सांख्यकारिका 4 मूलपाठ, अर्थ व व्याख्या | Saankhya Karika 4th Explanation

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 सांख्यकारिका 4 मूलपाठ, अर्थ व व्याख्या

सांख्यकारिका 4 मूलपाठ, अर्थ व व्याख्या | Saankhya Karika 4th Explanation



सांख्यकारिका 4 मूलपाठ, अर्थ व व्याख्या

दृष्टमनुमानमाप्तवचनं च सर्वप्रमाणसिद्धत्वात्। 

त्रिविधं प्रमाणमिष्टं प्रमेयसिद्धिः प्रमाणाद्धि।। का0.4.

अन्वय-

  • दृष्टम्‌अनुमानम् आप्तवचनं च त्रिविधम् प्रमाणम् इष्टम्। सर्वप्रमाणसिद्धत्वात्। हि प्रमाणात् प्रमेयसिद्धिः (भवति)। 

अर्थ-

  • प्रत्यक्षअनुमान और शब्द ये तीन प्रमाण ही मान्य है। इन्ही तीनो प्रमाणों मे अन्य सभी प्रमाणों का अन्तर्भाव हो जाता है। प्रमाण से ही प्रमेयों का ज्ञान होता है।

 

शारदाव्याख्या 

  • दृष्टम् अनुमानम् आप्तवचनं च त्रिविध प्रमाणम् इष्टम्- प्रत्यक्षअनुमानऔर शब्द ये तीन ही प्रमाण हैं। प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों का लक्षण व भेद निर्देश तो 5वी कारिका में प्रतिपादित है। प्रमाण का निर्वचन तत्वकौमुदी मे हुआ है- प्रमीयतेऽनेनेति निर्वचनात् प्रमां प्रतिकरणत्वं गम्यते । तच्चासन्दिग्धाविपरीतानधिगतविषयाचित्तवृत्तिः बोधश्च पौरूषेयः फलं प्रमा तत्साधनं प्रमाणमितिअर्थात जिसके द्वारा प्रमा हो वही प्रमाण है। प्रमाण वह चित्तवृत्ति है जिसका विषय निश्चित रूप से ज्ञात हो रहा होबाधित होने वाला न होतथा पहले से ज्ञात न हो। ऐसी चित्तवृत्ति से उत्पन्नअतः उसका फलभूत पुरूषवर्ती बोध प्रमा है इसी का साधन प्रमाण है।

 

सर्वप्रमाणसिद्धत्वात्- 

अन्य सभी प्रमाणों का इन्ही तीनो मे अन्र्तभाव हो जाता है। भारतीय दर्शन में प्रमाणो की संख्या विषयक विप्रतिपत्ति का संकेत मानसोल्लास में मिलता है-

 

प्रत्यक्षमेकं चार्वाकाः कणादसुगतौ पुनः । 

अनुमानं तच्चापि सांख्याः शब्दं च ते अपि ।। 

न्यायैकदेशिनोऽप्येवम् उपमानं च केचन्। 

अर्थापत्या सहैतानि चत्वार्याह प्रभाकरः। 

चालय अभावषष्ठान्येतानि भट्टा वेन्दान्तिनस्तथा। 

सम्भवैतिह्ययुक्तानि तानि पौराणिका जगुः ।।

  • प्रत्यक्षअनुमानशब्द के अतिरिक्त प्रमाण है। उपमानअर्थापत्तिअभावसम्भव और ऐतिह्य। इनका अर्न्तभाव दिखलाया जा रहा है। उपमान का लक्षण है-

 

  • अतिदेशवाक्यार्थस्मरणसहकृतगोसादृश्यविशिष्टपिण्डज्ञानमुपमानम् यथा गौस्तथा गवयः (तर्कभाषा) सांख्य इसे अलग प्रमाण न मानकर उपमान का अन्तर्भाव प्रत्यक्ष में करता है। अर्थापति का लक्षण है। अनुपपद्यमानाथर्दर्शनात् तदुपपादकीभूर्थान्तरकल्पनम् अर्थापत्तिः। तथा पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते इति दृष्टे श्रुते वा रात्रिभोजनं कल्प्यते। इसका अर्न्तभाव सांख्य अनुमान मे करता है। इस कमरे में गौ नहीं है यह जो गौ के अभाव का ज्ञान है यह अनुपलब्धि प्रमाण है। 
  • सांख्य दर्शन इसका अन्तर्भाव प्रत्यक्ष में करता है। सम्भव प्रमाण पर तत्वकौमुदी में लिखा है-सम्भवस्तु यथा खाऱ्यांद्रोणाढकप्रस्थाद्यावगमः स चानुमानमेव। इसी तरह ऐतिह्य पर प्रकाश डालते हुए कहते है कि इस वृक्ष पर यक्ष रहता है ऐसा वृद्ध जन कहते है इत्यादि प्रकार कि जन श्रुति ऐतिह्य प्रमाण है। वह मूल वक्ता के ज्ञान के अभाव मे सन्दिग्ध है और यह प्रमाणिक पुरूष प्रोक्त हो तो आगम प्रमाण है. 
  • हि प्रमाणात् प्रमेयसिद्धिः यतः प्रमाणो के द्वारा ही प्रमेयो का ज्ञान होता है। विद्यमान सभी विषयों का ज्ञान प्रमाण से ही होता है। अतः तत्वों की उपलब्धि के साधन प्रमाणों का उपन्यास किया गया है। प्रमेय प्रकृति आदि 25 तत्व है जिनकी उपलब्धि प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द से होती है। 

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