आसन का अर्थ ? आसन की परिभाषा आसन का स्वरूप | Aasan Ka Arth Evam Paribhasha swaroop

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आसन का अर्थ ? आसन की परिभाषा, आसन का स्वरूप

आसन का अर्थ ? आसन की परिभाषा  आसन का स्वरूप | Aasan Ka Arth Evam Paribhasha swaroop
 

आसन का स्वरूप 

  • प्रिय विद्यार्थियों जैसा कि कहा गया है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। स्वस्थ मुनष्य ही चारों पुरुषार्थो में तीन की पूर्ति कर मोक्ष की कामना कर सकता है। और धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थो के मूल में आरोग्य है। ऐसा आयुर्वेद का कथन है। आरोग्य के द्वारा ही मनुष्य अपने लौकिक कर्मों का सम्पादन करता है तथा स्वस्थ शरीर के द्वारा ही ईश्वर की आराधना में प्रवृत्त हो सकता है। इस शरीर को स्वस्थ रख कर ईश्वर के साथ तादात्म्य भाव स्थापित करने के लिए महर्षि पतंजलि ने योगांगों के अन्तर्गत आसन का वर्णन किया है। पहले यम नियम द्वारा व्यवहार की शुद्धि तत्पश्चात आसनों द्वारा स्थैर्य प्राप्त कर परम्ब्रह्म से साक्षात्कार किया जा सके।

 

प्रिय विद्यार्थियों महर्षि पतंजलि ने आसन को अष्टांग योग के अन्तर्गत लिया है। अष्टांग योग का तीसरा अंग आसन है। किन्तु हठयोग के ग्रन्थों में आसन को प्रथम स्थान दिया गया है। प्रथम अंग के रूप में लेना इसके महत्व का परिचायक है। है 

हठयोग प्रदीपिका में इसका वर्णन इस प्रकार-

 

"हठस्य प्रथमाड़गत्वादासनं पूर्वमुच्यते ।

कुर्यातदासनं स्थैर्यमारोग्यं चाड़गलाघवम् ।।"

 

अर्थात

हठयोग का प्रथम अंग होने से आसन को प्रथम कहते हैं। आसन शरीर तथा मन में स्थिरता व शरीर के विभिन्न अंगों में लाघव उत्पन्न करते हैं, तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है।

 

गोरक्षषतक में वर्णन है -

 

"आसनं प्राणसंयामः प्रत्याहारोऽथ धारणा 

ध्यान समाधिरेतानि योगांगानि भवन्ति षट् ।।" (गोरक्ष शतक)

 

गोरक्षशतक में योग के छह अंग ही स्वीकार किए गये है। गोरक्षशतक में भी आसन को प्रथम अंग के रूप में स्वीकार किया गया है।

 

  • योगशास्त्रों में आसन का स्थान महत्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति में योगाशास्त्रों की तरह ही योगासनों का विशेष महत्व है। विश्व के प्राचीनतम व अपौरुषेय ग्रन्थ वेद है। वेद आध्यात्मिक ज्ञान के अक्षय भण्डार है। वेदों में योगासनों का विशेष उल्लेख मिलता है। इस प्रकार योगासनों का इतिहास भी उतना ही प्राचीन है जितना वेदों का है। उपनिषदों में भी योगासन का उल्लेख मिलता है। उपनिषदों में मण्डलब्राह्मणोउपनिषद 1/1/5 में तथा श्वेताश्वतर उपनिषद में भी आसनों का वर्णन किया गया है। तेजोबिन्दु उपनिषद तथा अमृतनाद उपनिषद में भी योगासनों का वर्णन किया गया है, तथा आसन की उपयोगिता का वर्णन करते हुए कहा गया है आसनों का अभ्यास किए बिना योग में सिद्धि प्राप्त - नहीं की जा सकती है। आसन के द्वारा ही ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सकता है। 


1 आसन का अर्थ -

  • आसन का सामान्य अर्थ है बैठना। लोक व्यवहार में जिस वस्त्र खण्ड या कम्बल का प्रयोग हम बैठने के लिए करते हैं। उसे आसन कहते हैं। इसके अतिरिक्त लकड़ी, कुश या अन्य वस्त्र खण्ड का प्रयोग बैठने के लिए किया जाता है। उसे भी आसन कहा जाता है। इस प्रकार सामान्य व्यवहार में बैठने के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपयोगी साधन को आसन कहते हैं। 


  • आसन शब्द संस्कृत के 'अस' धातु से बना हैं जिसके दो अर्थ है - पहला है बैठने का स्थान तथा दूसरा है शारीरिक अवस्था बैठने के स्थान (Seat) का अर्थ है कि जिस पर बैठा जाता है वह आसन है जैसे मृगछाल, कुष, कम्बल, वस्त्रखण्ड, चटाई, दरी आदि । - आसन के दूसरे अर्थ शारीरिक अवस्था (Body Position) से तात्पर्य है। शरीर, मन तथा आत्मा की संयुक्त अवस्था । अर्थात शरीर, मन तथा आत्मा जब एक साथ व स्थिर हो जाती है, और उस स्थिति से जो सुख की अनुभूति होती है वही स्थिति आसन है। प्रिय विद्यार्थियों, महर्षि पतंजलि ने आसन को परिभाषित करते हुए आसन का अर्थ इस प्रकार बताया है। 


"स्थिर सुखम् आसनम्” (पा० यो० सू०) 


अर्थात स्थिर और सुखपूर्वक जिसमें बैठा जा सके वह आसन है।


  • प्रिय विद्यार्थियों, आसन शब्द भी स्वयं में अपना अर्थ समाहित किए है। आसन शब्द का प्रत्येक अक्षर आ, , न का अपना स्वतंत्र अर्थ समझा जा सकता है, जो इस प्रकार है।

 

  • '' का अर्थ है आत्म, अर्थात आत्म अनुशासन अष्टांग योग का तीसरा अंग आसन योगाभ्यास में सहायक है। वृत्तियों के सकारात्मक प्रवाह व नकारात्मक वृत्तियों के निष्कासन के लिए मन का स्थिर होना आवश्यक है, तथा आसन द्वारा स्थिरता की प्राप्ति होती है। स्थिर शरीर तथा एकाग्र मन द्वारा ही साधक आत्म अनुशासन में बध कर आध्यात्मिकता के उच्च शिखर पर प्रवेश पाते है। अर्थात आत्मा से साक्षात्कार होकर अपने लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करता है।

 

  • '' का अर्थ है सर्व, अथवा सभी अर्थात इस रूप में आसनों द्वारा व्यक्ति के सभी द्वन्द समाप्त हो जाते है। वह जय में पराजय में शीत में उष्ण में, भूख में प्यास में सभी स्थितियों में सम हो जाता है। समत्व का भाव जाग्रत होता है।

 

  • '' का अर्थ है नभ, अनन्त आकाश अर्थात ब्रह्म से साक्षात्कार आसनों के द्वारा साधक अपने आत्म स्वरूप को अनन्त में लगा देता है। जिससे आसन सिद्ध होकर साधक को लक्ष्य की प्राप्ति होती है।

 

  • इस प्रकार प्रिय विद्यार्थियों आसन शब्द अपने आप में एक विशाल अर्थ लिए है। आसन थोड़े ही समय में सीमित शक्ति व साधनों का उपयोग करते हुए व्यक्ति के सर्वांगिण विकास कर उसके लक्ष्य तक अवश्य पहुँचाते है।

 

आसन की परिभाषा - 

प्रिय विद्यार्थियों योग साधना में स्थिरता पूर्वक बैठना अनिवार्य है। तथा स्थिरता पूर्वक व सुखपूर्वक बैठकर ही साधना की जा सकती है। महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग में तीसरे अंग के रूप में आसन का वर्णन किया है। किन्तु किसी विशेष आसन का वर्णन नहीं किया है।

 

महर्षि पतंजलि ने आसन की केवल एक ही परिभाषा दी है जो निम्न प्रकार से है-

'स्थिरसुखमासनम्' (पाoयो0सू० 2/46)

 

अर्थात 

  • स्थिरतापूर्वक और सुखपूर्वक जिसमें बैठा जा सके वहीं आसन है। महर्षि पतंजलि के अनुसार ये वे आसन हैं जैसे पद्मासन, स्वस्तिक आसन, भद्रासन आदि आसन स्थिरता व सुख देने वाले हैं। अर्थात ऐसे ध्यान के आसन जिसमें साधक को उपासना में सुख की प्राप्ति हो, उसी का अभ्यास करना चाहिए। योग के अभ्यासी को किसी ऐसे आसन का अभ्यास करना चाहिए, जिसमें वह घंटों सुखपूर्वक बैठ सके। क्योंकि चित्त वृत्तियों के निरोध के लिए तप, उपासना, साधना के लिए आसन का स्थिर होना आवश्यक है।

 

  • महर्षि पतंजलि ने इस परिभाषा में दो बातें विशेष रूप से कही है। स्थिरता व सुख स्थिरता से अभिप्राय है कि उपासना के समय शरीर की निश्चल अवस्था, अर्थात उस समय शरीर का कोई भी अंग चंचल ना हो। ऐसी स्थिरता कि किसी भी कीट, पतंग आदि के शरीर पर बैठने पर भी स्थिरता भंग ना हो । अन्यथा शरीर के चंचल होते ही चित्त भी चंचल हो जाएगा। दूसरा शब्द है सुख, सुख से अभिप्राय है कि साधक को आसन का पूर्ण अभ्यास हो। तभी उसे सुख की प्राप्ति हो सकती है। पूर्ण अभ्यास ना होने से घुटने, पैरों आदि भागों में पीड़ा होने लगती है।

 

  • अतः साधक जिस आसन में बैठा है उसमें किसी प्रकार का कष्ट ना होना। इस प्रकार जिसमें सुख पूर्वक, शरीर और आत्मा स्थिर हो उसे ही आसन समझना चाहिए।


विज्ञानभिक्षु के अनुसार - आसन को इस प्रकार परिभाषित किया गया है।

 

'जितनी भी जीव की जातियां है, उनके बैठने के जो आकार विशेष हैं। वे सब आसन कहलाते हैं। 


स्वामी विवेकानन्द के अनुसार

  • आसन के स्थिर होने का तात्पर्य है शरीर के अस्तित्व - का बिल्कुल भान तक ना होना।

 

तेजबिन्दु उपनिषद के अनुसार

 "सुखनैव भवेत् यस्मिन् जस्त्रं ब्रह्मचिन्तनम् ।"

 

जिस स्थिति में बैठकर सुखपूर्वक निरन्तर परमब्रह्म का चिंतन किया जा सके, उसे ही आसन समझना चाहिए। 


अष्टांग योग में चरणदास जी ने लिखा है -

 

चौरासी लाख आसन जानों, योनिन की बैठक पहचानो। 

अर्थात विभिन्न योनियों के जीव जन्तु जिस अवस्था में बैठते हैं उसी स्वरूप को आसन कहते हैं। 


आचार्य श्रीराम शर्मा जी कहते है 

आसनों का गुप्त आध्यात्मिक महत्व है, इन क्रियाओं - से सूर्य चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, आदि सूक्ष्म ग्रन्थियों का जागरण होता है। और कई मानसिक शक्तियों का असाधारण रूप से विकास होने लगता है। इस प्रकार की आसन की विभिन्न परिभाषाओं का अध्ययन आपने किया। 

महर्षि पतंजलि ने आसन के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए इस प्रकार लिखा है 

" प्रयत्न शैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम" (पाoयो०सू० 2 / 47 )

 

अर्थात

  • प्रयत्न की शिथिलता से तथा अनन्त ( परमात्मा ) में मन लगाने से आसन सिद्ध होता है। प्रयत्न की शिथिलता और अनन्त में मन न लगाने से योग के साधक को जप-उपासना आदि में भी बांधाए आ जाती है। यदि साधक के शरीर में कम्पन या अकड़ाहट होगी तो योग साधना में बाधा उत्पन्न होती है। जिससे साधक बहुत देर तक योगसाधना में नहीं बैठ सकता है। अतः शरीर में मृदुता बनाये रखने के लिए प्रयत्न की शिथिलता आवश्यक है। शरीर की स्वाभाविक चेष्टाओं का नाम ही प्रयत्न है तथा अनन्त में मन लगा देना अर्थात अनन्त समापत्ति से अभिप्राय परमेश्वर से तादात्म्य करना अर्थात ईश्वर के गुण, चिन्तन तथा उनके अनुरूप भावना करने में मन को लगाना। इस प्रकार आसन की सिद्धि के लिए ईश्वरीय शक्ति पर मन को लगा देना अर्थात अपनी ओर से प्रयत्न करना तथा मन को ईश्वर को सौप देना। जब इस तरह से आसन किये जाए तो उस ईश्वरीय शक्ति से वह आसन सिद्ध हो जाते है।

 

महर्षि व्यास के अनुसार - 

  •  प्रयत्नोपरम् से आसन सिद्धि होती है। 


स्वामी विवेकानन्द के अनुसार

  • अनंत के चिंतन द्वारा आसन स्थिर हो सकता है।

स्वामी हरिहरानन्द के अनुसार

  • आसन सिद्धि अर्थात शरीर की सम्यक स्थिरता तथा - सुखपूर्वक प्रयत्नशैथिल्य और अनन्त समापत्ति द्वारा होती है।

 

  • इस प्रकार प्रिय विद्यार्थियों आसन तभी सिद्ध होता है, जब अस्थिरता व प्रयत्न की शिथिलता का अभाव होगा, क्योंकि प्रयत्न करते रहने पर स्थिरता प्राप्त नहीं हो सकती है। और उसे ना ही स्थिरता का भाव प्राप्त होता है। जैसे जैसे शरीर स्थिरता को प्राप्त होता है वैसे ही शरीर की चेष्टाएं समाप्त हो जाती है। और साधक शरीर भाव से ऊपर उठ जाता है। मन अनन्त में समाहित हो जाता है। यही आसन सिद्धि है।

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