आधुनिक हिंदी साहित्य (काव्य) का इतिहास। Modern Hindi Literature Poetry

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 आधुनिक हिंदी साहित्य (काव्य)  का इतिहास

आधुनिक हिंदी साहित्य (काव्य)  का इतिहास। Modern Hindi Literature Poetry



आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास 

➽ हिंदी साहित्य के इतिहास के हजार वर्षों के इतिहास को मुख्य रूप से आदिकाल, मध्यकाल एवं आधुनिक काल कालक्रमानुसार विभाजित किया गया है। मध्यकाल को पुनः पूर्व मध्यकाल एवं उत्तर मध्यकाल दो भागों में विभक्त किया गया है। 

➽ भक्तिकाल के अतिरिक्त तीनों कालों के एक से अधिक नामकरण एवं सीमा निर्धारण में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद रहा है फिर भी अधिकांश विद्वानों ने शुक्ल जी द्वारा प्रदत्त नाम एवं समय सीमा को स्वीकारा है- 

 

(i) आदिकाल (वीरगाथा काल संवत् 1050 1375 तक) 

(ii) पूर्व मध्यकाल ( भक्तिकाल संवत् 1365-1700 तक ) 

(iii) उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल संवत् 1700-1900 तक)

(iv) आधुनिक काल (गद्यकाल संवत् 1900 आज तक) 


➽ साहित्येतिहास का कालक्रमानुसार विभाजन तत्कालीन कृतियों की प्रवत्ति विशेष के अनुसार किया गया है। ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि एक निश्चित तिथि के पश्चात् एक विशिष्ट प्रकार के साहित्य का सजन समाप्त या प्रारम्भ हो जाता है क्योंकि साहित्य सजन में काल सीमा का कोई बंधन नहीं है। किसी विशिष्ट काल में भी अन्य प्रकार साहित्य का भी सजन होता रहता है। आधुनिक काल में गद्य-पद्य साहित्य की रचना समानांतर रूप से चली आ रही है। 

➽ हिंदी साहित्येतिहास के आधुनिक काल की प्रमुख घटना गद्य का आविर्भाव है। इसी को दष्टिगत रखते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस काल को गद्य काल नाम दिया है और इस काल का प्रारम्भ संवत् 1900 विक्रमी स्वीकारा है।

 

आधुनिक काल से पूर्व गद्य का विकास

 

➽  संवत् 1900 वि. से पूर्व गद्य अपने विभिन्न रूपों में हिंदी साहित्य में पदार्पण कर चुका था। यद्यपि शुक्ल ने गद्य साहित्य का आविर्भाव संवत् 1913 में राजा शिव प्रसाद के शिक्षा विभाग में निरीक्षक पद पर नियुक्ति से माना है। 

➽ राजा शिव प्रसाद ने स्वयं हिंदी रचना का बीड़ा उठाया तथा पंडित श्री लाल एवं पंडित वंशीधर आदि अपने इष्ट मित्रों को भी हिंदी में पुस्तक सजन की प्रेरणा दी। तत्कालीन साहित्य में राजा भोज का सपना' वीर सिंह का वत्तांत', 'आलसियों का कोड़ा आदि उपयोगी कहानियों के अतिरिक्त भारत वर्षीय इतिहास", "जीविका - परिपाटी" (अर्थशास्त्र) तथा "जगत वत्तांत" का विशेष महत्व है। 

➽ रीतिकाल की समाप्ति तक देश में आंग्ल राज्य पूर्ण रूपेण स्थापित हो चुका था जिसने अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार किया। चार्ल्स ग्रांट ने संवत 1858 वि. में ईस्ट इंडिया कंपनी के डायरेक्टरों के पास अंग्रेजी की शिक्षा द्वारा भारतीयों को शिक्षित करने हेतु प्रस्ताव प्रेषित किया था। कोलकात्ता में हिंदू कॉलेज की स्थापना उसी की एक कड़ी है।

➽ लार्ड मैकाले ने संवत् 1883 में अंग्रेजी के साथ-साथ देशभाषा द्वारा शिक्षा की संभावना को स्वीकारा व्यावहारिक कठिनता के कारण सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी एवं देशी भाषा को फारसी का स्थापन्न बनाया गया।

 

➽ साहित्य की भाषा ब्रजभाषा ब्रज मंडल के बाहर बोलचाल की भाषा नहीं थी। दिल्ली की खड़ी बोली शिष्ट- समुदाय की व्यावहारिक भाषा बन चुकी थी। खुसरो ने विक्रम की चौदहवीं शताब्दी में ही ब्रजभाषा के साथ-साथ खड़ी बोली कुछ पद्य और पहेलियाँ बनाई थीं। फारसी मिश्रित खड़ी बोली अर्थात् रेखता में शायरी का श्रीगणेश औरंगजेब के शासन काल में ही हो गया था। 

➽ दिल्ली पतन के परिणामस्वरूप पूर्व में स्थित बड़े-बड़े शहरों के बाजार की व्यावहारिक भाषा का रूप में खड़ी बोली ने ले लिया जो असली एवं स्वाभाविक भाषा थी। अकबर कालीन गंग कवि ने चंद छंद बरनन की महिमा की रचना खड़ी बोली में की। संवत् 1980 में जटमल ने गोराबादल की कथा का सजन राजस्थानी मिश्रित खड़ी बोली में किया। 


➽ आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने लिखा है

 

➽ "जिस समय अंग्रेजी राज्य भारत में प्रतिष्ठित हुआ, उस समय सारे उत्तरी भारत में खड़ी बोली व्यवहार की शिष्ट भाषा हो चुकी थी अंग्रेजों ने उर्दू को देश की स्वाभाविक भाषा और उसके साहित्य को देश का साहित्य नहीं स्वीकारा। इसीलिए देश की भाषा सीखने हेतु गद्य की खोज हुई। उर्दू के साथ-साथ हिंदी (शुद्ध खड़ी बोली में गद्य रचना को प्रधानता दी गई क्योंकि उस समय तक वास्तव में गद्य की पुस्तकें न उर्दू में थी न हिंदी में कोलकात्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना से पूर्व 'सुखसागर' (भागवत कथा का अनुवाद) - मुंशी सदासुख लाल, रानी केतकी की कहानी - इंशा अल्ला खां की रचना हो चुकी थी। कुछ विद्वानों ने 'रानी केतकी की कहानी" को हिंदी की प्रथम कहानी स्वीकारा है। इसलिए गद्य के प्रादुर्भाव को अंग्रेजी की प्रेरणा स्वरूप नहीं माना जा सकता है।

 

➽ संवत् 1890 वि. में फोर्ट विलियम कॉलेज कोलकात्ता के अध्यक्ष जान गिलक्राइस्ट ने देशी भाषा (खड़ी बोली, गद्य की पुस्तकें तैयार कराने की व्यवस्था की जिसमें उर्दू-हिंदी दोनों का अलग-अलग प्रबंध किया खड़ी बोली गद्य की नियमित प्रतिष्ठा करने का श्रेय लल्लू लाल जी प्रेम सागर, सदल मिश्र - नासिकेतोपाख्यान, मुंशी सदासुखलाल सुखसागर तथा सैयद इंशा अल्ला खां रानी केतकी की कहानी, चार महानुभावों को है।

 

फोर्ट विलियम कॉलेज से पूर्व हिंदी गद्य

 

➽ फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना से पूर्व भी हिंदी गद्य अपना अस्तित्व स्थापित कर चुका था। संवत् 1400 वि. के ब्रज भाषा गद्य का रूप गोरखनाथ की वाणी, गोरखनाथ के पद तथा ज्ञान सिद्धांत जोग से मिलता है जिसे ब्रजभाषा गद्य का पुराना रूप कहा जा सकता है। गोसाई गोकुल नाथ जी ने "चौरासी वैष्णवों की वार्ता" एवं "दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता" की रचना की। इनका रचना काल संवत् 1625-1650 वि. तक का है। इनकी भाषा बोलचाल की ब्रज भाषा है। 

➽ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है- "भाषा-विप्लव नहीं संघटन हुआ और खड़ी बोली, जो कभी अलग और कभी ब्रजभाषा की गोद में दिखाई पड़ जाती थी, धीरे-धीरे व्यवहार की शिष्ट भाषा होकर गद्य के नए मैदान में दौड़ पड़ी।" 

➽ टीकाओं द्वारा गद्य की उन्नति की संभावना नहीं हुई। गद्य को एक साथ प्रतिष्ठापित करने वाले चारों लेखकों में आधुनिक हिंदी का पूर्ण आभास मुंशी सदासुख एवं सदलमिश्र की भाषा में उपलब्ध होता है। इनमें भी मुंशी सदासुख की भाषा अधिक महत्वपूर्ण है। आधुनिक गद्य के प्रतिष्ठापन का श्रेय मुंशी सदासुख लाल को है। किंतु यह परंपरा अपनी अखंडता नहीं बना पाई। यह परंपरा लगभग पचास वर्षों तक लुप्त रही। 

➽ पुनः संवत् 1914 से हिंदी गद्य साहित्य की परंपरा का आरंभ हुआ। इससे पूर्व काल में ईसाई मत प्रचारकों ने विशुद्ध हिंदी का व्यवहार किया है। बाइबिल तथा नए धर्म नियम का अनुवाद करे ने शुद्ध खड़ी बोली में किया है। इन्होंने सदासुख और लल्लू लाल की विशुद्ध भाषा को अपना आदर्श बनाया तथा उर्दूपन का पूर्ण बहिष्कार किया।

 

फोर्ट विलियम कॉलेज के पश्चात् हिंदी गद्य

 

➽ 'सिरामपुर प्रेस' से संवत् 1893 में 'दाऊद के गीत का प्रकाशन हुआ। शिक्षा संबंधी पुस्तकें छपने लगी। अंग्रेजी शिक्षा हेतु स्कूल और कॉलेजों की स्थापना हुई जहां अंग्रेजी के साथ हिंदी-उर्दू की पढ़ाई की भी व्यवस्था की गई। 

➽ संवत् 1900 से पूर्व ही ऐसी पुस्तकों की मांग हो चुकी थी जिसके परिणामस्वरूप संवत् 1890 में आगरा पादरियों ने स्कूल-बुक- सोसाइटी की स्थापना की। जहां से "प्राचीन इतिहास का अनुवाद कथासार" के नाम से प्रकाशित हुआ। इसके अनुवादक पंडित रतन लाल थे। आगरा 'स्कूल- सोसायटी' से संवत् 1897 में पंडित ओंकार भट्ट ने "भूगोलसार" तथा संवत् 1904 में पंडित बद्रीलाल शर्मा ने "रसायन प्रकाश छापा।

 

➽ कोलकाता की स्कूल बुक सोसायटी ने संवत 1903 में पदार्थ विद्यासार' प्रकाशित किया। इलाहाबाद मिशन प्रेस से संवत् 1897 में 'आज़मगद रीडर प्रकाशित हुआ। संवत् 1912-1919 तक भूचरित्र दर्पण', 'भूगोल विद्या', 'मनोरंजक वत्तांत,' 'जंतु प्रबंध, 'विद्यासार', 'विद्वान संग्रह आदि का प्रकाशन शेरिंग ने किया 'आसी' और जान के भजन देशी ईसाइयों में बहुत प्रचलित हुए हैं। हिंदी-गद्य के प्रचार-प्रसार में ईसाइयों का अत्यधिक योगदान रहा है। 

➽ छापा खाना' खुलने लगे जिसके परिणामस्वरूप लोगों का ध्यान सामयिक पत्रों की ओर आकृष्ट हुआ। कोलकाता से अंग्रेजी एवं बंगला के पत्रों का प्रकाशन आरंभ हुआ। देवनागरी लिपि में टूटी-फूटी चाल पर लिखी जाने वाली भाषा हिंदी कहलाई। 

➽ शिक्षा विभाग में नियुक्त होने से पूर्व राजा शिव प्रसाद सिंह का ध्यान हिंदी भाषा की ओर था। अन्य भाषाओं के समाचार पत्रों के प्रकाशन को दष्टिगत रखते हुए उन्होंने संवत् 1902 में बनारस अखबार निकाला। संवत् 1907 में तारा मोहन मित्रादि ने "सुधाकर" नाम का दूसरा पत्र काशी से निकाला। संवत् 1909 में आगरा से किसी मुंशी सदासुखलाल ने "बुद्धि प्रकाश" पत्र निकाला।

 

➽ आधुनिक हिंदी साहित्येतिहास को गद्य काल भी कहा गया है। समय सीमा संवत 1900 से मानी गई है। जबकि गद्य का उद्भव और विकास इससे पूर्व हो चुका था। इसलिए यह विवेचन विषय से पूर्व अनिवार्य था. 

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