शमशेर बहादुर सिंह कवि परिचय |उषा कविता संक्षिप्त परिचय

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 शमशेर बहादुर सिंह कवि परिचय ,उषा  कविता  संक्षिप्त परिचय

शमशेर बहादुर सिंह कवि परिचय |उषा  कविता  संक्षिप्त परिचय



शमशेर बहादुर सिंह कवि परिचय 

जन्म - 13 जनवरी, 1911 

मृत्यु - 12 मई, 1993

 

जीवन परिचय- 

शमशेर बहादुर सिंह का जन्म देहरादून में 13 जनवरी, 1911 को हुआ। उनके पिता का नाम तारीफ सिंह था और माँ का नाम परम देवी था। इनकी मृत्यु 12 मई, 1993 को हुई। 

शिक्षा – 

इनकी आरंभिक शिक्षा देहरादून में हुई और हाईस्कूल-इंटर की परीक्षा गोंडा से दी। बी. ए. इलाहाबाद से किया। किन्हीं कारणों से एम. ए. फाइनल न कर सके। 1935-36 में उकील बंधुओं से पेंटिंग कला सीखो। 

व्यक्तित्व — 

उनके जीवन का अभाव कविता में विभाव बनकर हमेशा मौजूद रहा। वामपंथी विचारधारा और प्रगतिशील साहित्य से प्रभावित रहे। उन्होंने स्वाधीनता और क्रांति को अपनी निजी चीज की तरह अपनाया। 

रचनाएँ - 

कुछ कविताएँ, कुछ और कविताएँ, शमशेर बहादुर सिंह की कविताएँ, उदिता, अभिव्यक्ति का संघर्ष, इतने पास अपने, चूका भी हूँ नहीं में, बात बोलेगी, काल तुझसे होड़ है मेरी, शमशेर की गजलें।

 

भाषा-शैली- 

हिन्दी तथा उर्दू के कवि हैं। इनकी शैली अंग्रेजी के कवि से प्रभावित है। विचारों के स्तर पर प्रगतिशील और शिल्प के स्तर पर प्रयोगधर्मी कवि, बिंवधर्मी शब्दों से रंग, रेखा, स्वर और कूचों की अद्भुत कशीदाकारी करते हैं। उर्दू शायरी में संज्ञा, विशेषणों से अधिक बल सर्वनाम, क्रियाओं अव्ययों और मुहावरों को दिया है।

 

साहित्य में स्थान- 

'चूका भी हूँ नहीं मैं' के लिए 1977 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, 1989 में कबीर सम्मान सम्मानित हुए।

 

उषा पाठ कविता  का संक्षिप्त परिचय 

उषा कविता में कवि ने प्रातःकालीन प्रकृति के क्षण-क्षण परिवर्तित दृश्य का वर्णन सूर्योदय के माध्यम से किया है। कवि कहते हैं कि प्रातः सूर्योदय से पूर्व आकाश का रंग नीला गहरा नीला होता है मानों नीला शंख हो । इसके अतिरिक्त भिन्न-भिन्न उपमानों से उपमा देते हुए कहते हैं कि कुछ समय पश्चात् जब वातावरण की नमी साकार होती है तो ग्रामीण रसोई को चूल्हे की राख से लिपा जाने पर जो रंग दिखता है वैसा रंग आसमान का हो जाता है। इसके पश्चात् सूरज निकलने से ठीक पहले उसकी किरणों के लाल रंग से आसमान को लालिमा ऐसी होती है किसी ने पत्थर के टुकड़े (सिल) पर केसर पीस कर धो दिया हो या स्लेट पट्टी पर लाल रंग के चॉक को घीसा हो। इसके पश्चात् जब सूरज ऊपर निकलने लगता है तब उसकी स्वर्णिम आभा को देखकर लगता है मानों कोई गौर वर्ण का मानव नीले सागर जल में झिलमिला रहा हो। इस प्रकार उषा काल का दृश्य किसी जादू की तरह समाप्त होता है।

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