राजा भर्तृहरि की कृतियाँ: नीतिशतक श्रृंगार शतक वैराग्य शतक |Works of King Bhartrihari

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राजा भर्तृहरि की कृतियाँ: नीतिशतक श्रृंगार शतक वैराग्य शतक (Works of King Bhartrihari)

राजा भर्तृहरि की कृतियाँ: नीतिशतक श्रृंगार शतक वैराग्य शतक  |Works of King Bhartrihari
 

राजा भर्तृहरि की कृतियाँ (Works of King Bhartrihari)


भर्तृहरि संस्कृत साहित्य के प्रकाण्ड विद्वानों में गिने जाते थे। उनकी यह विद्धता उनके द्वारा रचित अनेक पुस्तकोंग्रन्थों से ही प्राप्त होता है। भर्तृहरि को जो भी प्रसिद्धि प्राप्त हुई उनमें नीतिशतकश्रृंगारशतक तथा वैराग्यशतक का उल्लेख प्रमुखता से मिलता है। आपके तीनों शतकों का विश्लेषण वर्गीकरण के आधार पर निम्न प्रकार से किया जाता है। 

नीतिशतक -राजा भर्तृहरि की कृति 

  • यह सर्वविदित रूप में प्राप्त होता है कि भर्तृहरि उज्जयिनी के राजा थे। इनकी राज व्यवस्था तथा नीतियों से प्रजाजनता एवं पदाधिकारी सभी लाभान्वित तथा सुखी होने का अनुभव व्यतीत करते हैं । भर्तृहरि की विद्वता पर किसी प्रकार का संशय किया ही नहीं जा सकता था। आपने नीतिशतक के अन्तर्गत व्यवस्था संचालन की प्रथम इकाई मानव का चयन किया। वह उसके व्यवहार का सूक्ष्म अध्ययन यह प्रकट करना चाहते थे कि जैसा व्यक्ति वैसा व्यवहार तथा इन दोनों के अनुरूप वैसी नीति का क्रियान्वयन सम्मिलित होना चाहिए। 


  • भर्तृहरि ने नीतिशतक में सर्वप्रथम सृष्टि के विभाजक नियामक स्त्री पुरुष को मोहने के लिए बनायी गयी है। वह उनके व्यवहार का चित्रण करते हुए कहते हैं कि वास्तव में वह बात किसी से करती है हाँव-भाव किसी और को दिखाती हैं जबकि विचार किसी अन्य के प्रति रखती हैं। विद्याधन को सर्वोत्तम धन के रूप में स्वीकारते हुए भर्तृहरि कहते हैं कि विद्याधन चुराने की वस्तु नहीं है क्योंकि यह चुराने वाले व्यक्ति को दिखाई नहीं देती है। विद्या से प्रत्येक का कुछ न कुछ कल्याण होता है यह आपेक्षितों को नियमित देने से भी बढ़ती ही रहती हैयह अन्त तक समाप्त नहीं होने वाली वस्तु है अतः हे राजाओं जिनके पास भी यह धन है किसी प्रकार का घमण्ड़ अहंकार विद्या के लिए मत आने दो । विद्या अर्थात् सरस्वती के पश्चात् लक्ष्मी की चर्चा करते हुए कहते हैं कि लक्ष्मी वैभव का प्रतीक है जिनको यह प्राप्त होती है वह धन्य हो जो हैं किन्तु इस परम को प्राप्त करने के पश्चात् किसी जातिविषय और धर्म के पाण्डित्य का अपमान न करें क्योंकि यह धन सम्पत्ति इन विद्वानों को किसी बंधन में नहीं बांध सकती हैं। यह उनके वैसे ही है जैसे कमलडण्ठल से निकलने वाले धागों से मदमस्त हाथी को बांधने का असफल प्रयास है। इस प्रकार हम देखते हैं कि राजा भर्तृहरि ने नीतिशास्त्र के अन्तर्गत धर्म और सामाजिक जीवन को संतुलित बनाने का प्रयास किया है।

 

श्रृंगार शतक :-

  • राजा भर्तृहरि सांसारिक सुन्दरता से प्रभावित थेराजा भर्तृहरि ने दो विवाह किये थे इन दोनों विवाहों के पश्चात् भी आपने तीसरा विवाह पिंगला नामक राजकुमारी से किया है जो अत्यन्त सुन्दरी तथा सौन्दर्य में वह अप्सराओं को भी हुए थीं । उनके सौन्दर्य से प्रेरित होकर इन्होंने श्रृंगारशतक को जमीनी आधार प्रदान किया। अपने श्रृंगारशतक के अन्तर्गत सर्वप्रथम कामदेव को प्रणाम किया और इस बात को स्वीकारा कि यह कामदेव भगवान की देन है कि विराट पुरूष भी मृगनयनियों के वश में हो जाता है। आपने यह कहा है कि स्त्रियों का सबसे बड़ा गहना उनकी भौहों की चंचलताआँखों का तिरक्षापन तथा लज्जा में परिवर्तित होने वाली हँसी है जिसे वह समय-समय पर अस्त्रों के रूप में प्रयोग करती हैं। स्त्रियों के नयनों की व्याख्या करते हुए राजा भर्तृहरि कहते हैं कि इन नयनों का ही प्रबल प्रभाव है जो धरती पर सभी दिशाओं में खिले हुए कमल की भांति सुन्दर बनाती हैं। अर्थात् देखने वाली सभी सुन्दर वस्तुओं में सबसे सुन्दर चित्र मृगनयनियों के द्वारा देखने की कला से ही प्रचारित होता है।

 

  • श्रृंगारशतक के अन्तर्गत कामदेव की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा जाता है कि कामदेव केवल राजामहाराजाओं तथा धनी व्यक्तियोंसम्पन्न गुणों वालों को ही प्रभावित करते हुए पकड़ते अपितु मरे हुए व्यक्तियों को भी मारते हैं। इसका प्रभावपूर्ण विस्तृत वर्णन करते हुए यह उजागर किया जाता है कि जब श्रृंगार एक नशा के रूप में व्यक्ति पर छा जाता है तो वह बेहाल और व्याकुल तथा विभिन्न व्याधियों से पीड़ित होते हुए भी केवल और केवल वासना की आसक्ति को स्वीकार करता है। 
  • कामदेव के इस प्रभाव को प्रकट करते हुए राजा भर्तृहरि कहते हैं कि नारी अमृत और विष दोनों है नारियों का प्यारा कोई नहीं होता है यह राजा भर्तृहरि के श्रृंगार शतक के अंतिम पक्ष को दर्शाता है और अन्त में आप यह भी स्वीकार करते हैं कि वेश्या विवेक रूपी कल्पना के लिए कुल्हाड़ी के समान है अतः कुलीन पुरूषों को वेश्याओं से दूर ही रहना चाहिए और उन्हें यह मानना चाहिए कि वियोग में संयोग होता है और संयोग में वियोग होता है । 


वैराग्य शतक :- 

  • अपने नीतिशास्त्र के अन्तिम पक्ष में यह माना कि धीर का धैर्य नष्ट नहीं होता है अर्थात् धैर्य पूर्ण स्वभाव वाला मनुष्य कितना ही दुःख में पड़ा हो पर उसका धैर्य समाप्त नहीं किया जा सकता है इसकी तुलना करते हुए भर्तृहरि कहते हैं कि यदि आग का मुँह नीचे की ओर कर दिया जाय तो भी उससे उठने वाली लपटे नीचे की ओर नहीं जाती हैं। नीति शास्त्र का अन्तीम श्लोक भर्तृहरि ने अपने वैराग्य शतक के आरम्भिक रूप-रेखा को तय करने के लिए ही बनाया होगा । पिंगला के छल से जागृत होने के पश्चात् कविसाहित्यकार भर्तृहरि ने अपने छोटे से भाई राजा विक्रमादित्य को उज्जयिनी का शासन देने के बाद वैराग्य को ही जीवन दर्शन का आधार बनाया और साधुवादी दृष्टिकोण को अपनाकर सुन्दर उपदेश देना आरम्भ कर दिया । वह धार्मिक आधार पर नवजीवन को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि बह्म ज्ञान के अतिरिक्त सभी ज्ञान केवल एक सामाजिक व्यापार है। ज्ञानधर्म और तपस्या के माध्यम से ही संसार सागर से पार हुआ जा सकता है जाने का उपाय है। 

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