मुद्राराक्षस' नाटक का प्रतिनायक राक्षस की चारित्रिक विशेषताएँ |Mudrarakshasa ke Raksasa Ki Visheshtaayen

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मुद्राराक्षस' नाटक का प्रतिनायक राक्षस की चारित्रिक विशेषताएँ  

मुद्राराक्षस' नाटक का प्रतिनायक राक्षस की चारित्रिक विशेषताएँ |Mudrarakshasa ke Raksasa Ki Visheshtaayen




मुद्राराक्षस' नाटक का प्रतिनायक राक्षस की चारित्रिक विशेषताएँ  

  • अमात्यराक्षस 'मुद्राराक्षसनाटक का प्रतिनायक है। इसका चरित्र एक 'आदर्शचरित्रहै। यह भी श्रोत्रिय ब्राह्मण है तथा नन्द का स्वामिभक्त मन्त्री हैं राक्षस इसका नाम है तथा अमात्य (मन्त्री) होने के कारण इसे 'अमात्यराक्षसकहा जाता है। 

सम्पूर्ण नाटक में प्रारम्भ से अन्त तक वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उपस्थिति रहता है। प्रतिनायक होने पर भी नाटक के अन्त में भरतवाक्य कहने का श्रेय राक्षस को ही प्राप्त है। उसका सारा जीवन संघर्ष से भरा हुआ है । वह चन्द्रगुप्त को नष्ट करने का प्रयत्न अन्त तक करता हैकिन्तु चाणकय की कूटनीतियों के समक्ष उसे पराजय स्वीकार करनी पड़ती है। समस्त नाटक का आलोचना करने पर 


मुद्राराक्षस' नाटक का प्रतिनायक राक्षस की निम्नलिखित चारित्रिक विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं-

 

1. अत्यन्त स्वामिभक्त 

अमात्यराक्षस अपने स्वामी नन्द का अत्यन्त भक्त है। नन्दकुल का - विनाश करने वाले चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त से वह अन्त तक प्रतिशोध लेने का प्रयत्न करता है। स्वामी की आत्मा को सन्तुष्ट करने के लिए वह अपने परिवार की भी परवाह नहीं करता। स्वयं चाणक्य भी अमात्यराक्षस की स्वामिभक्ति की प्रशंसा करते हुए कहते हैं


भर्तुर्ये प्रलयऽपि पूर्वसुकृतासश्न निःसश्या 

भक्त्या कार्यधुरां वहन्ति कृतिनस्ते दुर्लभास्त्वादृशाः II-(1/14)

 

राक्षस में प्रज्ञापराक्रम तथा भक्ति- इन तीनों की त्रिवेणी हैं नन्दकुल के विनाशकों को समाप्त कर देने तक राक्षस ने सभी सुख सुविधाओं का परित्याग कर दिया था - 

चिरात्प्रभूत्यार्यः परित्यक्तोचिशरीरसंस्कारः।

 

2. राजनीतिज्ञ - 

  • राक्षस कुशल राजनीति हैंभले ही वह चाणक्य की तरह कूटनीतिज्ञता में निपुण नहींफिर भी चन्द्रगुप्त का नाश करने के लिये वह हर सम्भव प्रयास करता है। चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त के बीच कलह कराने के लिये भी वह स्तुति पाठकों को भेजता है। उसके गुप्तचर चन्द्रगुप्त पर नजर रखे रहते हैं। सारे प्रयास करने पर भी भाग्य उसका साथ नहीं देता। 


3. अत्यन्त उदार तथा सरलहृदयी- 

  • राक्षस अत्यन्त सरलहृदय वाला है। अपनी सरलता के कारण ही वह चाणक्य भागुरायण आदि से धोखा खाता हैं वह सरलतावश भागुरायण को अपना हितैषी समझता हैकिन्तु वास्तव में भागुरायण चाणक्य का गुप्तचर निकलता है। राक्षस अत्यन्त ही भावुक प्रवृत्ति का है। द्वितीय अंक में विराधगुप्त की अवस्था देखकर वह स्वयं भी रो पड़ता है । उसके पराजय का कारण उसका सरल हृदय है। चाणक्य से परास्त होने पर अन्ततः वह कहता है 'हन्त रिपुभिर्मे हृदयमपि स्वीकृतम् ॥” चन्दनदास को बचाने के लिये वह अपने शरीर की भी परवाह न करके कुसुमपुर आ जाता है।

 

4. वीर तथा दृढनिश्चयी- 

राक्षस शस्त्रविद्या में अत्यन्त निपुण है। उसने अ चन्द्रगुप्त की सेना और चाणक्य की बुद्धि दोनों को परेशान कर रखा था । यह बात भी स्वयं चाणक्य ने ही स्वीकार की है। वह नन्द के अमात्य प्रधान के साथ ही साथ उसका प्रधान सेनापति भी था। स्वयं राजा नन्द भी उसकी वीरता पर भरोसा रखते थे-

 

यत्रेशा मेघनीला चरति गजघटा राक्षसस्तत्र यायात् 

एतत्पारिप्लवाम्भ: प्लुति तुरगबलं वार्यताम् राक्षसेन । 

पत्तीनां राक्षसोऽन्तं नयतु बलमिति प्रेशयन्मह्यमाज्ञाम् 

अज्ञासीः प्रीतियोगात् स्थितमिव नगरे राक्षसानां सहस्रम् ॥

 

उसे अपनी तलवार पर पूरा भरोसा था। संसार के सभी कार्य वह तलवार के बल पर करने में समर्थ था

 

निस्त्रिंवषोऽयं सजलजलदव्योमसाशमूर्ति 

युद्धश्रद्धापुलकित इव प्राप्तसख्यः करेण-6/19

 

राक्षस दृढ़निश्चयी है। वही अन्त तक चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त को परास्त करने का प्रयत्न करता रहता है।

 

5. शास्त्रज्ञाता-

  • राक्षस शास्त्रज्ञाता है। उसे ज्योतिष आदि शास्त्रों का अच्छा ज्ञान है। वह कर्म तथा पौरूष की अपेक्षा भाग्य पर अधिक विश्वास करता है। अपनी पराजय का कारण वह भाग्य को ही ठहराता है। उसकी स्मरण शक्ति चाणक्य जैसी नहीं। उसने चन्द्रगुप्त तथा चाणक्य के पीछे अपने इतने अधिक गुप्तचर लगाये थे कि वह स्वयं ही नहीं जान पाता था कि किस गुप्तचर को किस कार्य में लगाया गया है। फिर भी सम्पूर्ण नाटक को देखने पर यह कहा जा सकता है कि राक्षस सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व से सम्पन्न व्यक्ति था ।

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