हिन्दी की राजनीतिक साहित्यिक क्रांतिकारी जीवनियां और लेखक | Hindi Ki Rajnitik Sahityik Jeevniya

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हिन्दी की  राजनीतिक साहित्यिक  क्रांतिकारी जीवनियां और लेखक 

हिन्दी की  राजनीतिक साहित्यिक  क्रांतिकारी जीवनियां और लेखक | Hindi Ki Rajnitik Sahityik Jeevniya



हिन्दी की  राजनीतिक जीवनियां और लेखक 

 

महा पंडित राहुल सांकृत्यायन 

  • राजनीतिक महापुरुषों की जीवनी को आधार बनाकर जीवनियाँ लिखने वालों में सांकृत्यायन का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने साम्यवादी विचारकों को अपनी जीवनी लेखन के विषय के रूप में चयन किया। सन् 1953 ई. में स्तालिनसन् 1954 ई. में कार्ल मार्क्स एवं लेनिन तथा सन् 1956 ई. में माओत्से तुंग की जीवनियां लिखीं। सांकृत्यायन द्वारा लिखित इन जीवनियों में राजनेताओं के बाह्ययांतरिक जीवन का सूक्ष्म स्थूलविवेचन विश्लेषण प्रस्तुत नहीं किया गया है। अपितु उनके मार्क्सवादी जीवन दर्शन का ही प्रतिपादन किया गया है। राहुल की निष्ठा मार्क्सवाद में थी इसलिए उन्होंने स्वनिष्ठानुसार लोगों में साम्यवादी निष्ठा जागत करने के लिए ये जीवनियाँ लिखी हैं।

 

रामवक्ष बेनीपुरी 

  • रामवक्ष बेनीपुरी ने राजनीतिक नेताओं को जीवनियों का आधार बनाया है। इन्होंने कार्ल मार्क्स तथा जयप्रकाश नारायण नामक जीवनियां लिखीं जिनका विशेष महत्व है। इन जीवनियों में बेनी पुरी ने अपना हृदय रस उडेल दिया है। जिससे उनके चरित नायकों का जीवन उभर कर सामने आया है।

 

साठोत्तरी युग जीवनी लेखन-

 

  • सन् 1960 ई. के बाद के काल में साठोत्तरी युग कहा गया है। स्वतन्त्रता के लगभग 12-13 वर्षों के पश्चात् जीवनी लेखन में नया मोड़ आया। जीवन धारा में परिवर्तन आया। देश विकास की ओर अग्रसर हुआ। नैतिक मूल्यों में बदलाव आया। आध्यात्मिकता का स्थान भौतिकता ने ले लिया। 


ओंकार शरद 

  • ओंकार शरद ने प्रसिद्ध समाजसेवी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया को जीवनी लेखन का विषय चुना। सन् 1971 ई. में लोहिया एवं स्वर्गीय प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गांधी की जीवनी धरती की बेटी आकाश हो गई लिखी।

 

डॉ. चन्द्र शेखर 

  • डॉ. चन्द्र शेखर ने सन् 1985 ई. में स्व. राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की जीवन यात्रा लिखी। राजनीतिक व्यक्तियों पर लिखित जीवनियों के विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि स्वतन्त्रता से पूर्व राजनीतिक व्यक्तियों की जीवनियों के लेखन में उनके लेखक अपने चरित नायकों के राजनीतिक क्रिया कलापों के उल्लेख को अपनी उपलब्धि स्वीकारते थे इसलिए उनके मानवीय पक्षों की उपेक्षा की है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् जीवनी लेखकों की विचारधारा में महान परिवर्तन आया है उन्होंने अपने चरित नायकों के अंतर्बाह्य गुणों को भी उभारा है जो उनका प्रशंसनीय कार्य है।

 

क्रांतिकारी जीवनियां और लेखक 

 

राजनीतिक नेताओं के अतिरिक्त जीवनी लेखकों का ध्यान क्रांतिकारियों की ओर भी गया है। सुप्रसिद्ध क्रांतिकारियों की जीवनियां लिखी गई जिनमें-

 

विश्वनाथ वैषंपायन- अमर शहीद चंद्रशेखर - 1965 ई. । 

प्रो. वीरेंद्र सिंधु - युग द्रष्टा भगत सिंह और उनके मत्युंजय पुरखे सन 1968 ई.।  

धर्मवीर- लाला हर दयाल सन् 1970 

मंमथनाथ गुप्त- क्रांतिदूत भगत सिंह और उनका युग स. 1962

 

साहित्यिक जीवनियाँ और लेखक 

  • जीवनियाँ तो सभी साहित्यिक गुणों से संपक्त होकर साहित्यिक होती हैं किंतु इनमें साहित्यकारों के जीवन एवं उनकी कृतियों को जीवनी का विषय बनाया गया है जिनमें प्रमुख जीवनियां निम्नलिखित हैं -


  • ऋषि जैमिनी कौशिक बरुआ बरुआ सुप्रसिद्ध पत्रकार हैं। इन्होंने जीवनी लिखी है - 
  • माखन लाल चतुर्वेदी - सन् 1960 ई. 
  • अमृत राय - प्रेमचंद कलम के सिपाही सन् 1962 ई. । 
  • डॉ. रामविलास शर्मा - निराला की साहित्य साधना - ( प्रथम खंड जीवन चरित) सन् 1969 ई. - 
  • विष्णु प्रभाकर - शरत् चन्द्र की जीवनी - आवारा मसीहा सन् 1968 ई. ।

 

  • हिंदी जीवनी के विकास क्रम विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि हिंदी जीवनी लेखक का प्रारंभिक हिंदी साहित्य के प्रारंभिक काल से ही हो गया था किंतु रीति काल तक उनमें साहित्यिक रूप नहीं आ पाया था। माध्यम गद्य न होकर पद्य था। इसलिए उनको जीवनी की संज्ञा नहीं दे सकते। भारतेंदु युग से जीवनी का वास्तविक प्रारंभ माना जाना चाहिए। आधुनिक काल जीवनी लेखन का उत्कर्ष युग माना जाता है। इस काल में नेताशासकदेशभक्तक्रांतिकारी तथा साहित्यकारों की जीवनियां लिखी गई। जीवनी लेखन के तत्वों तथा मानदण्डों के अनुसार अनेक श्रेष्ठ जीवनियां सामने आई।

 

वर्तमान समय में हिंदी का जीवनी साहित्य जीवनी लेखन की कला तथा मानदंड के अनुसार अत्यधिक समद्ध हो गया है - जिसमें गुणात्मकता एवं परिमाण दोनों दष्टियों से प्रगति दष्टिगोचर हो रही है। जीवनी लेखन का भविष्य उज्जवल है आज यह युग की मांग है।

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