिगुणों में से सर्वप्रथम हलचल रजोगुण में होती है, क्योकि किसी भी कार्य के लिये प्रेरित करना रजोगुण का धर्म है। पुरूष के इसके बाद सतोगुण प्रबल होता है, जिसके कारण महत् तत्व की उत्पत्ति होती है। यह महत् तत्व प्रकृति पुरुष के संयोग से उत्पन्न होने वाला प्रथम विकार या परिणाम है। सांख्य में इस प्रथम विकार को समष्टि रूप में महत् एवं व्यष्टि रूप में बुद्धि कहा जाता है। इसके बाद महत् से अहंकार से मन एवं पंचकर्मेन्द्रियो, पंचज्ञानेन्द्रियों तथा पंचतन्मात्राओं एवं अन्त में पंचमहाभूतों का निर्माण होता है, और इन्हीं पंचमहाभूतों से फिर जड़ चेतन - विभिन्न पदार्थो का निर्माण होता है।

 

  • योगदर्शन के प्रणेता महर्षि पतंजलि के अनुसार महत्, अहंकार एवं मन इन तीनों को ही चित्त कहा गया है। योग दर्शन पर विभिन्न विद्वानों के द्वारा जो भाष्य लिखे गये है, उनमें चित्त के लिये कुछ जगह पर बुद्धि एवं मनस् शब्दो का प्रयोग भी किया गया है। सांख्य दर्शन में इन तीनों (महत्, अहंकार, मन) को अन्तःकरण नाम प्रदान किया है।

 

प्रिय विद्यार्थियों इस प्रकार स्पष्ट है कि योग दर्शन के अनुसार चित्त से तात्पर्य महत्, अहंकार एवं मन से है। जिसमें हमारे पूर्व जन्मो के एवं इस जन्म के संस्कार संचित रहते हैं

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