भाषाविज्ञान का स्वरूप एवं क्षेत्र, भाषा विज्ञान के अध्ययन की दिशाएँः वर्णनात्मक, ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक | Bhasha Vigyan

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भाषाविज्ञान का स्वरूप एवं क्षेत्र, भाषा विज्ञान के अध्ययन की दिशाएँः वर्णनात्मक, ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक

भाषाविज्ञान का स्वरूप एवं क्षेत्र, भाषा विज्ञान के अध्ययन की दिशाएँः वर्णनात्मक, ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक | Bhasha Vigyan


 

मनुष्य अपनी वाक्-शक्ति से ज्ञान-विज्ञान आदि अनेकानेक क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण पहचान बना चुका है। वैदिक ऋषियों ने भी भाषा और उसकी कलात्मक परिणति के संकेत किये हैं। ऋग्वेद के वाग् सूक्त में 8 मन्त्र इस आशय के संकेत देते हैं। वहाँ कहा गया है कि वाक्तत्व या भाषा ही वह दिव्य ज्योति है जो मानव को ऋषि, देवता या विद्वान् बनाती है।

 

भाषाविज्ञान का स्वरूप 

भाषाविज्ञान के स्वरूप को निश्चित करने में पाँच तत्त्वों का होना अनिवार्य है।

 

(क) मानव मुखोच्चारित-

भाषा-विज्ञान के अंतर्गत मुख्यतः सांकेतिक, स्पर्श, यंत्राधारित आदि भाषाओं का अध्ययन न करके मानव मुख के विभिन्न अवयवों के सहयोग से उच्चरित भाषा का अध्ययन किया जाता है। विशेष संदर्भों में कुछ अन्य सार्थक ध्वनि-संकेतों का भी प्रयोग किया जाता है; यथा-कार का हॉर्न, मंदिर की घंटियाँ बजना आदि, किंतु भाषाविज्ञान में इनका अध्ययन नहीं किया जाता है।

 

(ख) यादृच्छिक ध्वनि-

प्रतीक ध्वनि और अर्थ के परस्पर संबंध से उभरने वाली संकल्पना को ध्वनि-प्रतीक कहते हैं। इसे दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि ध्वनि सुनने के पश्चात् जो चित्र-संकल्पना उभरती है, वह प्रतीक है। ऐसी संकल्पना में ध्वनि ही सर्वाधिक सशक्त माध्यम है। यह संकल्पित रूप या नाम पहले एक व्यक्ति के द्वारा अपनाया जाता है। फिर उसे समाज सापेक्ष स्वीकृति मिलती है। इस संकल्पना में कुछ ध्वनियों का क्रमिक प्रयोग किया जाता है। यह ध्वनि-क्रम उस भाषा-समुदाय में सर्वमान्य होता है। अर्थ अभिव्यक्ति की यह संकल्पना पूर्णतः यादृच्छिक होती है। एक भाषा में एक संकल्पना के लिए एक विशेष ध्वनि-प्रतीक-क्रम का प्रयोग होता है, तो दूसरी भाषा में उसी के लिए भिन्न ध्वनि-प्रतीकों के भिन्न क्रम का प्रयोग होता है

भाषा की यादृच्छिकता व्यक्ति स्तर पर न होकर समाज स्तर पर होती है। एक भाषा-समाज में एक यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीक एक ही अर्थ में प्रयुक्त होता है। इस प्रकार निश्चित ध्वनियों से निश्चित जीव या वस्तु का बोध होता है। इससे स्पष्ट होता है कि भाषा यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीक पर आधारित होती है।

 

(ग) व्यवस्था-

भाषा की संरचना यादृच्छिक आधार पर होती है, किंतु प्रत्येक भाषा की अपनी व्यवस्था होती है। यह व्यवस्था ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य और अर्थ आदि स्तरों पर होती हैं। एक भाषा समुदाय के सभी सदस्य इसी व्यवस्था-आधार पर भाषा बोलते, सुनते तथा अर्थग्रहण करते हैं। दो भाषाओं की कुछ व्यवस्थाओं का समान होना संयोग की बात मान सकते है, किंतु समस्त व्यवस्थाएँ समान नहीं हो सकती हैं। यदि हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी की पुरुष संबंधी अन्य, मध्यम और उत्तम पुरुषों की सामान्य व्यवस्था समान है, तो लिंग व्यवस्था में पर्याप्त भिन्नता है, हिंदी में पुल्लिंग और स्त्रीलिंग, दो लिंग हैं, तो संस्कृत में पुल्लिंग, स्त्रीलिंग के साथ नपुंसक लिंग, तीन लिंगों की व्यवस्था है। अंग्रेजी में Masculine, Feminine Neuter और Common चार लिंग हैं। भाषा के विभिन्न संदर्भों की व्यवस्था एक-दूसरे पर आधारित होती है; यथा-शब्द की चर्चा करते हुए एक तरफ उससे संबंधित विभिन्न ध्वनियों पर विचार करते हैं, तो आर्थी संरचना में वाक्यगत प्रयोग पर भी विचार करते हैं। इस प्रकार कह सकते हैं, कि भाषा भावाभिव्यक्ति का ऐसा आधार है, जो कि विभिन्न आधारों की सबल व्यवस्था पर निर्मित है।

 


(घ) सामाजिक आधार 

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। भाषा मानवीय संस्कृति, सभ्यता और सामाजिकता का मूलाधार है। एक समुदाय विशेष में विभिन्न सदस्यों के आपसी संबंधों की निकटता और परस्पर विचार-विनिमय के कारण एक भाषा का प्रयोग होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि भाषा विशेष, समाज के समुदाय विशेष पर आधारित होती है। भाषा-समुदाय का विस्तार क्षेत्र विशेष, प्रदेश विशेष से लेकर राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तक हो सकता है। इन रूपों में क्रमशः अवधी, पंजाबी, हिंदी और अंग्रेजी को देख सकते हैं। भाषा निश्चय ही मानव समुदाय पर आधारित होती है।

 

(ङ) विचार-विनिमय-

भाषा का मुख्य गुण है-संप्रेषणीयता। मानव भाषा के माध्यम से चिंतन और मनन के साथ अपने विचारों को दूसरों तक पूर्ण सफलता से पहुँचा पाता है। भाव-अभिव्यक्ति या विचार आदान-प्रदान की विभिन्न मानवीय व्यवस्थाओं में भाषा-व्यवस्था सर्वाधिक प्रभावशाली और सफल है। भावाभिव्यक्ति के अन्य माध्यम मुख्यतः संकेत सीमा तक कार्य कर पाते हैं, जिसके कारण सूक्ष्म तथा मौलिक अभिव्यक्ति संभव नहीं होती है। चौराहे की लाल, हरी बत्ती होने और मंदिर की घंटी बजने से संकेत-भाव का ज्ञान होता है। भाषा मानव विचारों की पूर्ण सार्थक और सशक्त संवाहिका है, जिसके माध्यम से स्पष्ट तथा सरल रूप में विचार-विनिमय संभव होता है।

 

 भाषाविज्ञान का क्षेत्र 

भाषाविज्ञान पूर्ण रूप से विकसित, पल्लवित तथा पुष्पित वह वृक्ष है जिसकी चार मुख्य शाखाएँ हैं- ध्वनि विज्ञान, रूप विज्ञान, अर्थ विज्ञान तथा वाक्य विज्ञान।

 

सामान्यतः भाषाविज्ञान की उपर्युक्त चार शाखाएँ ही मानी जाती हैं। न केवल हिन्दी में अपितु अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन आदि भाषाओं में भी ये ही चार शाखाएँ मानी जाती हैं। वहाँ इन्हें क्रमशः Phonetics, Morphology, Semantics तथा Syntax के नाम से जाना जाता है।

 

भाषाविज्ञान की उपर्युक्त चार शाखाओं के विषय में भारतीय भाषावैज्ञानिक एक-मत नहीं है। भाषविज्ञान की शाखाओं के सम्बन्ध में प्राप्त मतों को तीन वर्गों के अन्तर्गत रखा जा सकता है। पहला वर्ग वह जो छः शखाएँ मानता है, दूसरा वर्ग वह जो पाँच शाखाएँ मानता है तथा तीसरा वर्ग वह जिसके अनुसार चार शाखाएँ ही हैं।

 

प्रथम वर्ग अर्थात् भाषाविज्ञान की छः शाखायें मानने वाले भाषा वैज्ञानिकों में डॉ. श्यामसुन्दर दास प्रमुख हैं। उन्होंने अपने ग्रन्थ 'भाषाविज्ञान' में छः शाखाओं का उल्लेख कया है-

 

(1) ध्वनि विचार, 

(2) ध्वनि शिक्षा 

(3) रूप विचार 

(4) वाक्य विचार, 

(5) अर्थ विचार 

(6) प्राचीन शोध।

 

उपर्युक्त शाखाओं पर यदि ध्यानपूर्वक विचार किया जाय तो यह स्पष्ट हो जाता है कि ध्वनि-विचार और ध्वनि-शिक्षा नामक दोनों शाखाएँ वस्तुतः एक हैं। 

दूसरे वर्ग अर्थात् भाषाविज्ञान की पाँच शाखाएँ मनाने वाले भाषावैज्ञानिकों में प्रमुख हैं-डॉ. मंगलदेव शास्त्री और डॉ. भोलानाथ तिवारी। 

डॉ. मंगलदेव शास्त्री के अनुसार भाषाविज्ञान की पाँच शाखाएँ इस प्रकार हैं-

 

(1) वाक्य-विज्ञान, 

(2) पद-विज्ञान, 

(3) ध्वनि-विज्ञान, 

(4) अर्थ-विज्ञान तथा  

5) प्रागैतिहासिक अनुसन्धान।

 

इन शाखाओं में अन्तिम 'प्रागैतिहासिक अनुसन्धान' तथा डॉ. श्यामसुन्दर दास की छठी शाखा प्राचीन शोध में कोई अन्तर नहीं है।

 

डॉ. भोलानाथ तिवारी ने भी भाषाविज्ञान की पाँच शाखाएँ स्वीकार की हैं-

 

(1) वाक्य-विज्ञान (Syntax) (2) रूप-विज्ञान (Morphology) (3) शब्द-विज्ञान (Wordology) (4) ध्वनि-विज्ञान (Phonetics) तथा (5) अर्थ-विज्ञान (Sementics)

 

डॉ. तिवारी ने मान्य चार शाखाओं में 'शब्द-विज्ञान' नामक नई शाखा जोड़ने के औचित्य को सिद्ध करते हुए अपनी 'भाषा-विज्ञान' नामक पुस्तक में लिखा है-

 

"Wordology शब्द मेरा अपना बनाया हुआ है। वस्तुतः भाषा-विज्ञान में केवल चार ही शाखाएँ मानी जाती हैं-Syntax, Morphology, Sementics तथा Phonetics। किन्तु मेरा विचार है कि एक पाँचवी शाखा भी मानी जानी चाहिए। इसी आधार पर मैंने एक नई शाखा जोड़ने का दुस्साहस किया है। यह इसलिए करना पड़ा है कि इसमें जो विवेचन किया जा सकता है, उपर्युक्त चार में से किसी में नहीं रखा जा सकता।" भाषा-विज्ञान की चार शाखाएँ मानने वाले तीसरे वर्ग के भाषाविदों में प्रमुख हैं डॉ. बाबूराम सक्सेना तथा प्रो. नलिनीमोहन सान्याल।

 

डॉ. बाबूराम सक्सेना के अनुसार भाषाविज्ञान की चार शाखाएँ इस प्रकार हैं- 

(1) वाक्य विज्ञान (2) पद विज्ञान (3) ध्वनि वज्ञान (4) अर्थ विज्ञान।

 

प्रो. नलिनीमोहन सान्याल ने भी भाषाविज्ञान की चार शाखायें मानी हैं। पर ये चार शाखायें डॉ. सक्सेना की उपर्युक्त चार शाखाओं से कुछ भिन्न हैं-

 

(1) ध्वनि तत्व (Phonology)

 (2) ऐतिहासिक व्याकरण या गठन-तत्व (Phology) 

(3) आपेक्षिक विन्यास तत्व ( Comparative Synatax) और 

(4) अर्थ (Semactalogy)

इस प्रकार उपर्युक्त तीन वर्गों के भाषावैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत भाषाविज्ञान की शाखाओं पर विचार करते हुए हम देखते हैं कि इनकी संख्या बहुत अधिक हो जाती है। परन्तु इन विभिन्न शाखाओं में एक बात ध्यान देने योग्य है कि लगभग सभी भाषावैज्ञानिकों ने वाक्य विज्ञान, रूप विज्ञान, ध्वनि विज्ञान, अर्थ विज्ञान इन चार शाखाओं को किसी न किसी रूप में स्वीकार किया है। वस्तुतः ये चार शाखाएँ ही भाषाविज्ञान के प्रमुख चार अंगों के रूप में अधिक मान्य है। ये चार शाखायें ही भाषाविज्ञान के प्रमुख चार अंग पाश्चात्य भाषा वैज्ञानिकों द्वारा भी Syntax, Morphology, Phonetics तथा Semantics के रूप में स्वीकार किये गये हैं। अतः भाषाविज्ञान की जिन चार शाखाओं पर विचार किया जायेगा, ये हैं-

 

(1) ध्वनि विज्ञान 

(2) रूप विज्ञान 

(3) वाक्य विज्ञान 

(4) अर्थ विज्ञान 


 

(1) ध्वनि विज्ञान-

भाषा के अन्दर ध्वनि का बहुत महत्व है, वस्तुतः ध्वनि भाषा की वह लघुतक इकाई है जिसका पुनः विभाजन नहीं किया जा सकता, ध्वनि विज्ञान के अन्तर्गत उन्हीं ध्वनियों का अध्ययन होता है जिनके संयोग से भाषा का निर्माण होता है।

 

ध्वनियों के साथ-साथ इनके उच्चारण स्थान का भी अध्ययन ध्वनि विज्ञान के अन्तर्गत होता है। ध्वनियों का उच्चारण जिन अंगों से होता है उन्हें समग्र रूप से 'वाग्यन्त्र' कहते हैं। ध्वनि विज्ञान के अन्तर्गत इस वाग्यन्त्र की रचना, इससे विभिन्न ध्वनियों का उच्चारण होता है। जैसे ओष्ठ्य अंग से पवर्ग ध्वनियों का, कण्ठ अंग से 'कवर्ग' की ध्वनियों का उच्चारण होता है। ध्वनि विज्ञान के अन्दर इन ध्वनियों के साथ-साथ ध्वनि उच्चारण के स्थानों का भी सम्यक् अध्ययन होता है।

 

वाग्यन्त्र के साथ-साथ ध्वनि विज्ञान के अन्तर्गत ध्वनियों के अन्दर जो विभिन्न प्रकार के परिवर्तन होते हैं उनके कारणों और दिशाओं के भी अध्ययन का आधार वैज्ञानिक होता है अर्थात् सम्यक् रूप से यह अनुशलीन होता है कि ध्वनि परिवर्तन के इन कारणों और दिशाओं का आधार क्या है और इन परिवर्तनों का रूप क्या होता है।

 

ध्वनि विज्ञान के अन्तर्गत ध्वनि सम्बन्धी एक और महत्वपूर्ण विषय का अध्ययन होता है, जिसका नाम है ध्वनि नियम। ये ध्वनि नियम विभिन्न प्रकार के ध्वनि परिवर्तनों को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं। इसके अन्तर्गत इस बात का अध्ययन होता है कि इन नियमों का सम्बन्धा किस भाषा से है, किस काल विशेष से है और इनका कार्य किन सीमाओं के अन्दर रहकर संपादित होता है। उदाहरण के लिए हम ग्रिम नियम को ले सकते हैं जो कि एक प्रसिद्ध ध्वनि नियम है।

 

(2) रूप विज्ञान-

ध्वनि विज्ञान की तरह ही रूप विज्ञान की भाषाविज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है। जहाँ ध्वनि विज्ञान के अन्तर्गत शब्दों का उच्चारण आदि के दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाता है वहीं रूप विज्ञान में शब्दों की रचना प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है। इस रूप विज्ञान को हम दो भागों में बाँट सकते हैं-

 

(1) शब्द विज्ञान तथा (2) पद विज्ञान।

(1) शब्द विज्ञान-भाषा विज्ञान के अन्तर्गत शब्द का विशेष महत्व होता है। भाषा के अन्तर्गत शब्दों का प्रयोग दो रूपों में होता है एक तो सामान्य शब्द जो बोलचाल की भाषा में कम आते हैं और दूसरे परिष्कृत शब्द जो साहित्यिक भाषा में प्रयोग किये जाते हैं। इन सभी शब्दों का वैज्ञानिक अध्ययन भाषाविज्ञान के अन्तर्ग किया जाता है। भाषा वैज्ञानिक अध्ययन यद्यपि आधुनिक युग की देन है तथापि शब्दों का अध्ययन अत्यन्त प्राचीन काल से होता चला आ रहा है। उदाहरण के लिए यास्क ने शब्द के चार भेद बताए हैं- (1) नाम (2) आख्यात (3) उपसर्ग और (4) निपात।

 

आचार्य पाणिनि ने शब्दों पर विचार करते समय शब्द के चार भेद बताये हैं-

 

(1) प्रातिपदिक 

(2) धातु 

(3) उपसर्ग तथा 

(4) निपात।

 

इस प्रकार व्याकरण के दृष्टिकोण से शब्द का व्यापक अध्ययन अत्यन्त प्राचीनकाल से होता आ रहा है। भाषा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शब्द का व्यापक अध्ययन और अनुशलन आधुनिक देन है। यह अध्ययन शब्द विज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है जो रूप विज्ञान की ही एक शाखा है। इसके अन्दर शब्द निर्माण की प्रक्रिया, शब्द के विविध भेद, शब्दों में होने वाले विविध परिवर्तनों का अध्ययन होता है।

 

किसी भी विकसित भाषा का अपना एक शब्द समूह होता है। इसमें विविध प्रकार के शब्द होते हैं। उदाहरण के लिए हिन्दी भाषा के शब्द समूह में तत्सम्, तद्भव, देशज शब्दों के साथ-साथ विदेशी शब्दों का भी प्रयोग होता है। अतः शब्द-विज्ञान के अन्तर्गत हिन्दी भाषा के शब्द समूह का अध्ययन करते समय शब्दों की रूप-रचना के साथ-साथ उनमें होने वाले परिवर्तनों का भी अध्ययन होता है तथा परिवर्तनों का ही नहीं उनके कारणों का भी अध्ययन होता है। इस प्रकार शब्द-विज्ञान, भाषा-विज्ञान की महत्वपूर्ण उप-शाखा है।

 

(2) पद विज्ञान 

'ध्वनि' भाषा की लघुतम इकाई है। ध्वनियों के समूह से 'शब्द' का निर्माण होता है तथा शब्दों के समूह से वाक्य का और सार्थक वाक्यों के समुच्चय का नाम भाषा है। परन्तु शब्द तथा वाक्य के मध्य रचना प्रक्रिया की दृष्टि से एक और सीढ़ी है जिसका नाम 'पद' है।

 

'पद' शब्द का सीधा अर्थ है पैर। पैर का काम है चलना। एक प्रकार से हम कह सकते हैं कि जब मूल शब्द वाक्य में चलने लगता है अर्थात् एक निश्चित अर्थ देने लगता है तब पद बना जाता है। इस प्रकार वाक्य केवल शब्दों का समूह मात्र ही नहीं होता है अपितु उन शब्दों में एक निश्चित अर्थ के बोध के लिए, परस्पर सम्बन्ध भी स्थापित होना चाहिए। इसके लिए 'शब्दों' में प्रत्यय, विभक्तियाँ आदि जोड़ते हैं। जब मूल शब्द (ध्वनियों के समूह से बना शब्द, जो अधिकारी होता है) में प्रत्यय, विभक्ति आदि के योग से विकार उत्पन्न हो जाता है तब वे 'पद' कहलाते है, उदाहरण के लिए 'राम', 'मोहन', 'आम' 'देना' इन चार शब्दों को ले सकते हैं। इन शब्दों का अपना एक निश्चित अर्थ है, जो मूलार्थ है। बिना कोई परिवर्तन लाये ही, इन शब्दों से हम वाक्य बनाना, चाहें तो असफल रहेंगे और यह स्पष्ट करने में भी कुछ 'विकार' (परिवर्तन) लाकर इस तरह लिखें-

 

'मोहन ने राम को आम दिया।' तो यह एक पूर्ण वाक्य होगा, जिसके अन्दर प्रयुक्त शब्दों का पारस्परिक सम्बन्ध भी स्पष्ट है और अर्थ भी।

 

उपर्युक्त वाक्य में, 'को', विभक्ति-चिह्न (परसर्ग) है तथा '' भूतकालिक प्रत्यय है जिसने 'देना' क्रिया में जुड़कर उसका रूप 'दिया' कर दिया।

 

'राम', 'मोहन', 'आम', 'देना' जैसे मूल शबद अर्थतत्व कहलाते हैं तथा 'ने' 'को', जैसे विभक्ति चिह्न तथा '' जैसे प्रत्यय 'सम्बन्ध तत्व' कहलाते हैं। इस प्रकार अर्थ तत्व तथा सम्बन्ध तत्व के योग से बना शब्द 'पद' कहलाता है। 'पद-विज्ञान' के अन्तर्गत उन विविध 'सम्बन्ध तत्वों' का अध्ययन होता है जो पद-निर्माण में सहायक होते हैं, विविध सम्बन्ध तत्व, उनके विभिन्न कार्य, उनका परस्पर संबन्ध आदि का विशद तथा वैज्ञानिक अध्ययन पद विज्ञान के अन्तर्गत होता है।

 

(3) वाक्य विज्ञान-

ध्वनि विज्ञान और रूप विज्ञान पश्चात् भाषाविज्ञान की तीसरी महत्वपूर्ण शाखा वाक्य विज्ञान है। इस शाखा के अन्तर्गत वाक्य की संरचना, उसके आवश्यक उपकरण आदि का मनोवैज्ञानिक और सूक्ष्म अध्ययन होता है। यह अध्ययन करते समय भाषा में वाक्य प्रयोग की स्थिति और उसके अर्थ पर भी विचार किया जाता है।

 

वस्तुतः विविध पदों से वाक्य का निर्माण होता है। वाक्य-विज्ञान के अन्तर्गत वाक्य का पद विन्यास सम्बन्धी अध्ययन एवं विवेचन होता है। वाक्य सार्थक होता है और सार्थक वाक्यों से भाषा की रचना होती है। इस प्रकार किसी भी वाक्य के अन्दर दो मुख्य बातें निहित होती हैं जिन्हें हम उद्देश्य और विधेय के रूप में जान सकते हैं। वाक्य के अन्दर जो भाव विशेष निहित होता है अर्थात् जिसके विषय में वाक्य के द्वारा कुछ कहा जाता है, उसे उद्देश्य कहते हैं और जिसके द्वारा इस उद्देश्य को स्पष्ट किया जाता है उसे विधेय कहते हैं। जैसे 'राम पुस्तक पढ़ता है।' इस वाक्य में 'राम' उद्देश्य है और 'पुस्तक पढ़ता है' यह विधेय है। इन दोनों का सम्यक् अध्ययन वाक्य के अन्तर्गत किया जाता है। जिससे वाक्य की संरचना ओर उसके अर्थ विशेष को समझने में सरलता रहती है।

 

वाक्य विज्ञान के अन्तर्गत वाक्य के विभिन्न भेदों का भी अध्ययन किया जाता है। इस अध्ययन का आधार वैज्ञानिक होने के कारण यह पूर्ण सुस्पष्ट होता है। वाक्य के भेदों का अध्ययन करते समय जहाँ क्रिया के आधार पर वाक्य भेदों का अध्ययन किया जाता है वहीं रचना के आधार पर भी वाक्य के भेदों का विवेचन किया जाता है।

 

इस प्रकार वाक्य विज्ञान के अन्तर्गत वाक्य की रचना, पदों का महत्व, पदान्वय, वाक्य के भेद आदि का सम्यक् सूक्ष्म और पूर्ण अध्ययन एवं विवेचन होता है।

 

(4) अर्थ विज्ञान-

अर्थ शब्द की आत्मा होता है। जिस प्रकार आत्मा के निकल जाने से शरीर व्यर्थ हो जाता है, उसी प्रकार अर्थ के बिना शब्द का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है यही कारण है कि रघुवंश नामक महाकाव्य के प्रारम्भ में कालिदास ने शब्द और अर्थ के सम्यक् ज्ञान के लिए उस पार्वती और परमेश्वर की बन्दना की है जो शब्द अर्थ की भाँति जुड़े हुए हैं। 

अर्थ विज्ञान के अन्तर्गत शब्द के अर्थ परिवर्तन की विभिन्न दिशाओं का अध्ययन किया जात है। इस अध्ययन में तीन बातें विशेष रूप से ध्यान में रखी जाती है- (1) अर्थ संकोच, (2) अर्थ विस्तार तथा (3) अर्थदेश। 

अर्थ संकोच का तात्पर्य यह है कि पहले से प्रचलित किसी शब्द के अर्थ में न्यूनता आ जाना। इस प्रकार किसी शब्द का व्यापक अर्थ जहाँ सिमट कर छोटा हो जाता है उसे अर्थ संकोच कहते हैं। उदाहरण के लिए अंग्रेजी के (deer) तथा संस्कृत के 'मृग' शब्द का प्रयोग पहले 'पशु' के लिए होता था परन्तु क्रमशः वर्तमान अंग्रेजी तथा हिन्दी में इसका प्रयोग 'हरिण' क लिए हो रहा है।

 

जब किसी शब्द का अर्थ सीमित क्षेत्र से निकलकर विस्तृत हो जाता है तब उसे अर्थ विस्तार कहते हैं। भाषा में अर्थ विस्तार के उदाहरण अधिक नहीं मिलते हैं। इसीलिए प्रसिद्ध भाषाशास्त्री टकर महोदय के अनुसार भाषा में वस्तुतः अर्थ विस्तार होता ही नहीं है। परन्तु यह मत उचित नहीं है क्योंकि अर्थविस्तार के उदाहरण मिलते तो हैं भले ही कम मिलें जैसे 'अभ्यास' शब्द का प्रयोग पहले केवल बाण फेंकते के अभ्सास के लिए होता था। परन्तु अब हर अच्छे बुरे कार्यों के लिए भी अभ्यास शब्द का प्रयोग होता है। इसी प्रकार स्याह का अर्थ काला है। जिससे स्याही शब्द बना है क्योंकि पहले लोग काले रंग क लिए लिखते थे परन्तु अब लाल हरी सभी रोशनाइयों के लिए स्याही शब्द का प्रयोग होने लगता है।

 

अर्थ विज्ञान के अन्तर्गत शब्दों के अर्थादेश का भी अध्ययन किया जाता है। कभी-कभी एक शब्द के प्रधान अर्थ के साथ गौण अर्थ भी चलने लगता है। फिर धीरे-धीरे प्रधान अर्थ लुप्त हो जाता है और गौण अर्थ ही चलने लगता है। इसी को अर्थादेश कहते हैं। जैसे 'वर' का अर्थ श्रेष्ठ था पर अब 'दूलहे' के लिए प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार 'दूलहा'

 

शब्द का मूल अर्थ था 'जो जल्द न मिले' अर्थात् दुर्लभ। परन्तु अब यह वर के गौण अर्थ में प्रयुक्त होने लगा है।

 

अर्थ-विज्ञान के अन्तर्गत बौद्धिक नियमों का भी अध्ययन किया जाता है। जब पदों के विविध अर्थ-परिवर्तन के बुद्धिगत कारणों को दृष्टि में रखकर उससे सम्बन्धित नियम बनाये जाते हैं तो उन्हें बौद्धिक निमय कहते हैं। जैसे 'स्कूल' शब्द से एक प्रकार के शिक्षा संस्था का बोध होता है तो 'पाठशाला' से दूसरे प्रकार की और 'कॉलेज' से दूसरे प्रकार की शिक्षा संस्था का बोध होता है।

 

अर्थ विज्ञान शब्द का अर्थ का भी व्यापक अध्ययन किया जाता है। शब्द और अर्थ का तात्पर्य, उनका स्वरूप, पारस्परिक सम्बन्ध आदि का अध्ययन इसी शाखा के अन्दर होता है।

 

 

भाषाविज्ञान के अध्ययन की दिशाएँः वर्णनात्मक, तुलनात्मक एवं ऐतिहासिक 

इसे भाषा विज्ञान के अध्ययन की प्रणालियाँ भी कहते हैं। भाषाविज्ञान में एक भाषा, दो भाषाओं अथवा विविध भाषाओं का विशिष्ट अध्ययन करते हैं। भाषा के उच्चरित या लिखित अथवा दोनों स्वरूपों पर चिंतन किया जाता है। भाषाविज्ञान-अध्ययन की कुछ प्रणालियाँ निम्नलिखित हैं।

 

1. वर्णनात्मक पद्धति (Discriptive Linguistics)- 

जब किसी भाषा के विशिष्ट काल का संगठनात्मक अध्ययन किया जाता है, तो उसे वर्णनात्मक अध्ययन कहते हैं। प्रसिद्ध विद्वान पाणिनि के अष्टध्यायी में इसी प्रकार का भाषा-अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। इसमें भाषा के संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया तथा विशेषण आदि की वर्णनात्मक समीक्षा करते हुए ध्वनि, शब्द वाक्य आदि पर विचार किया जाता है। भाषा की सभी इकाइयों पर अध्ययन करते हुए उनसे संबंधित नियम निर्धारित किए जाते हैं। इस पद्धति में भाषा के सीमित काल का ही अध्ययन होता है, फिर भी इसका प्राचीन काल से विशेष महत्व रहा है। इस प्रकार के अध्ययन में भाषा के साधु-असाधु रूपों पर चिंतन करते हुए ध्वनि, शब्द आदि इकाइयों रूपी शरीरांग के साथ उसकी अर्थ रूपी आत्मा पर भी विचार किया जाता है। वर्तमान समय में वर्णनात्मक पद्धति के भाषा-अध्ययन की ओर विद्वानों का विशेष झुकाव दिखाई पड़ता है।

 

2. ऐतिहासिक अध्ययन (Historical Linguistics)-

इस पद्धति में भाषा विशेष के काल-क्रमिक विकास का अध्ययन किया जाता है। यदि किसी विशेष भाषा के कालों के विवरणात्मक अध्ययन को कालक्रम से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो ऐतिहासिक अध्ययन हो जाएगा। 

भाषा-विकास या परिवर्तन की विभिन्न धाराओं का अध्ययन इसी पद्धति में होता है। भारतीय आर्य भाषाओं के विकास-क्रम में हिंदी का अध्ययन करना चाहें, तो इसी पद्धति से वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, भाषाओं पर विचार करते हुए हिंदी भाषा का अध्ययन किया जाएगा। यदि हिंदी शब्दों का उद्भव और विकास जानना चाहेंगे, तो संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश के साथ हिंदी का कालक्रमिक अध्ययन करना होगा; यथा-कर्म (संस्कृत) > कम्म (प्राकृत) काम (हिंदी), भाषा चिर परिवर्तनशील है। समय तथा स्थान परिवर्तन के साथ भाषा में परिवर्तन होना स्वाभाविक ही है। समय-समय पर भाषा की ध्वनियों, शब्दों तथा वाक्यों में ही नहीं अर्थ में भी परिवर्तन होता रहता है। यह परिवर्तन हमें ऐतिहासिक पद्धति के अध्ययन से ही ज्ञात होता है। यह भाषा अध्ययन की महत्वपूर्ण पद्धति है।

 

3. तुलनात्मक पद्धति (Comparative Linguistics) – 

भाषा-अध्ययन की जिस पद्धति में दो या दो से अधिक भाषाओं की ध्वनियो, वर्णों, शब्दों, पदों, वाक्यों और यर्थों आदि की तुलना की जाती है, उसे भाषा-अध्ययन की तुलनात्मक पद्धति कहते हैं। इस अध्ययन के अंतर्गत एक भाषा के विभिन्न कालों के रूपों का तुलनात्मक अध्ययन कर उसकी विकासात्मक स्थिति का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त करते हैं। एक भाषा की विभिन्न बोलियों की समता-विषमता जानने के लिए भी भाषा-अध्ययन की इस पद्धति का उपयोग किया जाता है। इसका प्रबल प्रमाण है कि प्रारंभ में इसके लिए तुलनात्मक भाषाविज्ञान (Comparative Philology) नाम दिया गया था। यह भी सत्य है कि बिना तुलनात्मक अध्ययन-दृष्टिकोण अपनाए किसी नियम का निर्धारण अत्यंत कठिन होता है। भाषा-परिवार के निर्धारण में भी तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक होता है। भाषा की सरसता, सरलता या विशेषताओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करने के लिए तुलनात्मक अध्ययन सर्वाधिक उपयोगी होता है।

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